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-सुनील कुमार।।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग चल रही है कि किस-किस नेता को धान की फसल पर सरकार द्वारा पहले घोषित दाम का बकाया अब कितना-कितना मिल रहा है। भाजपा के कई बड़े नेताओं के नाम खबरों में हैं कि उन्हें कितने-कितने लाख रूपए मिले हैं। कांग्रेस नेताओं ने अनौपचारिक रूप से ये नाम जारी किए हैं। और अब यह बात उठ रही है कि सिर्फ भाजपा नेताओं के नाम क्यों सामने आए, कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम सरकारी बहीखाते से निकलकर जनता में क्यों नहीं पहुंचे। राज्य सरकार ने सरकार बनते ही किसानों को धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने की घोषणा की थी, लेकिन केन्द्र सरकार की आपत्ति के बाद वह भुगतान नहीं किया जा सका, और आज उसी बकाया को राज्य सरकार ने किस्तों में देना शुरू किया है।

छत्तीसगढ़ में किसानों को मदद एक बड़ा मुद्दा है। चाहे धान का बोनस हो, चाहे रियायती बिजली हो, चाहे कुछ और हो। और इस राज्य में धान अपनी जरूरत से अधिक उगने लगा है, केन्द्र सरकार भी एफसीआई में उतने धान का चावल लेती नहीं है। राज्य ने केन्द्र से इजाजत मांगी है कि उसे अपने अतिरिक्त धान से एथेनाल बनाने की मंजूरी दी जाए। कुल मिलाकर मतलब यह कि यह राज्य धान-सरप्लस प्रदेश है, जरूरत से अधिक धान, सरकार की खरीदने की ताकत से अधिक धान, और देश की राष्ट्रीय जरूरत के नजरिए से भी छत्तीसगढ़ का धान अतिरिक्त है। अब ऐसी अतिरिक्त फसल को कोई बढ़ावा या प्रोत्साहन देने का तो कोई तर्क नहीं हो सकता, जरूरतमंद किसानों की मदद का एक तर्क है जो कि किसी भी जनकल्याणकारी राज्य में की जाती है, और वह जरूरत के हिसाब से ही की जाती है। छत्तीसगढ़ में छोटे किसानों, कम ऊपज वाले किसानों, अधिया किसानों या खेतिहर मजदूरों को मदद तो समझ आती है, लेकिन रईस और बड़े किसानों को कोई मदद न्यायसंगत कैसे हो सकती है? जिस प्रदेश में तकरीबन आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक रूपए किलो चावल की वजह से जिसका पेट भरता है, उस प्रदेश का पैसा उन बड़े किसानों को कैसे दिया जा सकता है जो कि मदद के जरूरतमंद नहीं हैं? ये किसान जरूर हैं, लेकिन ये इतने बड़े हैं कि इनकी खेती अपने आपमें फायदेमंद होती है। राज्य सरकार इनकी ऊपज को केन्द्र के समर्थन मूल्य पर ले ले वहां तक तो ठीक है, लेकिन उसके बाद का जो बकाया भुगतान अभी किया जा रहा है, वह कुछ अटपटा लगता है।

धान इतना ज्यादा हो रहा है कि यह छत्तीसगढ़ के पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है, और यहां के भूजल को भी। ऐसे में इस राज्य को अधिक फसल की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि छोटे किसानों की खेती पर निर्भरता आर्थिक रूप से सक्षम हो, बस उतनी ही जरूरत है। आज होना यह चाहिए कि बड़े किसानों को एक क्रीमीलेयर की तरह इस अतिरिक्त फायदे से बाहर करना चाहिए। आज सरकार ने एक एकड़ के किसान के इस बकाया-भुगतान की अधिकतम सीमा दस हजार रूपए तय कर दी है। लेकिन जो बड़े किसान हैं उनकी खेती की जमीन को लेकर कोई सीमा नहीं है। जब जनता के खजाने का पैसा किसी रियायत या मदद के रूप में दिया जाता है, तो वह दो वजहों से ही दिया जाना चाहिए, उस काम की जरूरत हो, और उस ऊपज या उत्पादन की भी जरूरत हो। छत्तीसगढ़ में धान के बड़े किसानों को सरकारी रियायत या मदद से एक सीमा के बाद बाहर कर देना चाहिए। हमारा ख्याल है कि दस एकड़ से अधिक के किसान ऐसी रियायत के पात्र नहीं माने जाने चाहिए।

कांग्रेस और भाजपा के बीच की बयानबाजी के चलते इस पहलू की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हो सकता है कि हमारी इस सोच में कोई व्यवहारिक कमी भी हो, अगर है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। लेकिन खेती के और कृषि अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों से बात करने पर पता लगता है कि सरकार की आज की रियायत सिर्फ तीन फसलों तक सीमित है जिसमें धान-गन्ना-मक्का है। हालांकि मुख्यमंत्री ने दलहन और तिलहन, कोदो-कुटकी को भी शामिल करने की बात कही है, लेकिन जो सबसे कमजोर, आदिवासी किसान हैं उनके उगाए हुए कोदो-कुटकी की तो कोई सरकारी खरीदी भी नहीं होती है, इसलिए उनको आगे सरकार की इस न्याय योजना में कैसे लाया जाएगा यह भी देखना बाकी है। जानकार लोगों का मानना है कि राज्य में अधिया जैसी व्यवस्था के तहत काम करने वाले लाखों किसान हैं, जिन्हें इससे कोई फायदा नहीं होना है, बल्कि वे अगर धान बेचते समय सोसायटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं, तो भूस्वामी को भी कोई फायदा नहीं होना है। इसके अलावा आज बड़ा नुकसान झेल रहे सब्जी उत्पादकों, फल उत्पादकों की भी अभी तक सरकार की इस न्याय योजना में जगह नहीं दिख रही है।

यह बात सही है कि किसी भी योजना में सारे लोग नहीं लाए जा सकते, और न ही पहले दिन से ही सारे लोग किसी योजना में आ सकते हैं। आज की भूपेश बघेल सरकार का रूख अब तक की सरकारों के मुकाबले अधिक ग्रामीण और अधिक कृषक है। इसलिए जब सरकार हजारों करोड़ का कर्ज लेकर भी किसानों से अपना वायदा पूरा कर रही है, तो इस योजना पर खर्च पूरी तरह न्यायसंगत होना चाहिए। हम आखिर में एक बार फिर इस बात पर जोर डालेंगे कि खेती को मिलने वाली रियायतों और मदद से क्रीमीलेयर को बाहर करना चाहिए, और ऐसे तमाम फायदों को आमतौर पर 10 एकड़ तक के किसानों तक सीमित रखना चाहिए। अगर सरकार के पास खेती को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक क्षमता और हौसला है, तो वह लघु और मध्यम किसानों तक ही सीमित रखना चाहिए। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि दोनों ही पार्टियों के बड़े किसान और बड़े नेता इस पर तो चर्चा नहीं कर रहे, क्योंकि बड़े नेता या तो शुरू से बड़े किसान रहते हैं, या फिर राजनीति में आने के बाद बड़े किसान बन जाते हैं, और इन दोनों बड़ी पार्टियों के लोग किसानों के भीतर किसी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने के खिलाफ होंगे। लेकिन गरीब प्रदेश में इसे एक मुद्दा बनाना चाहिए।

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