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देश में पूर्णबंदी के दो महीने पूरे होने के साथ ही भारत कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित 10 देशों में शुमार हो गया है। पहले 8-10 मामले एक साथ आ जाते थे तो बड़ी खबर बन जाती थी, अब छहृ-साढ़े छह हजार मामले एक-एक दिन में आ रहे हैं और इसे बड़ी खबर नहीं बनाया जा रहा है। सब खबरनवीसों का खेल है, कब किसे ब्रेकिंग या बड़ी खबर बनाना है, वे सत्ता के इशारे पर तय करते हैं।

देश गंभीर स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है, इस बात में दो राय नहीं हो सकती। 21 दिन में संक्रमण की चेन तोड़नी है, 18 दिन में महाभारत का युद्ध जीता गया था, सूतक जैसा ही लॉकडाउन है, ताली बजाने से कीटाणु दूर हो जाते हैं, गोमूत्र से इलाज संभव है, ऐसी तमाम बातें बकवास साबित हुईं। लेकिन अंधेर नगरी चौपट राजा वाला हाल अभी भारत का हो गया है, तो इन बातों को भी भरपूर कवरेज मिला। इधऱ मीडिया का राग दरबारी जारी था, उधर देश कोरोना के बढ़ते मरीजों के साथ एक-एक कर पायदान चढ़ रहा था। पिछले हफ्ते तक हम 11 वें स्थान पर थे, अब 10वें पर आ गए हैं। जो देश हमसे अभी आगे हैं, वहां नए मामले मिलने कम हो गए हैं, जबकि भारत में नए मामलों की संख्या और पॉजिटिविटि दर दोनों बढ़ रहे हैं।  

पॉजिटिविटी दर यानी जिन सैंपलों की जांच हुई उनमें से कितने प्रतिशत सैंपल कोविड पॉजिटिव पाए गए। आईसीएमआर के अनुसार अप्रैल की शुरुआत में पॉजिटिविटी दर 4.8 थी जो 16 अप्रैल से 28 अप्रैल के बीच में गिर कर 3.0 पर आ गई थी. लेकिन मई में यह दर फिर से बढ़ने लगी और अब यह दुगुने से भी ज्यादा बढ़ कर 7.0 पर आ गई है। इस बीच टेस्टिंग किट्स, पीपीई आदि की उपलब्धता, डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा आदि पर जो चर्चाएं होतीं थीं, वे भी धीरे से म्यूट कर दी गई हैं। सरकार अब भी अपनी वाहवाही करवाने में लगी है। जल्द ही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का वर्चुअल जश्न भी देखने मिलेगा। जिस समय किसी शासक की चिंता केवल और केवल जनता का स्वास्थ्य, उनकी आर्थिक समृद्धि होना चाहिए, उस वक्त हमारे हुक्मरान अपने मुंह मियां मिठ्ठू बने हैं। उन्हें नजर नहीं आ रहा कि देश में स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी लचर हैं।

अहमदाबाद के सिविल अस्पताल को लेकर हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की थी कि ये कालकोठरी जैसा है। वहीं अब दवाओं की कमी, मरीजों के साथ भेदभाव आदि को लेकर हाईकोर्ट ने जांच समिति बनाई है। गुजरात में 8 सौ से अधिक मौतें कोरोना के कारण हो चुकी हैं। उसके पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में भी हाल बुरे हैं। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार नहीं है, इसलिए भाजपा नेताओं को लगता है कि उद्धव सरकार लोगों की जान की रक्षा करने में असमर्थ है। भाजपा नेता नारायण राणे ने राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग भी कर दी है।

अगर लोगों की जिंदगी को सरकारों की जिम्मेदारी से सीधा जोड़ा जा रहा है, तो फिर देश में कोरोना के कारण हुई 4 हजार से अधिक मौतों, सैकड़ों प्रवासी कामगारों की भूख-प्यास या सड़क दुर्घटनाओं में मौत और लाखों जिंदगियों पर जान का जो संकट बन आया है, उसकी जिम्मेदारी किस पर बनती है, यह भी भाजपा नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए। वैसे दूसरों का हिसाब-किताब रखने में माहिर भाजपा कभी अपना गणित ठीक करेगी या नहीं, यह भी बड़ा सवाल है। हाल ही में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने सवाल उठाए हैं।

उप्र सरकार के मुताबिक लगभग 25 लाख लोग उप्र वापस आ चुके हैं। इनमें महाराष्ट्र से लौटे हुए 75 प्रतिशत, दिल्ली से लौटे हुए 50 प्रतिशत और अन्य प्रदेशों से लौटे 25 प्रतिशत लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। इस पर प्रियंका गांधी ने पूछा है कि- क्या मुख्यमंत्री जी का मतलब है कि उत्तरप्रदेश में 10 लाख से अधिक लोग कोरोना से संक्रमित हैं? मगर उनकी सरकार के आंकड़े तो संक्रमण की संख्या 6228 बता रहे हैं। उनके द्वारा बताए गए संक्रमण के आंकड़े का आधार क्या है?

लौटे हुए प्रवासियों में संक्रमण का ये प्रतिशत आया कहां से। सवाल तो वाजिब हैं, लेकिन उसके जवाब मिलेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसा लगता है कि भाजपा को लाखों-करोड़ों की गिनती बहुत पसंद आती है। इसलिए बिना किसी आधार के देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर की बनाने की बात होती है, राहत पैकेज भी 20 लाख करोड़ का दिया जाता है। और इस राहत पैकेज की रकम जरूरतमंदों तक कितनी पहुंच रही है, इसका जवाब सरकार देना नहीं चाहती। कामगारों का हितैषी बनने के दावे सब कर रहे हैं, लेकिन उसके पीछे भी महज राजनैतिक लाभ ही दिखता है।

उप्र में प्रवासी कामगारों को फिर से बाहर न जाना पड़े, इसलिए योगी सरकार माइग्रेशन कमीशन बनाएगी और जिन राज्यों को उप्र के कामगारों को लेना है, तो इसके लिए पहले अनुमति लेनी होगी।  सुनने में यह बड़ा कल्याणकारी फैसला लगता है, लेकिन इसके नतीजे तो आने वाले समय में ही पता चलेंगे। इधर बिहार में चुनाव को देखते हुए प्रवासी कामगार बड़ा मुद्दा बन चुके हैं। पहले तो सरकार ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था, लेकिन अब विरोधी दलों के दांव देखते हुए उन्हें अपने पाले में करने की कोशिशें चल रही हैं।  इस राजनीति के बीच श्रम कानूनों में बदलाव का खेल खेला जा चुका है।

देश के मजदूर संगठनों ने इस पर आवाज उठाई और बात अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ तक पहुंची, जिस पर आईएलओ ने कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि वे श्रम कानूनों के संबंध में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञाओं को बनाए रखेंगे और सामाजिक विचार-विमर्श को बढ़ावा देंगे। क्या इस अपील को, कोरोना के बढ़ते मामलों को और लोगों के बीच अपने जीवन को लेकर पनप रही दहशत को मोदी सरकार एक साल की उपलब्धियों में शुमार करेगी।

(देशबन्धु)

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