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-सुनील कुमार।।
बच्चों के स्कूल-कॉलेज बंद हैं, और लॉकडाऊन में ढील के बावजूद लोगों के पास समय कुछ अधिक है क्योंकि अब न सिनेमाघर जाना है, न मॉल, और न ही किसी रेस्तरां। पिकनिक की भी कोई संभावना नहीं है, न किसी दौरे की, न किसी बड़े जलसे या दावत की। ऐसे में घरों के भीतर परिवार का एक-दूसरे के साथ समय अधिक गुजर रहा है। कुछ लोग टीवी देखते हुए थक गए हैं, कुछ लोग मोबाइल फोन पर ऊंगलियां दुख जाने की हद तक वक्त गुजार चुके हैं। ऐसे में एक जरूरी काम बहुत कम लोगों ने किया होगा, वह है परिवार के लोगों की सामाजिक जागरूकता बढ़ाना, और सामाजिक सरोकारों के बारे में चर्चा करना। आज के मॉल-युग में लोगों की सामाजिक चेतना मिट्टी में मिली हुई है, और समाज के जरूरतमंद लोगों के प्रति जवाबदेही गिने-चुने लोगों में ही हैं, उन्हीं लोगों में जो आज तपती-सुलगती धूप में भी प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए सड़कों पर डटे हुए हैं। ऐसे में परिवारों के लोग पहले तो खुद को कुछ जागरूक कर लें, और फिर बाकी लोगों के साथ सामाजिक सरोकार की चर्चा करें, अपनी जिम्मेदारी की भी।

इस मुद्दे पर लिखना जरूरी इसलिए लगा कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन के पास की एक रईस बस्ती में इन दिनों वॉट्सऐप पर एक अभियान चल रहा है। वहां के निर्वाचित पार्षद की अगुवाई में तेजी से यह जागरूकता फैलाई जा रही है कि स्टेशन पहुंचने के पहले जब इस कॉलोनी के बगल में ट्रेन रूकती है, और मुसाफिर नीचे कूदकर आसपास पानी ढूंढते हैं, तो इन लोगों को पानी न दिया जाए। उन्हें पानी देने से कॉलोनी की सेहत खतरे में आ सकती है। ऐसे संदेशों के साथ जो वीडियो और तस्वीरें एक-दूसरे को भेजे जा रहे हैं, उनमें किसी दुमंजिला मकान की छत से पाईप नीचे लटकाकर कोई पानी दे रहे हैं, जिसे मजदूर बारी-बारी से बोतलों में भर रहे हैं। जो मजदूर ट्रेन में भूखे-प्यासे मर जा रहे हैं, उन मजदूरों को भी दो मंजिल ऊपर से पाईप से पानी देने में जिनको अपनी बस्ती खतरे में दिखती है, वे मानो एक टापू पर रहना चाहते हैं। इस विषय पर चल रही बहस की भाषा देखें तो हैरानी होती है कि सामाजिक सरोकार, इन दो शब्दों के हिज्जे का कोई अक्षर भी शायद इन्हें छू नहीं गया है जो 20 फीट लंबा रबर पाईप लटकाकर भी प्यास से मरते लोगों की मदद करने को बस्ती पर खतरा मान रहे हैं।

