लॉकडाउन के दौरान दवाओं की बिक्री कैसे बढ़ी.?

नाम से प्रयोग और संयोग की क्रोनोलॉजी समझिए..


संजय कुमार सिंह।।

सरकार की योजना डॉट कॉम (sarkarkiyojana.com) पर प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के कई नाम लिखे हुए हैं। असल में इस नाम में भारतीय जोड़कर भा और पहले के ज के बाद अब फिर पा जोड़ने का प्रयास चल रहा है। परियोजना से प तो मिल गया लेकिन पा मिल जाए तो बात बन जाए। कोई भी भारतीय परियोजना अगर जनता के लिए हो तो भाजपा हो ही गया फिर जनता पैदल चले या ट्रेन में मरे। भाजपा की तो बल्ले-बल्ले ही ही जाएगी।
मेरा सुझाव है कि योजना का नाम भारतीय जन औषधि पटल या पार्टी ही कर दिया जाए। नाम बदलने वाली सरकार नाम बदलेगी तो कोई क्या कर लेगा और भाजपा का प्रचार घर-घर हो जाएगा। उनके घर भी जिनके पांव हाल में छिल गए। बस 10-20 रुपए की कोई मलहम की ट्यूब बंटवा देने से करोड़ों का किराया बच जाएगा। अगर नाम में पार्टी उचित न लगे तो पटल के संक्षिप्त अक्षरों में खड़ी पाई लगा कर इसे भाजपा बना कर ब्रांड नाम रजिस्टर करा लिया जाए। 50 साल राज करने की चाणक्य नीति में काम आएगा। मुझे कोई श्रेय नहीं चाहिए।
प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र
प्रधानमंत्री जन औषधि योजना
प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र योजना
प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना
प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि पटल

ट्वीटर पर पीआईबी के एक ट्वीट से पता चला कि 2020-21 के दो महीने में एक अप्रैल से 31 मई तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की बिक्री इस परियोजना के तहत हुई है। पिछले साल इसी अवधि में यह बिक्री सिर्फ 44 करोड़ रुपए थी। इस बार जब लोगों को खाना नहीं मिला, लोग घरों में बंद थे तो दवाइयों की बिक्री बढ़ कैसे गई यह आपको कोई नहीं बताएगा। मैंने पढ़ा था कि पैदल चलते मजदूरों ने दर्द मारने की दवाइयां खरीदी थीं। पर उससे बिक्री इतनी नहीं बढ़ेगी। मुख्य कारण ट्वीट के साथ लगी विज्ञप्ति में बताया गया है। और विज्ञप्ति में @mansukhmandviya का एक ट्वीट है जो आज दिन में 11:54 का है।
इससे पता चलता है कि सरकार ने गरीब एवं मध्यम वर्ग की महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में जनऔषधि केंद्रों के जरिए एक रुपए में सुविधा सैनिटेरी पैड बेचे हैं। लॉक डाउन की अवधि में (मार्च-मई) में ₹1.20 करोड़ नैपकिन्स उपलब्ध कराए गए। कहने की जरूरत नहीं है और ना समझना मुश्किल है कि बिक्री क्यों बढ़ी। पर सरकार या जन औषधि केंद्र और पीआईबी न जाने क्यों सीधे पैड बेचने का श्रेय नहीं लेकर खबर को जासूसी कहानी की तरह परोस रहे हैं। इंतजार कीजिए एक रुपए कै सैनिटेरी पैड घर-घर बंट जाएगा और साथ में भाजपा का ब्रांड नेम भी।
क्या किसी राजनीतिक दल में इतनी अक्ल या लगन है? इसे समझने के लिए @mansukhmandviya को जानना होगा। ट्वीटर पर दिए गए परिचय के अनुसार मनसुख मांडविया केंद्रीय जहाजरानी (स्वतंत्रप्रभार) और रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री हैं। अब सैनिटेरी नैपकिन, जनऔषधि परियोजना से उनका संबंध समझना जरा लंबा हो जाएगा। इसलिए रहने देता हूं। मानलीजिए नामुमकिन मुमकिन है।

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