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देश में कोरोना के मामले डेढ़ लाख के पार हो चुके हैं। तबाह अर्थव्यवस्था में बेरोजगारों और प्रवासी कामगारों के सामने जीवनयापन का कठिन प्रश्न खड़ा हो गया है। लाखों जिंदगियां अपने भविष्य को लेकर फिक्रमंद हैं, लेकिन केंद्र सरकार को लगता है कि कोरोना से निपटने का उसका तरीका सही है, और कामयाब भी। भले ही 4-4 लॉकडाउन के बावजूद मरीजों की संख्या डेढ़ लाख पहुंचने में अधिक वक्त नहीं लगा, सरकार को लगता है कि उसने जो किया सही किया।

सरकार को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि इस वक्त कोई दूसरे तरीके से सोचने या दूसरे विकल्पों के बारे में सुझाव करने के लिए जानकारों से बात करे। या शायद सरकार को यह मंजूर नहीं कि कांग्रेस या गांधी परिवार से कोई भी सदस्य कोरोना में जनसामान्य के हितों पर बात करे और सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए। कुछ दिन पहले जब राहुल गांधी ने सुखदेव विहार में मजदूरों से सड़क पर बैठकर बात की, तो वित्त मंत्री ने उस पर तंज कसा था कि उनका समय राहुल ने बर्बाद किया। ट्रोल आर्मी ने सोशल मीडिया पर राहुल गांधी को लेकर झूठ फैलाने की भी कोशिश की। लेकिन झूठ के पांव नहीं होते, इसलिए वो अधिक देर तक टिकता नहीं है।

राहुल गांधी लगातार प्रेस से और जनसामान्य से मुखातिब हो रहे हैं, साथ ही आर्थिक, सामाजिक मामलों के जानकारों से भी चर्चा कर रहे हैं ताकि कोरोना से निकलने की कोई राह सूझे। पहले उन्होंने अभिजीत बनर्जी और रघुराम राजन से बात की और अब प्रो.आशीष झा और स्वीडन के प्रोफेसर जोहान से बात की। भारतीय मूल के अमेरिकी लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञ आशीष झा का कहना है कि भारत को लॉकडाउन और कोरोना जांच को लेकर रणनीति बनानी होगी।

उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव के साथ ही इसका मनोवैज्ञानिक असर भी है और सरकारों को इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है।  राहुल गांधी एक विपक्षी दल के सांसद हैं और अगर वे किसी से कोई चर्चा करते हैं या कोई सुझाव मांगते हैं तो उसे लागू करना या न करना उनके हाथ में नहीं है। यह काम तो सत्ता में बैठे लोग ही कर सकते हैं। लेकिन सरकार का रवैया तो इस समय लाजवंती के पौधे की तरह हो रहा है। 

लॉकडाउन के अपने फैसले को लेकर सरकार इतनी संवेदनशील है कि उसकी जरा सी भी आलोचना उससे बर्दाश्त नहीं हो रही। राहुल की इस चर्चा के सामने आने के बाद केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने उन पर देश को गुमराह करने, झूठ फैलाने और कोरोना के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करने का आरोप लगा दिया। रविशंकर प्रसाद ने भारत की कामयाबी को बताते हुए कहा कि देश में अब तक सिर्फ 4345 लोगों की मौत हुई। दूसरी तरफ दुनिया में 3 लाख से ज्यादा मौंतें हुईं है। लॉकडाउन से देश को फायदा हुआ है।

अगर भारत में बाकी बड़े देशों के मुकाबले कम मौतें हुई हैं और रिकवरी ज्यादा हो रही है तो इसका श्रेय लॉकडाउन को ही जाता है। सरकार बड़े देशों से मौत के आंकड़ों की तुलना करके खुश है, क्योंकि उसने शायद यह देखा ही नहीं कि लॉकडाउन के कारण जिन जिंदगियों को बचाने का दावा वो कर रही है, वो किस तरह दांव पर लग गई है। मई भी खत्म होने को है, लेकिन प्रवासी कामगारों के दुर्दिन बीत ही नहीं रहे। किसी तरह उन्हें श्रमिक ट्रेनें मिलीं, तो अब उनके समयसाध्य सफर में तकलीफों का अंबार लग गया है।

भूखे-प्यासे मजदूर घंटों ट्रेन में फंसे हुए हैं। जो अपने गंतव्य तक पहुंच रहे हैं, वहां भी कभी चंरटीन सेंटर की बदहाली, कभी रोजगार की चिंता उन्हें परेशान कर रही है। जो लोग शहरों में अब तक रुके हुए हैं, उनके सामने भूख एक बड़ी चुनौती उभर कर सामने आई है। पहले हाथ के हुनर के बूते ये लोग दो वक्त की रोटी कमा लेते थे और कभी वो भी नहीं हुआ तो धार्मिक स्थलों के बाहर पेट भरने का इंतजाम हो जाता था। लेकिन अब ये लोग रोजाना हाथ फैलाकर खाना मांगने को मजबूर हो रहे हैं, उसमें भी कभी-कभी खाली हाथ लौटना पड़ता है। तपता मौसम भारत के कई शहरों में फंसे इन प्रवासी कामगारों, उनके अबोध बच्चों या असहाय मां-बाप पर कहर ढा रहा है। सरकार क्या मजदूरों की इस हालत को भी अपनी कामयाबी बता सकती है।

प्रवासी कामगारों को हो रही परेशानियों का उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को स्वत: संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह ने दो पेज के अपने ऑर्डर में कहा है कि लगातार मीडिया और न्यूजपेपर की रिपोर्ट उन्होंने देखी है और रिपोर्ट बताती है कि प्रवासी मजदूरों की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। अदालत ने कहा कि उन्हें इस समय नि:शुल्क भोजन और आवास की जरूरत है और संबंधित सरकारों को उन्हें राहत प्रदान करनी चाहिए। प्रवासी मजदूरों के लिए ये कठिन दौर है और इन्हें मदद की दरकार है।

अदालत का कहना है कि राज्य और केंद्र की सरकार ने कई कदम उठाए हैं लेकिन अभी भी ये तमाम प्रयास अपर्याप्त हैं और इसमें कमियां हैं। हम इस मामले में एकमत हैं कि प्रवासी मजदूरों के लिए प्रभावकारी व ठोस कदम उठाने की जरूरत है ताकि उन्हें मुसीबत से छुटकारा मिले। अब क्या मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट की इस बात का भी प्रतिवाद करेगी कि उसके उठाए कदमों को अपर्याप्त कैसे कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही है, वही कांग्रेस कह चुकी है, और कुछ अर्थशास्त्रियों की भी यही सलाह है कि सबसे पहले मजदूरों की सुध ली जाए, उन्हें तत्काल मदद पहुंचाई जाए। इन सुझावों पर अमल करना या न करना सरकार के हाथ में है। अगर अपनी हठधर्मिता छोड़कर, व्यापक हितों की खातिर दूसरों की बात मानी जाए तो इसमें हेठी नहीं होती, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी संवारने का श्रेय मिलता है। क्या मोदी सरकार ये श्रेय नहीं लेना चाहती।

(देशबन्धु)

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