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-नितिन ठाकुर।।

‘वह नि:संदेह एक चरमपंथी हैं, जो अपने वक्त से कहीं आगे की सोचते हैं, लेकिन वो इतने विनम्र और व्यवहारिक हैं कि रफ्तार को इतना तेज़ नहीं करते कि चीज़ें टूट जाएं. वह स्फटिक की तरह शुद्ध हैं. उनकी सत्यनिष्ठा संदेह से परे है. वह एक ऐसे योद्धा हैं, जो भय और निंदा से परे हैं. राष्ट्र उनके हाथों में सुरक्षित है.’

ये खाका खींचा था महात्मा गांधी ने नेहरू का. जगह थी लाहौर. साल था 1929 का और मौका था कांग्रेस से जवाहरलाल के परिचय का.

ये अचरज पैदा करता है कि बापू को देश की आज़ादी से 18 साल पहले आभास था कि नेहरू के हाथों में ये राष्ट्र सुरक्षित रहेगा. उन्हें ये अनुभव भी हो रहा था कि जवाहरलाल वक्त से कहीं आगे की सोचते हैं. क्या ही संयोग है कि दोनों ही बातें कालांतर में सच निकलीं. चौतरफा आलोचनाओं और राजनैतिक विरोधियों का निशाना बनते रहे नेहरू की सफलता इसी बात में है कि आज भी ना तो वो अपने विरोधियों और ना ही समर्थकों के लिए अप्रासंगिक हुए हैं. देश की ओर आखें तरेर रहीं चुनौतियों और उन चुनौतियों को पैदा करनेवालों के अभ्युदय का अहसास उन्हें दशकों पहले से था.
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हारी हुई कांग्रेस को लेना चाहिए नेहरू की बातों से सबक

पंडित नेहरू ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही समझ लिया था कि कांग्रेसी सुविधाभोगी जीवन जीने लगे हैं. वो देख रहे थे कि राज्यों में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. उन्हें ये भी ध्यान में आया कि देश के सबसे निचले तबके की समस्याओं पर तो अब भी गौर नहीं किया जा रहा. इसी सोच में डूबते-उतराते उन्होंने 3 जून 1949 को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को जो खत लिखा वो हार से हताश वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष को भी पढ़ना चाहिए. इसमें उनके काम का काफी कुछ है. वो सूत्र भी जो कांग्रेस को राख से फिनिक्स की तरह खड़ा कर सकती है.

‘गांव के लोगों से हमें वही पुराना इंसानी और निजी रिश्ता कायम करना होगा, जो रिश्ता एक जम़ाने में कांग्रेस के लोग बड़े कारगर ढंग से बनाया करते थे. हमारे लोगों को गांव और दूसरी जगहों पर जाना चाहिए. लोगों को हालात के बारे में और हमारी मजबूरियों के बारे में बताना चाहिए. अगर कोई रिश्ता दोस्ताना और इंसानी ढंग से बन जाए तो वह बहुत दूर तक जाता है. लगता है, ज़मीनी स्तर के ये निजी ताल्लुकात हम खो बैठे हैं. अब बहुत कम लोग उस तरह ज़मीन पर उतर रहे हैं, जैसे वे पहले उतरा करते थे.’

इस खत में वो जड़ से कटते कांग्रेसियों के संबंधों को रेखांकित कर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्रियों को संबोधित दूसरे खत में जो 4 जून 1949 को लिखा गया, नेहरू ने अहम नसीहतें दीं.

‘मुझे यह कहना पड़ेगा कि कांग्रेस के लोग सुस्त हो गए हैं. तेज़ी से बदलती दुनिया में दिमाग के जड़ हो जाने और मुगालते में रहने से ज़्यादा खतरनाक कोई चीज़ नहीं है. हम लोग सरकारी ज़िम्मेदारियों से दबे हुए हैं. हमें रोज़ समस्याओं के पहाड़ से टकराना होता है और उन्हें सुलझाने के लिए हम कोई कसर नहीं उठा रखते. बुनियादी मुद्दों के बारे में सोचने के लिए तो हमें वक्त ही नहीं मिलता.’

इसी खत में वो चेताते हैं.. ‘जनता के साथ हमारा संपर्क खत्म हो रहा है. हम जनता को हल्के में ले रहे हैं और ऐसा करना हमेशा घातक होता है. हम अपने पुराने नाम और प्रतिष्ठा के बल पर टिके हैं. उसमे कुछ दम है और हम उसी सहारे आगे बढ़ते रहे हैं, लेकिन पुरानी पूंजी हमेशा नहीं बनी रहेगी. बिना कमाए संचित पूंजी पर जीना अंतत: हमें दिवालियेपन की कगार पर ले जाएगा.’
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आखिरी में 2 जून 1951 का वो खत भी पढ़ लीजिए जिसमें नेहरू मुख्यमंत्रियों से पार्टी की अंदरुनी समस्या को खुलकर लिख रहे हैं.

‘हमारी कांग्रेस की राजनीति भी काफी हद तक हवा हवाई होती जा रही है. इस बात की खूब चर्चा हो रही है कि लोग कांग्रेस से जा रहे हैं और खासकर बड़े लोग कांग्रेस छोड़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद किसी भी बड़े मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस नहीं हो रही है. कोई सोचता होगा कि जब देश के सामने इतने बड़े-बड़े मुद्दे हैं तो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में उन पर ज़ोरदार बहस होनी चाहिए, लेकिन अब एआईसीसी ढुलमुल तरीके से मिलती है और अपना रुटीन काम करती रहती है. वहां इस बारे में चर्चा नहीं होती कि वह कौन-कौन सी बड़ी दिक्कते हैं जो देश को और कांग्रेस को बीमार कर रही हैं. लगता है, कहीं कुछ गड़बड़ी हो गई है. धीरे-धीरे हमारी राजनीति पार्लर वैरायटी होती जा रही है. मैं आशा करता हूं कि हम अपने आप को इस शिकंजे से निकाल लेंगे, क्योंकि यह किसी भी अच्छे काम के लिए बहुत बुरा है.’

नेहरू के इन तीन खतों से कांग्रेस की तत्कालीन समस्या और निदान के तरीकों को समझा जा सकता है लेकिन ये हैरान करता है कि पार्टी की समस्याएं आज भी वही हैं और जो समाधान खुद नेहरू ने सुझाए उन पर मिट्टी जमने दी गई. नेहरू का देहांत 27 मई 1964 को हुआ था जिसके बाद अधिकतर वक्त कांग्रेस पर नेहरू परिवार का ही वर्चस्व बना रहा. उतार-चढ़ाव से भरे कांग्रेस के सफर में 2014 और 2019 का चुनाव सबसे निराशाजनक रहा है. राहुल गांधी मंथन की स्थिति में हैं और पार्टी कार्यकर्ता सिर झुकाककर विश्लेषण में लगे हैं. ये सबसे सही वक्त है कि पार्टी आलाकमान नेहरू के खत और किताबों से धूल झाड़े और जड़ों की ओर लौटे. सारे फॉर्मूले वहीं मिलेंगे.

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