चौथे लॉकडाउन के रंग, 15 साला ज्योति के संग..

Desk

देश में कोरोना के मामले 1 लाख 31 हजार के पार जा चुके हैं और सरकार लॉकडाउन के नए रंग-ढंग दिखाने में लगी है। जब देश में मामले हजार भी नहीं पहुंचे थे, तब मोदीजी ने महज 4 घंटों का समय देकर शान से सख्त लॉकडाउन का ऐलान किया था। इस ऐलान के बाद वो अपने निवास में आराम से वापस चले गए और उनके मंत्रीगण कहीं अंताक्षरी खेलते, कहीं मटर छीलते अपने परिजनों के साथ खुश नजर आए। भाजपा नेता कसमें खाने लगे कि घर से बाहर नहीं निकलेंगे।

लेकिन भारत भाजपा तो नहीं है, जहां सब लोग सत्ता का सुख विलासिता की हद तक भोग सकें। यहां करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास न रहने को घर है, न दो वक्त के लिए रोटी का इंतजाम है। ये लोग रोज कमाते हैं और रोज जिंदा रहने के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसे लोगों के लिए लॉकडाउन जीते जी नर्क लेकर आया। जो जहां था, वहीं फंसा रह गया, लेकिन बिना काम और खाने के आखिर कितने दिन जिया जा सकता है। लिहाजा यातायात की सुविधाओं के बिना लाखों लोगों ने सड़क के रास्ते अपने घर लौटना तय किया।

सरकार ने बड़ी देर से 1 मई को श्रमिक ट्रेन चलाने की घोषणा की, और अब कई और सामान्य ट्रेनों के साथ घरेलू विमान सेवा भी शुरु होने वाली है। हालांकि जिनकी जेब में एक-दो दिन के खर्च लायक भी रकम न हो, उनके लिए ट्रेन और प्लेन सब चांद-तारों को पाने की तरह ही कठिन है। इन सुविधाओं का लाभ मध्यम और उच्च मध्यमवर्ग को ही मिलेगा। सरकार जिस तरह से एक के बाद एक छूट दिए जा रही है, उससे जाहिर है कि पहले, दूसरे और तीसरे लॉकडाउन का कोई मतलब नहीं रहा, क्योंकि कोरोना के मरीजों की संख्या भी बढ़ी और अर्थव्यवस्था में तबाही का ग्राफ भी। अब तो खुद आरबीआई ने भी मान लिया है कि जीडीपी वृद्धि दर नकारात्मक रहने वाली है।

सरकार राहत पैकेज की भारी भरकम घोषणा के बाद भी लोगों को तत्काल राहत नहीं दे पा रही है, बल्कि अपने फैसलों को पलटने से उनकी जान मुसीबत में डाल रही है। दो गज की दूरी की बात को रेलवे स्टेशनों के काउंटर पर जुटी भीड़ ठेंगा दिखा रही है, जब विमान उड़ेंगे तो फिजिकल डिस्टेंसिंग का सिद्धांत भी हवा में उड़ जाएगा। विमान यात्रियों के लिए एकांतवास तय करने का जिम्मा भी केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है। 

नागरिक उड्डयन मंत्रालय तो मात्र आरोग्य सेतु ऐप से ही यात्रियों को सुरक्षित मान रहा था। विमान में अमीर उड़ेंगे और अगर उनके कारण कोरोना फैलेगा तो इसमें वायरस का दोष होगा। लेकिन पैदल चल रहे श्रमिकों को यह छूट भी नहीं है। तभी तो कामगारों के वापस लौटने पर बिहार, उत्तरप्रदेश आदि में जिस तरह कोरोना के मरीज बढ़े हैं, उसके लिए प्रवासियों को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

