लॉकडाऊन से निकलते हुए चौकन्ने भी हों, जागरूक भी

लॉकडाऊन से निकलते हुए चौकन्ने भी हों, जागरूक भी

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-सुनील कुमार।।
अब जब लॉकडाऊन एक हकीकत हो चुका है, और सेहत को लेकर साफ-सफाई की सावधानी अगले कम से कम साल दो साल के लिए एक स्थायी जरूरत हो चुकी है, तो लोगों को न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए अपने, परिवार के, और समाज के प्रति अधिकारों का इस्तेमाल भी करना चाहिए। ऐसी जगह से सामान खरीदी बंद करना चाहिए जहां दुकानदार या फेरीवाले मास्क लगाने से परहेज करते हों। ऐसा करना जरूरी इसलिए भी है कि उन्हें एक चेतावनी मिले, और ऐसा खतरा उठाने वाले लोगों से खरीददारी से बचना अपनी खुद की सेहत के लिए जरूरी है। किसी सार्वजनिक जगह पर जाना हो, और वहां लोग बिना मास्क लापरवाही से दिखें तो अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए तुरंत इस बात का विरोध करना चाहिए टोकना और रोकना चाहिए। आपकी जागरूकता चार और लोगों तक संक्रमण की तरह फैलती है, और बाकी लोग भी जागरूक होते हैं। अब कोई आने वाला वक्त नहीं है, जो खतरा है वह पूरी तरह आ चुका है, और पूरी तरह छा चुका है। इसलिए अगर बचाव के मोड में नहीं आया गया, तो पता नहीं कौन बचेंगे, और कौन नहीं बचेंगे।

कुछ लोग बचाव की सावधानी भी न बरतें, और इनकी वजह से बाकी लोगों पर दहशत छाने जैसी नौबत आ जाए यह बात ठीक नहीं है। हमारी सामाजिक जिम्मेदारी अपनी खुद की सावधानी तक सीमित नहीं है, वह समाज को सावधान करने की हद तक भी जाती है। यह बात याद रखने की जरूरत है कि सत्ता या दौलत, इनमें से किसी भी किस्म की ताकत वाले लोग लापरवाही अधिक बरतेंगे क्योंकि उन्हें रोकने की ताकत कम लोगों में होगी। लेकिन यहीं पर लोगों के नैतिक मनोबल की बात भी आती है कि अगर आप खुद सावधानी बरत रहे हैं तो दूसरों को रोकने-टोकने की नैतिक ताकत भी आपको मिल जाती है। यह जरूरी इसलिए भी है कि आज के वक्त में कोई भी अकेले सुरक्षित नहीं हैं, या तो सब सुरक्षित हैं, या कोई भी सुरक्षित नहीं हैं। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में दो तबकों के लोग ऐसे हैं जो अपनी गलती से नहीं, अपनी ड्यूटी करने की वजह से कोरोना के शिकार हुए। बड़ी संख्या में पुलिस वाले और बड़ी संख्या में नर्स-डॉक्टर जैसे स्वास्थ्य कर्मचारी कोरोना से मारे गए हैं। सोशल मीडिया पर बहुत से बच्चों की तस्वीरें ऐसे पोस्टरों सहित आती हैं जिनमें वे कहते हैं कि उनकी मॉं या उनके पिता लोगों को बचाने के लिए अस्पताल में ड्यूटी पर हैं, या सड़कों पर गश्त कर रहे हैं, वे लोगों को बचाने के लिए बाहर हैं इसलिए लोग उनको बचाने के लिए घर पर रहें।

जब तक घर पर रहना एक बंदिश था, तब तक तो लोग फिर भी काबू में रह लिए, लेकिन जब से लॉकडाऊन में छूट शुरू हुई है, लोग लापरवाही बरतने लगे हैं, और उन्हें लग रहा है कि पहले जैसा वक्त फिर आ गया है। लोग दिखावे के लिए मास्क को मुंह पर पहनने के बजाय उसे गले में टांगे रखते हैं। कल जब महीनों बाद हिन्दुस्तान में मुसाफिर विमान शुरू हुए, तो एयरपोर्ट पहुंचने वाले मुसाफिर तो चौकन्ने थे, लेकिन अलग-अलग टीवी चैनलों के लिए काम करने वाले रिपोर्टरों का हाल यह था कि वे मास्क हटाकर रिपोर्टिंग कर रहे थे, और उनमें से कई तो मुसाफिरों से बात कर रहे थे जो खुद भी अपना मुंह दिखाने के लिए मास्क हटा रहे थे। हिन्दुस्तान में जिस तरह आमतौर पर लोग हेलमेट को सिर पर धर लेते हैं, उसका बेल्ट नहीं लगाते, उसी तरह लोग मास्क को बदन पर तो टांग ले रहे हैं, लेकिन उससे नाक और मुंह कवर नहीं करते।

जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही देश भर में शुरू हो रही है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन में ढील मिल रही है, मुसाफिर ट्रेन शुरू हो रही हैं, हवाई सेवा शुरू हो रही है, उससे जाहिर है कि कोरोना-संक्रमण का खतरा बढ़ते ही जाएगा। फिर यह बात भी समझने की जरूरत है कि अधिकतर राज्यों ने कोरोना की जांच में सोच-समझकर देर की क्योंकि उनके पास कोरोना मरीजों को भर्ती करने के लिए, या क्वारंटीन की जरूरत होने पर उसके लिए गुंजाइश नहीं थी। पिछले कई हफ्तों में अधिकतर राज्यों ने अपनी इलाज और रखने की क्षमता बढ़ाई है, और अब कम से कम कुछ राज्य जरूरत के लायक जांच शुरू कर रहे हैं। यह भी एक वजह है कि अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में रोजाना का कोरोना मरीजों का आंकड़ा इकाई से बढ़कर दहाई पर चले गया है, और दहाई से दर्जनों तक। आज शायद यह आंकड़ा हाफ सेंचुरी लगा ले। अधिकतर राज्यों में जहां कहीं देर से सही, जांच ईमानदारी से हो रही है, जरूरत के लायक हो रही है, वहां पर आंकड़ा इसी तरह बढ़ते चलना है।

लेकिन सरकार और अस्पताल इनकी एक क्षमता है। दुनिया का सरदार बना बैठा देश अमरीका, और उसकी वित्तीय राजधानी न्यूयार्क का हाल दुनिया के सामने है जहां दुनिया का सबसे महंगा इलाज, सबसे बड़े पैमाने पर उपलब्ध है, लेकिन उस एक शहर में लाशें जितनी बड़ी संख्या में गिरी हैं, उसकी मिसाल और कहीं शायद ही हो। इसलिए यह बात समझ लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान जैसे कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के देश में अगर हालात बिगड़े, तो सारी बीमारी बेकाबू हो जाएगी, सारी क्षमता नाकाफी हो जाएगी। लॉकडाऊन की वजह से हिन्दुस्तान में और चाहे हजार दिक्कतें हुई हों, कम से कम राज्य सरकारों को इलाज का ढांचा तैयार करने का वक्त मिल गया, और छत्तीसगढ़ ने जिस रफ्तार से इसे जितना मजबूत किया है, उसकी तारीफ करते एम्स-रायपुर के डायरेक्टर भी नहीं थकते।

सरकारें अपना काम कर रही हैं, और उसमें जो चूक है, जो कमी और खामी है, उसके बारे में लिखने के लिए अब परंपरागत मीडिया से परे सोशल मीडिया भी है। उस पर लिखी जा रही बातों को लेकर सरकारों को अपना काम सुधारने का एक मौका मिलता है, लेकिन आम लोगों को अपने-आपको सुधारने के लिए कोई दूसरे नहीं कहेंगे, उन्हें अपने, परिवार के, और समाज के हित में खुद ही चौकन्नापन सीखना होगा। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तानियों में एक बात को लेकर जबर्दस्त आत्मविश्वास दिखता है कि कोरोना किसी और के लिए होगा, उनके लिए नहीं है। यह आत्मविश्वास किसी काम का नहीं है, क्योंकि जो कोरोना दिखता नहीं है, उसके बारे में कोई मूर्ख ही इतना दुस्साहसी हो सकते हैं।

अब चूंकि लॉकडाऊन से बाहर निकलकर लोगों को काम-धंधे से भी लगना है, जरूरत पडऩे पर दूसरों से मिलना भी है, इसलिए यह जरूरी है कि लोग अधिक से अधिक सावधानी बरतें, अपनी खुद की जीवनशैली में ऐसा फेरबदल लाएं कि वे सुरक्षित रह सकें, औरों को सुरक्षित रख सकें। जब बात जिंदगी और मौत की है तो दूसरों की चूक से मरने के बजाय यह जरूरी है कि लापरवाह लोगों को टोका जाए, न कि उन्हें अनदेखा किया जाए। यह मामला कुछ वैसा ही है कि आप खुद को सड़क पर अगर गाड़ी सावधानी से चला भी रहे हैं, और सामने से गाड़ी लेकर आने वाले लोग नशे में हैं, तो उन्हें नशा करने से रोकने की सामाजिक जिम्मेदारी सरकार से परे भी लोगों की है।

(छत्तीसगढ़)

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