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-महेश झालानी।।

बंगाल और बिहार में मजदूरों का जमावड़ा होगया है, वहीँ अनेक राज्यों के कल-कारखाने श्रमिकों के अभाव में बन्द पड़े हुए है । सरकार झूठे आंकड़े पेश कर हजारों फैक्टरियां चलने की बात कर रही है । लेकिन हकीकत इससे इतर है ।

बिहार, बंगाल, उड़ीसा, यूपी और झारखंड से काम की तलाश में दीगर राज्यो में गए करीब 80 फीसदी मजदूर वापिस अपने घरों को लौट चुके है और कुछ लौटने की तैयारी कर रहे है । मजदूरों की घर वापसी की वजह से पंजाब, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र आदि निर्माण सहित अनेक कामकाज ठप्प हो चुके है ।

घरेलू कार्य मे 90 फीसदी से ज्यादा महिलाएं (बाई) कार्यरत थी । आधा दर्जन से ज्यादा राज्यो की रसोई और झाड़ू-पोंछे का कार्य इन्ही महिलाओं के हाथ मे था । ज्यादातर बाइयो की आवश्यकता ऐसे घरों में रहती है जहां पति और पत्नी दोनों कामकाजी है । अभी तक लॉक डाउन के कारण बगैर बाइयो के काम चल रहा था । लेकिन अन लॉक के बाद कैसे निपटेगा घरों का काम ?

काम की तलाश में निकले लोग लॉक डाउन के कारण हुई बेरोजगारी तथा भुखमरी की वजह से श्रमिक घरों को लौट तो आये है । लेकिन अब वे गांव में करे तो करे क्या ? ना गांव में रोजगार है और न ही घरों में रहने को पर्याप्त स्थान । नतीजतन गांवों का सारा सामाजिक और पारिवारिक ढांचा ध्वस्त होता ही जा रहा है । सवाल यह उतपन्न होता है कि गांव में रोजगार होता तो लोग शहरों की ओर भागते ही क्यो ? अब गांव में पेट भरने के लिए क्या लड्डू खाएंगे ?

यह सर्वविदित तथ्य है कि महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक तथा गुजरात आदि की खेतीबाड़ी, घरेलू कार्य, निर्माण कार्य तथा फैक्टरियों का संचालन बाहरी श्रमिको के बूते होता है । अब जबकि श्रमिक अपने घरों को पलायन कर गए है तो सभी कार्य कैसे संचालित होंगे, अहम सवाल यही है ।

जोश तथा भावनात्मक जुड़ाव के कारण श्रमिक अपने घरों को लौट तो गए है । लेकिन वे वहां करेंगे क्या ? किसी राज्य की इतनी हैसियत नही है कि वह तात्कालिक रूप से अपने लोगो को रोजगार भी मुहैया कराए और उनका पुनर्वास भी करें । ऐसे में पलायन करके अपने घरों को लौटे श्रमिकों की स्थिति तो बदतर होगी ही, इसके अलावा अन्य राज्यों का उत्पादन प्रभावित होना स्वाभाविक है । नतीजतन समूचे देश मे अभूतपूर्व घमासान मचना स्वाभाविक है ।

उधर घर लौटे श्रमिकों की स्थिति और भी बदतर है । रहने को पर्याप्त स्थान नही है । घर का चाव दो-चार दिन के लिए होता है । बाद में उसको वही जाने की तलब होती है, जहाँ वह रोजगार करता है । जिसने एक बार कलेक्टर से हाथ मिला लिया, वह तहसीलदार से हाथ मिलाने में संकोच करेगा । कमोबेश यही हाल श्रमिकों का है । जिसने दिल्ली, मुम्बई, बंगलोर, जयपुर आदि की चकाचोंध का मजा ले लिया हो, भला उसका गांव की झोपड़ी में मन कैसे लगेगा ? जहां 24 घंटे में से 18 घंटे बिजली नदारद रहती हो ।

केंद्र सहित सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि जब तक स्थिति सामान्य नही हो जाती, तब तक श्रमिक परिवारों के खानपान और गुजारे के लिए राशि खाते में जमा कराए । गांव के शराब ठेकों को अस्थायी तौर पर अविलम्ब बन्द करें । राज्य सरकारों को रहने के लिए यूपी, बंगाल, बिहार उड़ीसा आदि भवन बनाने चाहिए जिसमें श्रमिक और उनका परिवार नाममात्र के किराए पर रह सके ।

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