मानो ये लोग बड़े मजे के लिए तपती गर्मी में, भूखे-प्यासे भीड़ में शामिल होकर चलते रहे और शौक से बीमार पड़ गए। यह सच है कि दिल्ली, मुंबई से लौटे लाखों लोगों के कारण कोरोना का खतरा बढ़ा, लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि इसके लिए पूरी तरह सरकार जिम्मेदार है। हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश आदि ने भी लॉकडाउन किया, लेकिन जिन्हें अपने शहर-गांव लौटना था, उन्हें वक्त और सुविधाएं दोनों दीं। जबकि भारत की आत्मकेन्द्रित. आत्ममुग्ध मोदी सरकार ने ऐसी कोई मोहलत नहीं दी।

बल्कि सड़क पर चलने वालों, बीच राह में मरने वालों के लिए भी उसने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। यही कारण है कि कोई मां अपने बच्चे को सूटकेस के साथ घिसटती नजर आई, कोई गर्भवती स्त्री बच्चे को जन्म देने के बाद कई किमी पैदल चलती दिखी। ज्योति नाम की 15 साल की एक लड़की तो अपने पिता को साइकिल पर बिठाकर 12 सौ किमी का सफर तय कर गुरुग्राम से दरभंगा पहुंची। इवांका ट्रंप ने ज्योति की हिम्मत और भारतीयों के प्रेमभाव की तारीफ क्या कर दी, सोशल मीडिया पर उसकी तारीफों का अंबार लग गया। ज्योति की हिम्मत और उपलब्धि दोनों वाकई कमाल के हैं, लेकिन समाज और सरकार को इसमें खुश होने की जगह पहले शर्मिंदा होना चाहिए, क्योंकि उसकी संवेदनहीनता, अव्यवस्था और गलत नीतियों के कारण एक नाबालिग बच्ची को इस संघर्ष का पात्र बनना पड़ा।

हरियाणा से लेकर दिल्ली, उत्तरप्रदेश और फिर बिहार तक पहुंची इस लड़की की मदद किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार ने क्यों नहीं की। 7-8 दिनों में इस बच्ची पर किसी की निगाह क्यों नहीं गई। अब साइकिल फेडरेशन उसकी योग्यता को और निखारना चाहता है।

लेकिन ज्योति का जवाब है कि अभी वो बहुत थकी है। क्या इस थकान के पीछे छिपी पीड़ा सरकार को कभी दिखेगी। ज्योति किसी मैडल की चाह या खिलाड़ी बनने के लिए साइकिल नहीं चला रही थी, बल्कि सरकार की नाकाम नीतियों ने उससे मजबूरी में ऐसा करवाया। उसके जैसे हजारों लोग इस वक्त जिस तरह की हिम्मत दिखा रहे हैं, उससे सरकार की असफलता प्रदर्शित हो रही है। हाल ही में खबर आई कि हरियाणा से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर पहुंचने के प्रयास में तकरीबन तीन हजार प्रवासी हर रात रबर ट्यूब के सहारे यमुना को पार कर रहे हैं। अब क्या तैराकी संघ इन लोगों को प्रशिक्षण देने पर विचार करेगा। या भारत सरकार अक्षय कुमार के नेतृत्व में खतरों के खिलाड़ी जैसा कोई आयोजन करवाएगी।

2-3 सौ रुपयों में खराब गुणवत्ता की रबर ट्यूब पर जान जोखिम में डालकर मजदूर उत्तरप्रदेश पहुंच रहे हैं, क्योंकि सरकार उनकी मदद नहीं कर पा रही है। सरकार का दावा तो है कि अगले 10 दिन के दौरान भारतीय रेलवे 2600 विशेष ट्रेनों के जरिये करीब 36 लाख यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाएगा। लेकिन इससे इस तथ्य को नहीं बदला जा सकता कि मार्च के अंतिम सप्ताह से लेकर अब तक लाखों लोगों ने अपने बूते ही अपनी मंजिल पाई है। संपन्न औऱ सक्षम लोगों में सोनू सूद जैसे बहुत कम हैं, जिन्होंने इन प्रवासियों का दर्द समझा और उन्हें मदद पहुंचाई। हम चाहे सोनू सूद या ज्योति की तारीफ कर लें लेकिन इससे सत्ता के दामन पर लगे खून और पसीने के दाग धुलेंगे नहीं।

(देशबन्धु)

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