दवा की अर्जी के अरसे बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा श्रद्धांजलि के फूल लेकर मजदूर के घर

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-सुनील कुमार।।

उत्तर-पूर्वी राज्य में लोग पोस्टर लिए खड़े हैं, वे ऑनलाईन शिक्षा का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि ऑनलाईन शिक्षा गरीब बच्चों के खिलाफ जाती है क्योंकि भारत के गांवों में न इंटरनेट है, न लोगों के पास कम्प्यूटर है। अगर परिवार में कोई स्मार्टफोन है भी, तो उसे बड़े इस्तेमाल करते हैं और गरीब बच्चे उससे वंचित रह जाएंगे।

जब से कोरोना और लॉकडाऊन शुरू हुए हैं, यह बात अधिक, और अधिक खुलकर सामने आ रही है कि हिन्दुस्तानी समाज में संचित और वंचित के बीच पहले से चले आ रहा फासला किसी मुसीबत के वक्त और कितना बढ़ सकता है। इसने शहरी और ग्रामीण लोगों के बीच फासला खड़ा कर दिया, मालिक और कर्मचारी के बीच फासला खड़ा कर दिया, परिवार और घरेलू नौकरों के बीच फासला खड़ा कर दिया, इसने सड़कों पर दम तोड़ते मजदूरों और सरकार के बीच फासला खड़ा कर दिया, इसने सुप्रीम कोर्ट और उसकी जिम्मेदारी के बीच भी एक बड़ा फासला खड़ा कर दिया। जो सुप्रीम कोर्ट अर्नब गोस्वामी के गैरजरूरी मामले की सुनवाई के लिए खड़े पैर तैयार हो जाता है, उसे देश के मजदूरों के मामलों की सुनवाई में पूरे दो महीने लग गए। उसे यह समझने में भी दो महीने लग गए कि देश में मजदूर हैं, उनमें धड़कन हैं, उनके बदन हजारों किमी. पैदल चलने के हिसाब से नहीं बने हैं, गर्भवती महिला सैकड़ों मील चलने के बाद बच्चे को जन्म देकर फिर बकाया सैकड़ों मील चलने के हिसाब से नहीं बनी है। अब सारा कारवां गुजर जाने के बाद, हजारों रेलगाडिय़ां चलने के पहले करोड़ों मजदूरों के पैदल सफर हो जाने के बाद कल अचानक सुप्रीम कोर्ट जागा और उसने मजदूरों की समस्याओं पर केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। किसी मरीज के लिए दवा जरूरी थी, सुप्रीम कोर्ट श्रद्धांजलि के फूल लेकर एक मानवीय कहे जाने वाले अंदाज में खड़ा हो गया है। ऐसा लगता है कि संक्रमण के डर से जजों ने दो महीनों के अखबार नहीं देखे थे, और अब अचानक दो महीने के बंडल खोले, तो उन्हें लगा कि अब केन्द्र और राज्य सरकारों से जवाब लेने का समय आ गया है क्योंकि उनके जवाब आने तक सड़कों पर मजदूर की तकरीबन आखिरी मौत भी हो चुकी होगी। सरकारों के लिए इससे अधिक सहूलियत का अदालती रूख और क्या हो सकता है? इंदिरा गांधी आपातकाल में नाहक ही एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका की सोच को आगे बढ़ा रही थी, आज उसके लिए न इंदिरा की जरूरत रह गई है, न आपातकाल की। इस अदालती रूख ने देश के मजदूरों और संविधान के बीच एक गहरी और चौड़ी खाई खोद दी है। और इससे भी अधिक गहरी-चौड़ी खाई सुप्रीम कोर्ट और उसकी जिम्मेदारी के बीच खुदी हुई दिख रही है।

खैर, सुप्रीम कोर्ट का यह रूख नया नहीं है, और गिने-चुने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे हैं जो लगातार सोशल मीडिया पर इस रूख पर अपनी हताशा उजागर करते रहते हैं, और हम भी इस जगह पर अपनी राय रखते आए हैं। अब उत्तर-पूर्व से आई इन तस्वीरों पर जाएं जो कि स्कूली बच्चों के बीच ऑनलाईन पढ़ाई के खिलाफ हैं। आज देश कोरोना के खतरे से गुजर रहा है, और ऐसे में हिन्दुस्तान की सरकार ने अपना एक रूख पहले ही दिखाया जब वह दुनिया भर के देशों से सरकारी खर्चे पर अपेक्षाकृत संपन्न हिन्दुस्तानियों को मुफ्त में लेकर आई, और जो हिन्दुस्तानी देश छोड़कर नहीं गए थे, जो यहीं मजदूरी कर रहे थे, उन्हें खुले आसमानतले मरने के लिए खुला छोड़ दिया था। और तो और इस देश की दसियों हजार खाली पड़ी हुई रेलगाडिय़ों में इन मजदूरों की महीने भर से अधिक की त्रासदी के बाद भी रेलभाड़ा वसूलने के लिए हफ्ते भर तक मुद्दा तैरते रहा। और राज्यों से भाड़ा वसूलने के बाद केन्द्र सरकार की रेलगाडिय़ों का हाल यह है कि वे तीन दिन के सफर को कहीं छह दिन में पूरा कर रही हैं, तो कहीं आठ दिनों में। और न ट्रेन में खाना-पीना है न स्टेशनों पर, और ट्रेनों में भूख से भी मौतें हो रही हैं, और नवजात शिशु भी ट्रेन में ही जन्म लेते मारे जा रहे हैं। इससे भी सबसे गरीब, सबसे बेबस, हालांकि हिन्दुस्तानी, लोगों के प्रति केन्द्र सरकार का रूख दिख रहा है। यह पूरा सिलसिला बताता है कि सरकार की नजर में संपन्न और विपन्न, देसी, और आधे-परदेसी के बीच कितना फर्क है। अंतरराष्ट्रीय ऑनलाईन कंपनियों और मुहल्ले की किराना दुकानों के बीच कितना फर्क है। केन्द्र सरकार का रूख कदम-कदम पर पहले से दिखते आया है, और अपनी जिम्मेदारी की इस घनघोर अनदेखी की उससे भी बड़ी अनदेखी सुप्रीम कोर्ट करते रहा जब लोग बार-बार जनहित याचिका लेकर कोर्ट जाते रहे, इन्हीं मजदूरों के मुद्दे पर जाते रहे, तब कोर्ट ऐसे याचिकाकर्ताओं को बाहर खदेड़ते रहा। अब प्रवासी मजदूरों, उनके परिवारों, और बेघर-बेबस गरीबों को लेकर सुप्रीम कोर्ट जो रस्म अदायगी कर रहा है, पता नहीं वह उसके भी सारे जजों को प्रभावित कर सकेगा या नहीं।

