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कोरोना के भयावह संकट और सरकार के फैसलों के कारण देश के कामगार तबके पर मुसीबत के दोहरे पहाड़ टूटे, जिस पर अब तक विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से सरकार को सिलसिलेवार सुझाव दिए जा रहे थे। कई बार कांग्रेस ने कोरोना से निपटने में सरकार को सहयोग देने की बात भी कही। लेकिन जब मोदी सरकार ने अपनी मनमानी जारी रखी तो आखिरकार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर स्पीक अप इंडिया अभियान की शुरुआत की। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि देश विभाजन के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी से गुजर रहा है।  गरीब, मजदूर, छोटे कारोबारी और किसान परेशान हैं। देश में हर व्यक्ति उनकी पीड़ा को महसूस कर रहा है। लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। हमने बार-बार सरकार को चेताया लेकिन सरकार समझने को तैयार नहीं है। इसलिए कांग्रेस ने भारत की आवाज बुलंद करने का सामाजिक बीड़ा उठाया है। ‘सरकार को तुरंत खजाने का ताला खोलना चाहिए और गरीबों को राहत देनी चाहिए।’

उन्होंने कहा कि हर गरीब के बैंक खाते में अगले 6 महीने तक हर महीने 7500 रुपये डाले जाने चाहिए। मनरेगा के तहत साल में 100 दिन के बजाय 200 दिन काम दिया जाए। एमएसएमई क्षेत्र के लिए तुरंत एक पैकेज घोषित किया जाए। साथ ही सरकार मजदूरों को उनके घर लौटाने के लिए इंतजाम करे। कांग्रेस सांसद और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि देश को भारी संख्या में रोजगार देने वाले उद्योग एक के बाद एक बंद हो रहे हैं। हिन्दुस्तान को कर्ज की जरूरत नहीं है, आज देश को पैसों की जरूरत है। गरीब जनता को पैसे की जरूरत है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी गरीबों के खाते में नकद डालने की पैरवी करते हुए कहा कि ‘मैं खासकर भाजपा से कह रही हूं कि राजनीति मत करिए। यह सबको मिलकर गरीबों का साथ देने का समय है। विचारधारा से ऊपर उठने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश सरकार ने बसों पर राजनीति की।

महाराष्ट्र में सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। आज देश की जनती दुखी है, तड़प रही है। सरकार उनकी मदद नहीं कर रही है। हम मानवीयता के आधार पर मांग कर रहे हैं, हम सब दुख की घड़ी में उनका साथ दें।’ कांग्रेस और गांधी परिवार के यूं सोशल मीडिया के जरिए सरकार को सुझाव और सरकार की आलोचना से भाजपा का बौखलाना तय है। जिस तरह हर बात पर भाजपा अतीत राग छेड़ देती है, संभव है इस बार भी अपनी गलतियां मानने की जगह, कांग्रेस के दिए सुझावों पर विचार करने की जगह वह देश के सामने यह गिनाना शुरु कर देगी कि कांग्रेस के शासनकाल में किस तरह की त्रुटियां थीं, कौन-कौन से घोटाले हुए थे। इस तरह की रणनीति से भाजपा कुछ देर का राजनैतिक लाभ शायद हासिल कर ले, लेकिन देश को नुकसान के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर छेड़े गए इस अभियान पर इंडिया यानी भारत से बोलने की अपील की है।

इस अपील को भारत का कितना समर्थन मिलता है या भाजपा की सोशल मीडिया आर्मी इसकी काट के लिए कौन सा नया अभियान छेड़ती है, यह तो जल्द ही सबके सामने होगा। लेकिन एक बात तय है कि सुखी-संपन्न वर्ग की आत्ममुग्धता और कायरता की हद तक की जा रही भक्ति देश के लाखों लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। अगर अब भी लोग नहीं बोलना चाहते तो उन्हें कुछेक तस्वीरें देख लेना चाहिए, शायद आंखों में दुख का नहीं तो शर्म का पानी ही उतर आए। 