एक दूसरा वीडियो या रेलवे स्टेशनों से एक से ज्यादा वीडियो हवा में तैर रहे हैं जिनमें देश के कुछ रेलवे स्टेशनों पर मजदूर खाने-पीने के सामानों पर झपट रहे हैं, आपस में छीनाझपटी कर रहे हैं, और लूटकर ले जा रहे हैं। जिन मजदूरों को एक-एक हफ्ते बिना खाना-पानी इस गर्मी में ट्रेन में वक्त गुजारना पड़ रहा है, वे अगर खाने के लिए किसी का गला नहीं काट रहे, तो वह भी समाज पर एहसान कर रहे हैं। जिनको भूखों के खाना लूटने पर वे लोगों को लुटेरे दिखते हैं, उन्हें अपनी समझ सुधारनी चाहिए। लुटेरे तो वे उस दिन होंगे जिस दिन दवा दुकानों में कोरोना से बचने की वैक्सीन बिकने आएगी, और गरीबों के पास उसे खरीदने का पैसा नहीं होगा, और वे उसे लूटकर ले जाएंगे। तरह-तरह की टैक्स चोरी करने वाले तबके को कई दिनों की भूख मिटाने के लिए लूट लिया गया खाना जुर्म लग रहा है, और समाज को यह भी जरूरी नहीं लग रहा है कि ऐसे बेबस लोगों को पानी भी दिया जाए। ऐसे समाज को सामाजिक जिम्मेदारी, तथाकथित इंसानियत, और लोकतंत्र के भीतर सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना पढ़ाने की जरूरत है। जिन लोगों को लग रहा है कि वे औरों को भूख-प्यास से मरते हुए छोड़कर बीच में अपने एयरकंडीशंड टापू में चैन से रह सकते हैं, उन्होंने दुनिया के दूसरे देशों में आर्थिक असमानता और शोषण के चलते पनपे और बढ़े गृहयुद्ध देखे नहीं हैं। अभी कुछ दशक ही हुए हैं जब ओडिशा से एक कारोबारी जात के लोगों को मार-मारकर भगाया गया था क्योंकि स्थानीय लोगों का यह सोचना था कि वे शोषण करते हैं।

यह देश लोकतंत्र आने की पौन सदी मनाने जा रहा है, लेकिन लोकतंत्र की परिपक्वता से न सिर्फ कोसों दूर है, बल्कि और दूर बढ़ते चल रहा है। बीच के बरसों में लोगों की सोच कुछ बेहतर हुई भी थी, तो अब वह घोर साम्प्रदायिक, घोर धर्मान्ध, और नफरतजीवी हो चुकी है। राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत ही नफरत का सैलाब लोगों को तमाम किस्म के सामाजिक सरोकारों से बहाकर दूर ले गया है। अब लोगों की बहुसंख्यक आबादी को ऐसा लगता है कि अगर वे राष्ट्रवाद के प्रतीकों को उठाकर चल रहे हैं, तो सड़क किनारे दम तोड़ते इंसान को भी उठाकर एम्बुलेंस में धरना उनकी राष्ट्रीय जिम्मेदारी नहीं रह गई है। राष्ट्रवाद ने एक किस्म से लोगों को तथाकथित इंसानियत से भी दूर कर दिया है, उस जिम्मेदारी का बोझ भी अब वे महसूस नहीं करते क्योंकि अब उनके दोनों हाथों में तिरंगे झंडे का डंडा है।

जितने लोग राष्ट्रवादी होने का दावा कर रहे थे, जितने लोग अपने आपको कभी सेवक लिख रहे थे, कभी चौकीदार बन रहे थे, हिन्दुस्तान की वैसी दस-बीस फीसदी आबादी अगर मुसीबत के पिछले महीनों में मजबूर-मजदूरों का साथ देने सड़कों पर उतर आती, तो न किसी को पैदल चलना पड़ता, और न ही कोई भूख से मरते, कोई बच्चा सड़क पर जन्म लेता, न ही कोई बच्चा सड़क पर दम तोड़ता। लेकिन इस तथाकथित नफरत-आधारित और आत्मकेन्द्रित राष्ट्रवाद ने लोगों से बाकी चेतना छीन ली है, और जिस तरह किसी ईश्वर के पूर्णकालिक उपासक आराधना से परे और किसी बात को महत्वपूर्ण नहीं मानते, कुछ वैसा ही हाल इन तथाकथित हिंसक राष्ट्रवादियों का देखने मिला है जिन्होंने मजदूरों को पानी भी देने से एक-दूसरे को मना कर दिया। देश भर में वामपंथी राजनीतिक दलों से जुड़े हुए मजदूर संगठन ऐसे हैं जो कि रात-दिन अपनी बहुत सीमित ताकत का भरपूर इस्तेमाल करते हुए भूखों को खाना दे रहे हैं, मजदूरों को शरण दे रहे हैं, पैदलों को गाडिय़ां जुटाकर दे रहे हैं, और देश के भीतर सद्भावना बरकरार भी रख रहे हैं। हमने पिछले दिनों खूब मालूम करने की कोशिश की कि इस देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा से जुड़े हुए मजदूर संगठन भी क्या सड़कों पर कुछ कर रहे हैं? उनके बहुत से लोगों से बात करने के बाद भी कोई एक मिसाल सामने नहीं आ सकी कि भूखे-बेबस मजदूरों के लिए ये बड़े-बड़े मजदूर संगठन कुछ कर रहे हों।

