अव्यवस्था से जूझती जनता..

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जब सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने की जगह टालमटोल करने में लगी रहे तो देश में कैसी अव्यवस्था फैलती है, इसके कई उदाहरण इस साल हमने देखे हैं। साल की शुरुआत से कोरोना की दस्तक पड़ चुकी थी, लेकिन उसे अनसुना कर ट्रंप की मेहमाननवाजी और दिल्ली में सीएए के नाम पर हिसाब-किताब बराबर करने में ध्यान लगा रहा। इस बीच चेतावनी मिलती रही, लेकिन सरकार अपने राजनैतिक एजेंडे के आगे देशहित और जनहित को हाशिए पर रखती गई। जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो एहतियात के नाम पर जो कदम उठाए गए, वो तिनके जितना सहारा भी नहीं बने, बल्कि उससे लाखों लोगों की मुसीबत और बढ़ गई।

देश के विभिन्न इलाकों में रोजगार के लिए गए प्रवासी कामगार जब आत्मनिर्भर बनते हुए, खुद ही पैदल लौटने लगे, तब जाकर सरकार थोड़ा संभली और श्रमिक स्पेशल ट्रेनें शुरु की गईं। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि मोदीजी के आत्मनिर्भर भारत वाली बात को सबसे अधिक गंभीरता से भारतीय रेल ही मान रही है। इसलिए उसके द्वारा संचालित ट्रेनें आत्मनिर्भर बनते हुए, अपना रास्ता खुद तय कर रही हैं। कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र के वसई से उत्तरप्रदेश के गोरखपुर के लिए निकली ट्रेन ओडिशा के राउरकेला पहुंच गई थी, इसी तरह गुजरात के सूरत से बिहार के सिवान जाने वाली ट्रेन भी राउरकेला पहुंच गई थी।

गोवा के मडगांव से उत्तरप्रदेश के भदोही जाने वाली ट्रेन सहारनपुर पहुंच गई।दिल्ली के निजामुद्दीन से बनारस के मंडुआडीह के लिए चली ट्रेन लखनऊ पहुंच गई। गोवा से बलिया के लिए निकली ट्रेन महाराष्ट्र के नागपुर पहुंच गई। ट्रेनों के इस तरह मार्ग विचलित होने से यात्रियों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन ट्रेनों में कोई सुविधासंपन्न लोग तो सफर नहीं कर रहे हैं, जिनके पास खाने-पीने से लेकर दवाओं तक का पूरा इंतजाम हो। अपनी जमा-पूंजी या किसी के दिए उधार के सहारे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की टिकट का इंतजाम करने वाले यात्री इसी उम्मीद पर सफर पर निकले कि जल्द ही वे अपने गांव-घर पहुंच जाएंगे। लेकिन जब उन्हें उनके शहर या राज्य की जगह दूसरे स्थान पहुंचा दिया गया तो उनकी तकलीफ को एसी कमरों में बैठकर महसूस करना कठिन है।

बहुत से यात्री, खासकर महिलाएं और बच्चे गर्मी में भूखे-प्यासे बेहाल हो गए। कुछ यात्रियों की मौत की भी खबर आई है। रविवार को तो गोवा से निकली श्रमिक स्पेशल ट्रेन ने जब लंबा चक्कर लगाया तो बहुत से यात्री परेशान होकर गाजीपुर में चेन खींचकर उतर गए और बिना जांच के अपने घरों की ओर रवाना हो गए। इस तरह संक्रमण का खतरा और बढ़ गया है। रेलवे की लापरवाही का एक नमूना गोवा से सहारनपुर पहुंची ट्रेन में देखने मिला, जिसमें सवार 964 यात्रियों में केवल 50 सहारनपुर के थे, बाकी सब प्रयागराज, मथुरा, बनारस आदि के थे। यात्रियों का कहना है कि ट्रेन कई जगह रुकी, लेकिन उन्हें उतरने नहीं दिया गया। अब उन्हें कैसे उनके शहर-गांव तक पहुंचाया जाएगा, यह अलग मसला है। 

