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-सुनील कुमार।।

आज जब पूरे देश से दुख-दर्द की खबरें आती जा रही हैं, और अलग-अलग राज्य सरकारों पर तोहमत आ रही है, खासकर केन्द्र सरकार पर तो सबसे अधिक आ ही रही है, तब छत्तीसगढ़ उससे अछूता नहीं है। यह राज्य कोरोना से निपटने में सबसे कामयाब राज्यों में से एक माना गया क्योंकि यहां कोरोना का हमला सीमित रहा। राज्य सरकार को खासी वाहवाही मिली कि लॉकडाऊन के पहले ही दिन से इसने जो कड़ाई बरती, उसी का नतीजा है कि यहां कोरोना सीमित रहा, इलाज की तैयारी खूब हो गई, और पहली या दूसरी कोरोना मौत जो सामने आई है वह भी इस राज्य से गुजरते हुए, एक प्रदेश में काम करते, और दूसरे प्रदेश में जाते हुए रास्ते में छत्तीसगढ़ में हुई मौत है। अभी हम इस पर जाना नहीं चाहते कि कोरोना के हमले के शुरुआती दौर में जब राज्य सरकार की अपनी तैयारियां बड़ी सीमित रही होंगी, उस वक्त राजधानी रायपुर में केन्द्र सरकार के चिकित्सा संस्थान, एम्स, का कितना योगदान रहा, और उसके बिना उस वक्त न जांच हो पाती, न ऐसा इलाज हो पाता। लेकिन कुछ हफ्तों के भीतर ही छत्तीसगढ़ में अस्पताल और जांच की ऐसी तैयारियां हो चुकी हैं, जो कि आज की तारीख तक काफी दिख रही हैं, आगे अगर कोरोना छलांग लगाकर आगे बढ़ेगा तो बात अलग है।

लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को अपनी कुछ कमियों और खामियों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। किसी भी खामी को सुधारने की शुरुआत उसके अस्तित्व को मानने से ही होती है। सरकार सार्वजनिक रूप से चाहे अपनी कोई भी खामी न माने, लेकिन हकीकत यह है कि इस राज्य में आने वाले मजदूरों को लाने की तैयारी में खासी देर हुई, और उन्हें लाने के बाद उनके रखने के इंतजाम में जगह-जगह भारी कमियां दिख रही हैं। इसके पीछे की वजह तो सरकार बेहतर समझेगी, लेकिन जो बात सामने आती है वह यह कि सरकार ने सब कुछ जिलों पर छोड़ दिया, और जिला प्रशासन ने सब कुछ पंचायतों पर छोड़ दिया। शायद पंचायतों को इसके लिए अलग से खर्च नहीं मिला है, और हो सकता है कि यह एक वजह हो कि जेब का पैसा लगाकर कुछ करने के बजाय पंचायतें कटौती में काम चला रही हों, या फिर बिना खर्च जैसे काम हो सकता है, वैसे कर रही हों। जिन जगहों पर लोगों को ठहराया गया है, वहां कहीं सांप के काटने से मौत हो रही है, तो कहीं बिच्छू काट रहे हैं। इन जगहों पर बदहाली भी बहुत बताई जा रही है, और कई मौतें हुई हैं, कुछ आत्महत्याएं भी हुई हैं। हम इन मौतों का अतिसरलीकरण करके उन्हें सीधे बदइंतजामी से जोडऩा नहीं चाहते क्योंकि जो मजदूर सैकड़ों मील पैदल चलकर आए हैं, जाहिर है कि वे बदहाल होंगे, उनका शरीर जवाब दे चुका होगा, कमजोरी के अलावा दूसरी बीमारियों की मार भी होगी, और वे मरने के लिए एक औसत व्यक्ति के मुकाबले कगार के अधिक करीब खड़े हुए होंगे। ऐसे लोगों में मरने वालों का प्रतिशत औसत मौतों से अधिक होना स्वभाविक है, और हो सकता है कि जो पौने दो लाख मजदूर बाहर से आए हैं, और सरकारी इंतजाम में ठहरे हैं, उनके बीच इतनी मौतें हमेशा होती हों, लेकिन वे इसके पहले मीडिया की खुर्दबीनी निगाहोंतले न रहती हों। आज चूंकि कोरोना, लॉकडाऊन, क्वारंटीन, आइसोलेशन, और प्रवासी मजदूर जैसी नई शब्दावली से जुड़ी हुई खबरों में आने वाली मौतें अलग गिनी जा रही हैं, इसलिए भी हो सकता है कि देश भर में बदइंतजामी और बदहाली पर एक अलग फोकस चल रहा हो। लेकिन फिर भी हमारा यह मानना है कि छत्तीसगढ़ जैसी सरकार जिसमें मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री दोनों ही लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहां पर इंतजाम की खामी नहीं रहनी चाहिए, उसके बाद भी अगर किसी को मौत आनी हैं, तो उसकी तोहमत के लिए लॉकडाऊन और लॉकडाऊन लागू करने वालों पर अलग से चर्चा की जा सकती है। छत्तीसगढ़ के बारे में हम इसलिए भी कहना चाहते हैं कि यहां सरकार प्रवासी मजदूरों की आवाजाही पर, उनके रहने-खाने के इंतजाम पर, और उनकी जांच-इलाज पर खासा खर्च कर रही है, और इसके बाद जिस स्तर पर भी जहां बदइंतजामी हो रही है, उसे रोकना चाहिए। ऐसे में अलग-अलग मीडिया या सोशल मीडिया में आने वाली खबरें और जानकारी गंभीरता से लेकर चीजों में तुरंत सुधार लाना चाहिए। हम यह बात मानते हैं कि हिन्दुस्तान के किसी भी प्रदेश की सरकार ने कभी इतने व्यापक और इतने बड़े इंतजाम का बुरा सपना देखा भी नहीं होगा। ऐसे में बहुत से लोगों को यह भी लग सकता है कि सिर पर आ गिरी इस विकराल विपदा से जूझती हुई सरकार की खामियों को नहीं गिनाना चाहिए। लेकिन हम ऐसे तर्क पर भरोसा नहीं करते। हमारा मानना है कि ये हालात बहुत लंबे खिंच सकते हैं, और इसके चलते-चलते ही इस तजुर्बे से सीखकर इसे बेहतर बनाने की जरूरत है।