छत्तीसगढ़ में भी स्कूली शिक्षा को ऑनलाईन किया गया है क्योंकि स्कूल और कॉलेज को खोलना पूरे देश में ही खतरनाक माना जा रहा है। ऐसे में ऑनलाईन पढ़ाई पहली नजर में अच्छी दिखती है कि सरकारी अमला कुछ तो कर रहा है। लेकिन यह भी समझना है कि सरकार का जनकल्याणकारी रूख क्या सचमुच समानता का ध्यान रख पा रहा है, या फिर बच्चों के बीच दो अलग-अलग तबके ठीक वैसे ही बंट जाएंगे जैसे कि कोटा जाकर इम्तिहान की तैयारी में सक्षम और उससे अक्षम बच्चों के बीच बंट जाते हैं। देश भर की सरकारों ने कोटा से संपन्न बच्चों को लाने के लिए तो बसें भेजीं, लेकिन अपनी ही माटी संतानों के प्रदेश लौटने पर सरहद पर उनको लाठियों से पीटा, खदेड़ा, और धमकियां दीं कि वे वापिस न आएं। कोटा को लेकर राज्य सरकारों का यह रूख उनके भीतर समानता की कमी का एक बड़ा सुबूत बनकर इतिहास में दर्ज हुआ है। अधिकतर राज्यों ने मजदूरों की वापिसी को रोकते हुए कोटा-कोचिंग से संपन्न बच्चों को वापिस लाने का काम किया। राजाओं के चारण और भाट सरीखे इतिहासकार तो इन बच्चों को वापिस लाने को सरकार का जनकल्याणकारी काम दर्ज करेंगे, लेकिन अब इंटरनेट जैसे अधिक लोकतांत्रिक, गरीब की अधिक पहुंचवाले सोशल मीडिया के आ जाने से गरीबों का इतिहास भी दर्ज होगा, मजदूरों का इतिहास भी दर्ज होगा, और यह तो बहुत अच्छी तरह दर्ज होगा कि कितनी मजदूर-मौतों के बाद, कितने करोड़ मजदूरों की त्रासदी और यातना के बाद सुप्रीम कोर्ट की नींद टूटी, और उसने लोकतंत्र के सुनहरे सपने से बाहर आकर देखा कि कहीं उसकी दखल देने की जरूरत है, और फिर उसने अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाना शुरू किया।

राज्य सरकारों को स्कूली बच्चों की ऑनलाईन पढ़ाई के पहले यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि वह अपनी खुद की सरकारी स्कूलों के बच्चों के भीतर तरह-तरह से भेदभाव कर रही है। छत्तीसगढ़ में तो हम सुनते हैं कि सरकार अंग्रेजी स्कूल शुरू कर रही है उन पर तो नियम-कायदे अलग लागू होंगे। मानो एक भाषा का हक दूसरी भाषा से कहीं अधिक होता है, और हिन्दी के मुकाबले अंग्रेजी स्कूलों का हक अधिक रहेगा। सरकार में यह कुलीन सोच पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और सरकार में तो लोग निर्वाचित होकर आते हैं, कम से कम उन्हें तो सामाजिक हकीकत को समझना चाहिए। दिक्कत आज यह है कि कोटा-कोचिंग और दिल्ली में यूपीएससी कोचिंग पाने वाला तबका बड़ी संख्या में अफसर बन रहा है, और वह इन दोनों कोचिंग पाने की ताकत न रखने वाले तबके की किस्मत का फैसला करने सरकारी कुर्सियों पर बैठता है। ऐसी बातें उन निर्वाचित लोगों को और भी समझ नहीं आती जो चाहे आए तो वंचित तबके से हों, लेकिन बड़ी तेजी से संचित तबके में दाखिल होकर ऊपर, और ऊपर पहुंचने लगते हैं। दिक्कत महज ऑनलाईन पढ़ाई नाम के भेदभाव की नहीं है, दिक्कत हवाई मुसाफिर और रेल मुसाफिर के बीच भेदभाव की भी है, दिक्कत मजदूर कानून में छूट पाते मालिक, और हिन्दुस्तानी नागरिक होने का इंसानी हक भी न पा रहे मजदूर के बीच भेदभाव की भी है। हिन्दुस्तान ऐसा लगता है कि समानता की बुनियादी लोकतांत्रिक समझ से ऊपर उठ चुका है, और यह नौबत कहीं से भी सुधरते नहीं दिखती है।

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