जवाब न देने की बीमारी..

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाषण देने की कला में माहिर हैं। प्रधानमंत्री बनने के पहले और बाद में भी उन्होंने कई भाषण दिए। संसद में, चुनावी रैलियों में और विदेशी सभागारों में उनके कई भाषण लोगों ने सुने और उनके बोलने की कला के कायल बने। वे हर महीने मन की बात भी करते हैं, जिसमें खूब अच्छी-अच्छी बातें होती हैं। गांधी परिवार और कांग्रेस के विरोधी भाजपा समर्थकों ने 2014 के पहले डा.मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी का खूब मजाक उड़ाया। उन्हें बोलना नहीं आता, वे किस तरह गलतियां करते हैं, इसे लेकर कई तंज कसे। डा.मनमोहन सिंह को तो अभद्रता के साथ मौनमोहन भी कहा गया।

वैसे भारतीय संविधान में सरकार का नेतृत्व करने के लिए अच्छा बोलने की शर्त कहीं नहीं लिखी हुई है। संविधान का पालन करते हुए, लोकतांत्रिक मूल्यों को साथ लेकर, जनता के प्रति जवाबदेही रखते हुए, पूर्ण पारदर्शिता के साथ सरकार चलाना ही सबसे बड़ा गुण है। यूपीए सरकार के दोनों कार्यकाल में कई खामियां रहीं, लेकिन जनता से संवाद, कहीं कम नहीं हुआ। मन की बात नहीं होती थी, लेकिन जनता को मन की बात कहने के लिए सारे अवसर दिए गए, सूचना का अधिकार इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। डा.सिंह लंबी-चौड़ी नहीं हांकते थे, उन्होंने कभी अपनी गरीब, ग्रामीण पृष्ठभूमि का रोना भी नहीं रोया, बल्कि वे सारगर्भित तरीके से अपनी बात रखते थे। देश में उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस की, जिनमें पत्रकारों को सवाल पूछने की छूट थी। विदेश दौरों से लौटते हुए भी वे विमान में पत्रकारों से चर्चा करते थे।

लेकिन जो लोग डा.मनमोहन सिंह की भाषा, शैली या कम बोलने का मखौल उड़ाते थे, उन्हें शायद आज यह भी नजर आ रहा होगा कि मोदीजी ने अपने पहले कार्यकाल में किस तरह के प्रायोजित साक्षात्कार करवाए, जिसमें गिने-चुने पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछे और वही पूछे जिनके जवाब देने में सरकार को सुविधा हो, या जिनसे मोदीजी को प्रचार मिले। पूरे पांच साल एक भी खुली प्रेस कांफ्रेंस उन्होंने नहीं की, और छठे साल में भी वही रिवाज जारी रहा। इस बीच कोरोना का संकट आया तो उन्हें बार-बार राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर मिला, लेकिन इसमें भी उनके मन की बातें ही हावी रही।

जनता का मन टटोलने की कोई कोशिश उन्होंने नहीं की, न कोई ऐसी प्रेस कांफ्रेंस की, जिसमें देश के असली पत्रकार सरकार से कोरोना से निपटने की तैयारियों को लेकर या मजदूरों के हाल को लेकर या अर्थव्यवस्था की बदहाली को लेकर सवाल पूछ सकें। चौथे लाकडाउन के पहले मोदीजी देश से एक बार फिर मुखातिब हुए थे, जिसमें राहत पैकेज का ऐलान किया गया था, लेकिन इस पैकेज में कितना, किसके लिए है, यह बताने का जिम्मा उन्होंने वित्तमंत्री पर छोड़ दिया था। फिर धीरे से सरकारी फरमान आ गया कि चौथा लाकडाउन कब तक औऱ किन शर्तों के साथ चलेगा।

लेकिन इन छूटों का क्या सही या गलत असर पड़ेगा, राहत पैकेज में क्या कमियां हैं, मजदूरों को घर पहुंचाने में सरकार कहां विफल रही है, ट्रेनें चलाने में इतना असमंजस क्यों हो रहा है, चार लाकडाउन के बावजूद देश में कोरोना के मामले एक लाख से अधिक क्यों हो गए, क्वारंटीन सेंटर में क्या हालात हैं, टेस्टिंग की क्या व्यवस्था है, गोमूत्र से इलाज का दावा करने वाले अब कहां चले गए हैं, ऐसे कई सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी से सरकार ने खुद को बरी कर लिया है।