छत्तीसगढ़ को एक फायदा यह रहा कि वह देश की किसी सरहद से लगा हुआ प्रदेश नहीं है। लेकिन एक नुकसान यह रहा कि यह आधा दर्जन पड़ोसी राज्यों के बीच का ऐसा प्रदेश है कि जिससे होकर ही आवाजाही हो सकती है, और यहां तक कि मुम्बई से कोलकाता जाने वाली ट्रक और बस भी, साइकिलों पर जत्थे भी सड़क के रास्ते छत्तीसगढ़ से होकर जा रहे हैं। केन्द्र सरकार ने जिस अंदाज में लॉकडाऊन शुरू किया, जैसी शर्तें लागू कीं, और बाद में जिस रफ्तार से मनमानी ढील दीं, छत्तीसगढ़ में उनमें से कई बातों का जमकर विरोध भी किया, लेकिन ऐसे हालात में केन्द्र के विरोध की एक सीमा हो सकती थी।

इस मुद्दे पर लिखते हुए यह बात कुछ अटपटी होगी अगर हम सरकार के ताजा तबादलों के बारे में न लिखें। तीन चौथाई जिलों के कलेक्टरों को इस चुनौती के बीच, और मनरेगा के व्यापक कामों के चलते हुए जिस तरह बदला गया, उसने शासन-प्रशासन के जानकार लोगों को बड़ा हैरान किया है। अभी बारिश और खेती का काम शुरू होने तक तो मनरेगा के कामों पर बहुत अधिक ध्यान देना है, और बाहर से आ रहे, आ चुके, मजदूरों के इंतजाम पर भी। ऐसे सबके बीच तकरीबन तमाम जिलों में कलेक्टर, या जिला पंचायत सीईओ, कई म्युनिसिपल कमिश्नर को बदल देना हैरान कर रहा है, लेकिन कोई भी सरकार अपनी प्रशासनिक सोच के पीछे की वजहों को बताती तो है नहीं। खैर, सरकार को जो करना था वह कर चुकी है, आगे जो करना है उसी के बारे में बारीकी से ध्यान देकर सुधार करने की सलाह हम दे सकते हैं। वे तस्वीरें विचलित करती हैं जिनमें जमीन पर बिछे एक अखबारी पन्ने पर मजदूर खाना खा रहे हैं। अखबार के उस एक पन्ने पर खाने की तस्वीरें दर्जनों अखबारों के लाखों पन्नों पर छपी हैं। सरकार को उपलब्धि की आत्मसंतुष्टि में नहीं फंसना चाहिए, बल्कि असंतुष्ट रहते हुए अपने इंतजाम को हर पल बेहतर बनाने की चुनौती मंजूर करनी चाहिए। और यह बात हम सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य के बारे में नहीं कह रहे हैं, कमोबेश ऐसी खामियां और ऐसी चूकें देश भर के प्रदेशों से आ रही हैं, और केन्द्र सरकार के बहुत से विभागों का तो इसके मुकाबले भी बहुत ही बुरा हाल है, लेकिन उसके बारे में हम अलग से लिखते आए हैं।

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