एक तस्वीर है, जिसमें प्लेटफार्म पर एक मां की लाश रखी है और कफन के रूप में उसके बदन पर जो चादर है, उसे उसका मासूम बच्चा बार-बार खींच रहा है। वो शायद हैरान होगा कि उसके बुलाने पर भी उसकी मां जवाब क्यों नहीं दे रही। जिंदगी और मौत जैसे शब्द अभी उसकी जुबान और समझ से परे हैं। उस बच्चे को यह भी कैसे समझेगा कि उसकी मां हमेशा के लिए चुप हो गई, क्योंकि इस देश के हजारों संपन्न लोगों ने उसके हक में कभी कुछ नहीं कहा। और अभी भी सही बात पर बहानों की परत चढ़ाकर बोलने की कोशिश की जा रही है। बिहार की ओर गई श्रमिक स्पेशल ट्रेन में इस महिला की मौत हुई है। परिजनों के अनुसार, खाना और पानी न मिलने के चलते ट्रेन में महिला की स्थिति खराब हो गई और मुजफ्फरपुर पहुंचते-पहुंचते उसकी मौत हो गई। जबकि रेलवे का कहना है कि महिला पहले से बीमार थी।

मुजफ्फरपुर से ही एक प्रवासी मजदूर के साढ़े चार वर्षीय बेटे की मौत की भी सूचना मिली है। मुजफ्फरपुर में रेलवे स्टेशन पर बच्चे की मौत हो गई जबकि उसका पिता अपने बच्चे के लिए दूध की तलाश में भटक रहा था। यहां भी रेलवे ने पहले से बीमारी का ही कारण बताया है। वैसे गरीबी अपने आप में एक बड़ी बीमारी है, जिसे पूंजीवादी सोच ने लाइलाज बना दिया है। रेलवे ने बहुत ना-नुकुर के बाद ट्रेनें चलानी तो शुरु की हैं, लेकिन जिन मजदूरों के लिए यह कदम उठाया गया, उन्हें अगर इंसान समझने की तकलीफ सरकार और प्रशासन ने उठाई होती तो उन्हें 10-12 घंटों की अनावश्यक देरी और लंबे चक्कर की जगह जल्द पहुंचाने के बारे में सोचा होता।

कैसी विडंबना है कि सोमवार से बुधवार तक 48 घंटों के दौरान श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में नौ यात्रियों की मौत हुई है और सरकार को अब भी लगता है कि वह जो कर रही है, सही कर रही है। आज सुप्रीम कोर्ट में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और बदहाली पर जो सुनवाई हुई, उसमें केंद्र की ओर से जिस तरह के तर्क रखे गए, उससे साफ समझ आता है कि सरकार किसी भी तरह अपनी कमजोरी को स्वीकार नहीं करने वाली। केंद्र की ओर से कहा गया कि कुछ घटनाएं हुई हैं जिन्हें बार-बार दिखाया जा रहा है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार इस पर काम कर रही हैं।

सरकार का कहना है कि ‘दो कारणों से लॉकडाउन लागू किया गया था। पहला तो कोविड संक्रमण की कड़ी तोड़ने के लिए और दूसरा अस्पतालों में समुचित इंतजाम कर लेने के लिए। जब मजदूरों ने लाखों की तादाद में देश के हिस्सों से अचानक पलायन शुरू किया तो उनको दो कारणों से रोकना पड़ा। एक तो इनके जरिए संक्रमण शहरों से गांवों तक न फैल पाए। दूसरा ये रास्ते में ही एक-दूसरे को संक्रमित ना कर पाएं। सरकार ने अब तक 3700 से ज़्यादा श्रमिक एक्सप्रेस विशेष ट्रेन चलाई हैं। ये गाड़ियां तब तक चलेंगी जब तक एक भी प्रवासी जाने को तैयार रहेगा।’ इसी तरह ट्रेनों के किराए, रास्ते में भोजन के इंतजाम आदि पर भी केंद्र ने अपने तर्क रखे। लेकिन इन खोखले तर्कों से न उन मजदूरों की जिंदगी वापस मिल सकती है, जिन्होंने सफर के बीच में दम तोड़ दिया, न उनके भविष्य के लिए कोई पुख्ता इंतजाम दिखता है। 

इस बीच खबर है कि  सीएमआईई ने एक अनुमान जताया है कि देश में 12.2 करोड़ लोगों को पिछले महीने अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी और लॉकडाउन का यह छोटा सा नमूना है। इधर वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 1.2 करोड़ लोग बहुत ही गरीबी के दायरे में फिसल गए हैं और इनके लिए आजीविका का संकट खड़ा हो गया। हांडी के भात के एक दाने की तरह ये अनुमान बता रहे हैं कि देश में भविष्य कितना भयावह होने वाला है। इसके बाद भी अगर समाज चुप रहने में ही भलाई समझता है, तो ऐसी चुप्पी के नतीजे भी उसे ही भुगतने होंगे।

(देशबन्धु)

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