रेलवे का कहना है कि उत्तरप्रदेश, बिहार आने वाले मजदूरों की संख्या अधिक है, इसलिए ट्रेनें भी यहां के लिए अधिक हैं, जिस कारण रूट व्यस्त हो रहा है और ट्रेनों को मार्ग बदलकर लाना पड़ रहा है। कुछ ऐसा ही बहाना ट्रेनों के रुकने के बावजूद यात्रियों को न उतरने देने के लिए लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल ये है कि सौ साल से भी पुरानी भारतीय रेल क्या इतनी अनाड़ी है कि उसे एक मार्ग पर आठ-दस ट्रेनों का संचालन करने में कठिनाई आ रही है। अगर अभी केवल श्रमिक ट्रेनों को संभालना कठिन हो रहा है, तो जब सामान्य आवाजाही शुरु होगी और महीनों से घर में बैठे लोग सफर पर निकलेंगे तब रेलवे उस भीड़ को और ट्रेनों की व्यवस्था को कैसे संभाल पाएगी।

फिलहाल रेल मंत्रालय अपनी गलती, कमजोरी मानने की जगह जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ने के लिए सिरों की तलाश कर रहा है। कल आधी रात को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने जिस तरह एक के बाद एक ट्वीट किए, यह उसका प्रमाण है। दरअसल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे शिकायत कर चुके हैं कि रेल मंत्रालय उनकी मांगों के अनुसार ट्रेनें उपलब्ध नहीं करा रहा है। इधर पीयूष गोयल ने आधी रात को सिलसिलेवार ट्वीट कर बताया कि वे महाराष्ट्र से 125 ट्रेनों औऱ यात्रियों की जानकारी मांग रहे हैं, लेकिन अब तक उनके पास कोई जानकारी नहीं पहुंची है। अगर रेल मंत्री को लगता है कि महाराष्ट्र सरकार की ओर से की जा रही देरी के कारण रेलवे को इंतजाम में मुश्किल आएगी तो बजाय दो-तीन घंटे इंतजार करने और ट्वीट करने के वे सीधे महाराष्ट्र सरकार से फोन पर बात कर सकते थे।

लेकिन तब केंद्र सरकार का पक्ष जनता के सामने मजबूत कैसे होता, या केंद्र को महाराष्ट्र सरकार पर उंगली उठाने का मौका कैसे मिलता। इसलिए समस्या का हल तलाशने की जगह रेल मंत्री ने समस्या के प्रचार में यकीन रखा। वैसे पूछा जा सकता है कि इस बार जिस मजबूती से उन्होंने अपना पक्ष रखा, उसी तरह के जवाब उन्होंने यात्रियों को होने वाली असुविधा या ट्रेनों के रूट बदलने पर क्यों नहीं दिया। जाहिर है वे अपनी सुविधा के मुताबिक बयान दे रहे हैं।

रेलयात्रा की तरह हवाई यात्रा करने वालों को भी पहले दिन खासी परेशानी से जूझना पड़ा। दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट पर यात्रियों की लंबी लाइन लगी थी, जिनमें से कई की फ्लाइट कैंसिल हो चुकी थी और कई की देर से चलने वाली थी। लेकिन विमान कंपनियों ने यात्रियों को समय रहते सूचित नहीं किया, जिससे यात्री नाराज नजर आए। इस तरह की अव्यवस्था और अफरा-तफरी को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि आपदा प्रबंधन में भारत कितना कमजोर है। जो व्यवस्था पहले से बना दी गई है, उसमें जरा भी ऊंच-नीच हो गई तो सारा आलम बिगड़ जाता है।

क्योंकि सरकार पहले से आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार ही नहीं रहती। 60 दिनों के लॉकडाउन में देश पूरी तरह लड़खड़ा चुका है और सरकार अब भी अगर छह सालों की उपलब्धियों के बखान में लगी रहे तो फिर इस देश की जनता किस भरोसे पर जिए, यह उसे खुद सोचना होगा।

(देशबन्धु)

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