यह वक्त इस देश में साफ-सफाई सिखाने से परे, सामाजिक जवाबदेही और सामाजिक सरोकार को सिखाने का वक्त भी है। साफ-सफाई तो अलोकतांत्रिक देशों में भी लोग सीख सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारी के लिए लोकतांत्रिक समझ होना जरूरी है। हिन्दुस्तान में करोड़ों मजदूर आज मौत के कगार पर चलते हुए इसलिए सफर करते रहे कि देश के प्रधानसेवक से लेकर करोड़ों चौकीदारों तक में सामाजिक सरोकार की कमी रही। यह सामाजिक सरोकार 21वीं सदी का कोई नया जुमला नहीं है, गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी सामाजिक सरोकार के लिए लगाई, और नेहरू ने भी। आज गांधी और नेहरू से नफरत की बुनियाद पर जो 21वीं सदी खड़ी की जा रही है, वह एक हिंसक टापू है जिसका दुनिया में इस तरह से अकेले अलग-थलग जीना बहुत लंबे समय तक नहीं चल पाएगा। पिछले दिनों आरएसएस के मुखिया ने राष्ट्रवाद शब्द को सीधे हिटलर की याद दिलाने वाला करार दिया, और उससे परहेज करने की सलाह दी, उसे इस्तेमाल न करने को कहा। इसके पहले बरसों से जो लोग एक भालानुमा डंडे पर राष्ट्रवाद का झंडा लेकर चलना हिन्दुस्तानियों का अकेला सरोकार बनाए चल रहे थे, उनकी बोलती आरएसएस मुखिया के सार्वजनिक भाषण के बाद कुछ बंद है। लेकिन कांग्रेस हो, भाजपा हो, या आरएसएस, या इनमें से किसी संगठन ने अपने सारे के सारे लोगों को लॉकडाऊन के शिकार लोगों की मदद करने में झोंका है? और अगर नहीं झोंका है, तो यह एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक चूक है कि समर्थकों की फौज रहते हुए भी घरों में बंद रहने को सब कुछ मान लिया गया, ताली-थाली बजाने को सब कुछ मान लिया गया, और एक भी संगठन ने अपने लोगों को सड़कों पर नहीं झोंका। ऊंगलियों पर गिने जा सकने वाले वामपंथी तकरीबन सारे के सारे सड़कों पर दिखते हैं, राशन पहुंचाते दिखते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के करोड़ों लोग कहां हैं और क्या कर रहे हैं? अगर उसका एक-एक सक्रिय सदस्य एक-एक मजदूर को दुपहिए पर भी अगले जिले तक छोडऩे का काम करता, तो एक भी मजदूर पैदल नहीं चले होते। इसी तरह हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी के लोगों को जुटाया गया होता, लगाया गया होता, तो भी मजदूरों की दूरी तय करने की जरूरत उनकी सीमा के भीतर होती। लेकिन ऐसे वक्त जब पैदल चलते-चलते लोग मर रहे हैं, बड़े-बड़े संगठनों के लोग बंद घरों के भीतर रहकर देश पर अहसान करना महसूस कर रहे थे, कर रहे हैं। ऐसे में ट्रेन के मजदूरों को बिना पानी मार डालने की सोच कोई अधिक हिंसक नहीं है।

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