मोदीजी ने तो सीधे सवाल कभी लिए ही नहीं, अब उनके मंत्री भी उसी राह पर हैं। देश में कब से मजदूरों की बदहाली, बेबसी के प्रकरण सामने आ रहे हैं, लेकिन शायद श्रम मंत्री विश्राम कर रहे हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। इधर स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी कोविड 19 पर अब प्रेस कांफ्रेंस करने की जगह प्रेस रिलीज भेजना शुरु किया है, जिसमें सरकारी सूचना होती है। कोरोना से निपटने के तकनीकी, वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा की गुंजाइश नहीं रह गई। 

सरकार ने जो एम्पावर्ड समूह बनाए थे, वे क्या कर रहे हैं, इसकी भी कोई जानकारी जनता को नहीं है। पीए केयर्स फंड का हिसाब-किताब भी आवरण में ही है। इतनी लुका-छिपी तानाशाही में हो तो कोई सवाल भी नहीं उठाए, क्योंकि वहां जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। लेकिन दुनिया में इस वक्त जितने भी लोकतांत्रिक देश हैं, वहां के मुखिया बाकायदा जनता के सामने आकर सवालों के जवाब दे रहे हैं, फिर भारतीय लोकतंत्र में इसी परंपरा को क्यों नहीं निभाया जा रहा। प्रधानमंत्री मोदी तो जनता के सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन इस बीच उनके गृह राज्य गुजरात में कोरोना के मरीजों की बढ़ती संख्या और उसके साथ नकली वेंटिलेटर्स का मामला सामने आया है।

दरअसल 4 अप्रैल को खुद मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में इन तथाकथित वेंटिलेटर्स का उद्घाटन किया था। तब राज्य सरकार द्वारा जारी एक प्रेस नोट में कहा गया था कि उद्योगपति पराक्रम सिंह जडेजा और ज्योति सीएनसी की उनकी टीम ने गुजरात के मेक इन इंडिया अभियान में बड़ा सहयोग दिया है। गुजरात सरकार ने इन  वेंटिलेटर्स को सस्ता बताकर कोरोना वायरस से जंग लड़ने में सबसे उपयोगी हथियार बताया था। लेकिन अब पता चला है कि ये मशीनें वेंटिलेटर नहीं थीं, बल्कि अंबू-बैग थीं। अंबूलेटरी बैग या अंबू बैग से किसी व्यक्ति को सांस लेने में मदद देने के लिए मैन्युअल रूप से संचालित करना पड़ता है, जिससे उनके फेफड़ों में हवा जाती है, जबकि वेंटिलेटर में एक ट्यूब मरीजों के गले से नीचे फेफड़ों तक डाली जाती है, जो सीधे हवा को अंदर और बाहर धकेलती है।

सांस लेने की गंभीर समस्याओं से लड़ने में वेंटिलेटर से काफी सहायता मिलती है, जबकि अंबू बैग इसमें खास मदद नहीं करता है। मेक इन इंडिया के प्रचार औऱ गुजरात माडल की बड़ाई के लिए रूपाणी सरकार ने एक गंभीर, बल्कि आपराधिक लापरवाही की है। सस्ते कहे जाने वाले नकली वेंटिलेटर से कोरोना मरीजों की जान को खतरा हो सकता है। क्या केंद्र सरकार औऱ गुजरात सरकार इस पर जनता को जवाब देंगी। क्या स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुजरात सरकार से इस कृत्य पर कोई सफाई मांगी है। देश कोरोना का संकट देख रहा है, जिसका इलाज कभी न कभी मिल जाएगा। लेकिन लोकतंत्र में जवाबदेही तय न करने की बीमारी अगर लग जाए तो फिर यह लाइलाज मर्ज बन जाता है, इसलिए जनता को जवाब मांगना शुरु कर देना चाहिए।

(देशबन्धु)

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