लॉकडाउन, अनलॉक का खेल, कितना सफल, कितना फेल..

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चाहे चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर गिरे।  हर हाल मे खरबूजे का ही नुकसान है। कुछ ऐसी ही दशा अब देश में आम आदमी की हो गई है। जब लॉकडाउन था, तब भी उसके लिए मुसीबतें थीं और अब जब अनलॉक की तैयारी है, तब भी मुसीबत का सामना उसे ही करना होगा।  देश में चौथे चरण के लॉकडाउन में कोरोना के मामलों में सर्वाधिक बढ़ोतरी देखी गई। इस शनिवार औऱ रविवार के बीच तो रिकार्ड आठ हजार से अधिक मरीजों की संख्या दर्ज की गई। जिस तेजी से मामले बढ़ रहे हैं और जिस अदूरदर्शिता के साथ सरकार फैसले ले रही है, उससे यह तो तय है कि कोरोना संक्रमण की चेन अब तोड़ी नहीं जा सकती। जब देश में मामले सौ के पार नहीं हुए थे, तब ही अगर टेस्टिंग करने पर अधिक जोर दिया जाता तो इस पर शायद काबू पाया जा सकता था।

लेकिन तब सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब पुरानी बातों को दोहराने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि सरकार शायद अब भी अपनी गलतियों से सबक लेने तैयार नहीं है। आज प्रधानमंत्री मोदी की मन की बात को सुनकर तो ऐसा ही लगा। वे अब भी यही जतलाने में लगे हैं कि भारत इस बीमारी के खिलाफ एकजुटता से, संकल्पशक्ति से लड़ रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है। देश में एकजुटता की कल्पना अच्छी लगती है, लेकिन सच ये है कि इस लड़ाई में अमीरों और गरीबों में कोई एकजुटता नहीं दिखी।

बल्कि धन का वर्गविभेद पहले से अधिक क्रूर रूप में नजर आया है। मोदीजी ने आखिरकार गरीबों को हुई तकलीफ का जिक्र करते हुए कहा कि इस संकट की सबसे बड़ी चोट अगर किसी पर पड़ी है तो वो हमारे गरीब, मजदूर, श्रमिक वर्ग पर पड़ी है। उनकी तकलीफ, उनका दर्द, उनकी पीड़ा शब्दों में नहीं कही जा सकती है। बेशक सरकार कामगारों की तकलीफ को शब्दों में बयां न करे, लेकिन दिल से महसूस करे, और उनकी तकलीफ को दूर करने की ईमानदार कोशिश करे यह ज्यादा जरूरी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने अभी जो फैसले लिए हैं उससे गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और लघु उद्योग से जुड़ी विशाल संभावनाएं खुली हैं। सवाल ये है कि ये संभावनाएं फलीभूत कब होंगी। कब जमीन पर इनका असर दिखना शुरु होगा। मार्च के आखिर से शुरु लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर दिया है। शहरों से गांवों की ओर लौटे इन कामगारों के सामने जीवनयापन की गंभीर समस्या खड़ी है, जिसके लिए तत्काल मदद की जरूरत है, ताकि इन्हें जिंदा रहने में मदद मिले। केवल भविष्य की बात करके वर्तमान नहीं काटा जा सकता।

कामगारों के सामने रोजगार के सवाल के साथ-साथ स्वस्थ रहने की चुनौती भी है। जिनके पास दो वक्त की रोटी नहीं, उनके लिए सेनेटाइजर तो बहुत दूर की बात है, बार-बार हाथ धोने के लिए साबुन और पानी का इंतजाम भी मुश्किल होगा। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, गुड़गांव, बंगलुरू जैसे शहरों से गांवों की ओर लौटे कामगारों के खुद संक्रमित होने और संक्रमण को फैलाने की आशंकाएं प्रबल हैं। ऐसे में इन्हें कहीं भी नौकरी मिलने में कितनी कठिनाइयां आएंगी, क्या सरकार ने इनके बारे में सोचा है। क्या सरकार पीएम केयर्स फंड से इनके कल्याण की योजनाएं बना रही है। 

लॉकडाउन 5 या अनलॉक 1 के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अब चल पड़ा है, खुल गया है. ऐसे में, हमें और ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है। मगर यह सतर्कता किस तरह बरती जाएगी। क्योंकि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मॉल्स, धार्मिक स्थल, होटल, रेस्तरां सब खुल जाएंगे।  2 सौ ट्रेनों और विमानों के कारण आवाजाही बढ़ जाएगी। अब एक राज्य से दूसरे राज्य जाने की भी छूट रहेगी। इससे संक्रमण का जो खतरा बढ़ेगा, क्या उसके लिए मोदी सरकार ने कोई पुख्ता योजना बनाई है। अगर बीमारों की संख्या तेजी से बढ़ती है तो क्या हमारे पास इलाज के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं। क्या कोरोना काल में लगातार ड्यूटी में लगे डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक मजबूती को परखने की कोशिश सरकार ने की है।

आयुष्मान भारत योजना, आयुष मंत्रालय का योग को बढ़ावा देना, माई लाइफ, माई योग जैसी प्रतियोगिता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोशल मीडिया के जरिए आयोजित करना, लोकल के लिए वोकल, आत्मनिर्भर भारत अभियान, कोरोना से बचने के लिए इनोवेशन आदि पर भी मोदीजी ने मन की बात की। लेकिन इन सबसे कोरोना संकट का सामना कैसे किया जा सकता है, इसका कोई सूत्र नहीं मिला। सरकार का रवैया ऐसा है मानो वह खुद लॉकडाउन में है औऱ गप्पें मारकर समय बिता रही है।

मोदीजी को इस वक्त बताना चाहिए था कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनें कब समय से, सही सलामत लोगों को पहुंचाएंगी। जब इन गाड़ियों का संचालन रेलवे ठीक से नहीं कर पाया तो क्या 2 सौ और ट्रेनें उससे संभल जाएंगी। आने वाले समय में एक के बाद एक त्योहार पड़ेंगे और धार्मिक स्थलों पर भीड़ उमड़ेगी, क्या इसे संभालने के लिए प्रशासन तैयार रहेगा।

लॉकडाउन या अनलॉक का खेल राजनीति समझ सकती है, कोरोना का वायरस नहीं। वह तो जहां मौका मिलेगा, वहां अपना विस्तार कर लेगा। इसलिए मोदीजी को मन की बात में यह भी देशवासियों से कह देना चाहिए था कि वे अपना ख्याल खुद रखें, सरकार से अपेक्षा न रखें।

(देशबन्धु)

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