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कुछ ही समय पहले हमने लिखा था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र में अधमरा और बिखरा हुआ ही सही, एक विपक्ष भी है जिसकी अनदेखी चाहकर भी नहीं की जा सकती। इस बात को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है और हाल के घटनाक्रम में यह बात और उभरकर सामने आई है। मजे की बात यह है कि इन घटनाओं का सत्तापक्ष ने न केवल संज्ञान लिया है, बल्कि वह इनसे कुछ बेचैन भी दिखाई दे रहा है।

सबसे पहले बात करें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जिन्होंने कहा कि प्रवासी मजदूरों को घर वापस जाने के लिए रेल किराया उनकी पार्टी देगी। श्रीमती गांधी का यह प्रस्ताव आया नहीं कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय और भाजपा के प्रवक्ता- सब के सब सफाई देने में जुट गए कि श्रमिकों से केवल 15 प्रतिशत किराया लिया जा रहा है। लेकिन सरकार सर्वोच्च न्यायालय को भी नहीं बता पाई कि वह बाकी 85 प्रतिशत दे रही है या नहीं, क्योंकि इस संबंध में उसने अधिकारिक तौर पर कोई निर्देश जारी ही नहीं किया था। इस बीच एक झूठ भी फैलाने की कोशिश की गई कि कांग्रेस शासित प्रदेशों में ही मजदूरों से किराया लिया जा रहा है, जबकि ऐसा करने के निर्देश रेल मंत्रालय ने ही सभी राज्यों को दिए थे।

इसके बाद आते हैं राहुल गांधी जिन्होंने पहले तो रघुराम राजन और अभिजीत बैनर्जी जैसे अर्थशास्त्रियों से वीडियो वार्तालाप किया और उतनी ही सहजता के साथ दिल्ली के फुटपाथ पर प्रवासी मजदूरों के पास बैठकर उनका दु:ख-दर्द समझा, उन्हें उनके घर भेजने का इंतजाम किया। जाहिर है कि सरकार को यह बात भी हजम नहीं हुई। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण तो ऐसे बौखलाईं जैसे राहुल गांधी ने कोई बड़ा गुनाह कर डाला हो। उन्होंने राहुल पर मजदूरों का वक़्त बरबाद करने की तोहमत मढ़ दी और उलाहना दिया कि राहुल को मजदूरों का सूटकेस उठाकर उनके साथ चलना था। यह सब कहते हुए श्रीमती सीतारमण भूल गईं कि वे पहले की तरह पार्टी की प्रवक्ता नहीं, बल्कि इस देश की वित्तमंत्री हैं जिन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान  रखना चाहिए। 

अब ताजा प्रसंग प्रवासी मजदूरों के लिए प्रियंका गांधी द्वारा बसें चलाने के प्रस्ताव का है। यह ऐसा प्रस्ताव है जो योगी सरकार से न निगलते बना, न उगलते। कांग्रेस द्वारा जुटाई गई बसें उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर राज्य सरकार की इजाजत का इंतजार करती रहीं, लेकिन दूसरी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की जाती रही कि किसी भी सूरत में कांग्रेस को इसका श्रेय न मिले। लिहाजा बसों की सूची मांगी गई, उनके नंबर जांचे गए, बसों की हालत पता की गई। इस प्रक्रिया में कुछ विसंगतियां पाई गईं, जिससे एक बार फिर भाजपा की आई टी सेल और प्रवक्ता को शोर मचाने और झूठ फैलाने का मौका मिल गया। हालांकि न तो उनके पास, न ही योगी सरकार के पास इस बात का कोई जवाब है कि लगभग 90 फीसदी जिन बसों में कोई खामी नहीं थी, उन्हें अनुमति क्यों नहीं दी गई?

मजदूरों का रेल किराया कांग्रेस पार्टी द्वारा दिए जाने के सोनिया गांधी के ऐलान के दूसरे ही दिन सरकार ने फैसला किया कि मजदूरों से कोई किराया नहीं लिया जाएगा। राहुल ने बकौल निर्मला सीतारमण, ‘जिन मजदूरों का वक़्त बर्बाद किया था’, वे खुशी-खुशी अपने घर पहुंच गए हैं और राहुल को दुआएं दे रहे हैं।  इधर तीन दिन इंतजार करने के बाद प्रियंका द्वारा भेजी गई बसें वापस लौट गईं। लेकिन इससे योगी सरकार की कमजोरी ही उजागर हुई। बसों को यदि अनुमति नहीं देना था, तो यह काम पहली दफा में ही हो सकता था। आधी-आधी रात के बाद चिठ्ठी-पत्री करने, बसों को लखनऊ बुलवाने या उनकी तफसील मांगने का क्या मतलब था?

इन तीनों प्रसंगों में यह साफ  है कि न तो केन्द्र और न ही उत्तरप्रदेश सरकार, कांग्रेस के इन कदमों के लिए तैयार थी। उल्टा इन पर अवांछित प्रतिक्रिया देकर उन्होंने खुद अपनी फजीहत करवाई और शर्मिंदगी उठाई। दोनों सरकारें यदि मजदूरों-कामगारों के प्रति अपेक्षित रूप से संवेदनशील होतीं, तो यह नौबत ही न आती।  दूसरी तरफ इन कवायदों के जरिए कांग्रेस ने िफलहाल तो यह बता दिया है कि बहुत सारी जमीन खो चुकने के बावजूद वही सशक्त विपक्ष की भूमिका निभा सकती है, भले ही संसद में अधिकारिक रूप से उसे प्रमुख विपक्षी दल होने का दर्जा न मिले और भले ही सिंधिया जैसे ग्लैमरस चेहरे उसे छोड़कर चला जाए। फौरी तौर पर इन कवायदों के और भी फायदे उसे हुए होंगे, लेकिन सत्तापक्ष को वह कड़ी और चौंकाने वाली चुनौतियां देने की स्थिति में रहे, इसके लिए उसे टिकाऊ रणनीति बनाकर काम करना होगा और दूसरी पंक्ति के- खास तौर पर युवा नेताओं को भी अपनी कार्य योजना में बराबरी से शामिल करना होगा।

(देशबन्धु)

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