लॉकडाउन-4: देश को नीरो की सौगात

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देश में कुछ रियायतों, कुछ सख्ती के साथ नए रंग-ढंग का लॉकडाउन पार्ट 4 शुरु हो चुका है। मध्यमवर्ग अब इस उम्मीद में है कि उसे दफ्तर जाने में सहूलियत मिले, परिवहन चालू हो तो मिलना-जुलना भी बढ़े, घरेलू सहायकों को बुलाने की सुविधा मिल जाए, यानी वह सुविधाओं के रंग की उम्मीद कर रहा है।

उच्चवर्ग तो हमेशा ही ऐश और ऐंठ के रंग में रहता है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश, देश के लोग किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, उसके लिए जीवन के रंग कभी नहीं बदलते। कुछ ऐसा ही हाल गरीब वर्ग का भी है, उसका जीवन भी हमेशा एकरंगी ही रहता है, यानी दुख, तकलीफें, दिक्कतें स्थायी भाव से उसके जीवन में बैठी हुई हैं और चाहे देश की जीडीपी कितनी भी बढ़ी, सरकार कितने भी प्रचंड बहुमत से बने, देश में विदेशी निवेश बढ़े या सार्वजनिक कंपनियों का विनिवेश हो, गरीब तबके के लिए जीवन कष्टदायी ही रहता है।

अगर देश में लोककल्याणकारी सरकार का शासन हो तो इस तबके में रंगों के बदलने की गुंजाइश रहती है, लेकिन इस वक्त तो यह उम्मीद करना भी बेमानी है। मार्च से लेकर मई आधा बीत गया, लेकिन सड़कों पर मजदूरों का हुजूम जस का तस है। दो दिन पहले दिल्ली-उप्र सीमा पर जिस तरह मजदूरों की भीड़ जमा हुई, उससे साफ झलकता है कि सरकार ने इन मजदूरों को मरने के लिए ही छोड़ दिया है। दिखावे के लिए जो श्रमिक ट्रेनें शुरु की गई हैं, उनमें बड़ी मुश्किल से मजदूर बैठने का इंतजाम कर पा रहे हैं।

नतीजा ये है कि सड़क पर मजदूर कहीं पैदल चल रहे हैं, तो कहीं भेड़-बकरियों की तरह ट्रकों-बसों में बैठ रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले जब सड़क पर बैठे कुछ मजदूरों से बात की, उन्हें घर पहुंचवाने का इंतजाम किया तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे ड्रामेबाजी कहा।  

जबकि  कायदे से यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मजदूरों को सही-सलामत घर पहुंचाए। निर्मलाजी राहुल गांधी के काम पर अपनी विशेष टिप्पणी करने की जगह मजदूरों को राहत पहुंचाने के तरीके ढूंढने में अपनी ऊर्जा लगातीं तो बेहतर होता। इसी तरह प्रियंका गांधी ने कुछ बसों का इंतजाम कर मजदूरों को उत्तरप्रदेश भेजने की इजाजत योगी सरकार से मांगी तो उस पर त्वरित कार्रवाई की जगह लेटर पॉलिटिक्स शुरु हो गई। समझ ही नहीं आता कि इस कठिन घड़ी में भी राजनैतिक पैंतरेबाजी सत्ताधीशों को कैसे सूझ रही है। आखिर किस आधार पर वे खुद को हिंदुत्व का संरक्षक बता रहे हैं। सनातन धर्म सहित दुनिया का कोई भी धर्म दया, करुणा जैसे मानवीय गुणों को ताक पर रखने की शिक्षा नहीं देता है। लेकिन सनातन धर्म की माला दिन-रात जपने वाले अब लगातार अपनी निष्ठुरता का परिचय दे रहे हैं।

मोदीजी ने बड़ी शान से आत्मनिर्भर भारत अभियान का ढिंढोरा पीटते हुए 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान कुछ इस अंदाज में किया था कि बस अब मजदूरों के दुख भरे दिन बीतने ही वाले हैं। लेकिन इस अभियान की परतें खुलीं तो पता चला कि इनमें केवल ये होगा, वो होगा के दावे हैं, हाथ में तो दो कौड़ी भी मजदूरों को तुरंत नहीं मिल रही। मजदूरों को देने के लिए सरकार ने अपने हाथ बांध रखे हैं लेकिन सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने में उसे शर्म नहीं आ रही।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक तीन किलोमीटर के दायरे में फैली इस परियोजना में संसद भवन की नयी इमारत का निर्माण और बहुत सारे बदलाव शामिल हैं। अगर देश में सुख समृद्धि का वास होता, सब लोगों के पास जीवनयापन की सारी सुविधाएं मौजूद होतीं। शिक्षा, स्वास्थ्य की उचित व्यवस्था होती। हर हाथ को काम होता, तब जाकर ऐसी फिजूलखर्ची को सरकार जायज ठहरा सकती थी। लेकिन अभी तो सरकार किसी क्रूर शासक की तरह व्यवहार कर रही है, जहां जनता दिन-रात पीड़ा से कराह रही है और सरकार को विलासिता सूझ रही है।

कुछ समय पहले जब इस प्रोजेक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी तो केन्द्र ने कहा था कि संसद की नयी इमारत का निर्माण हो रहा है और समझ में नहीं आता कि किसी को इस पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए। वाकई सरकार को कभी समझ ही नहीं आएगा कि भूख, गरीबी और लाचारी क्या होती है, क्योंकि इसे समझने के लिए जो संवेदनशीलता चाहिए, उसे तो सत्ताधीशों ने उद्योगपति मित्रों की तिजोरी में कैद कर दिया है।

महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है, कारोबार चल नहीं रहे हैं, राज्यों को राजस्व की प्राप्ति नहीं हो रही है, सरकार उन्हें जीएसटी का बकाया नहीं चुका पा रही, सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते में कटौती की जा रही है, विश्व बैंक, एडीबी से कर्ज लिया जा रहा है, लेकिन शाहखर्ची कम नहीं हो नहीं रही। कर्ज लेकर इस तरह घी पीना देश के लिए कितना घातक होगा, ये आने वाला वक्त बताएगा। देश के भविष्य को लेकर चिंतित 60 नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर सेन्ट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना पर चिंता व्यक्त की है। पत्र में कहा गया है कि संसद में इस पर कोई बहस अथवा चर्चा नहीं हुई। कं पनी का चयन और इसकी प्रक्रियाओं ने बहुत सारे प्रश्न खड़े किए हैं जिनका उत्तर नहीं मिला है।

कोविड-19 से उबरने के बाद जब सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए, लोगों को भरण-पोषण प्रदान करने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक बड़ी धनराशि की आवश्यकता होगी, तो ऐसे वक्त में 20,000 करोड़ रुपये की लागत से पूरे सेंट्रल विस्टा को नया स्वरूप देने का प्रस्ताव गैरजिम्मेदाराना प्रतीत होता है। यह ऐसा ही है जैसे-‘ जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था।’ पत्र में पर्यावरण पर चिंता जतलाते हुए कहा गया है कि दिल्ली पहले से ही बड़े पैमाने पर पर्यावरण प्रदूषण से ग्रस्त है। ऐसे में कुछ ऐसा करने की योजना जो प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देगी, बिना सोचा समझा और गैरजिम्मेदाराना कृत्य है। पूर्व नौकरशाहों ने यह भी कहा कि सेंट्रल विस्टा वर्तमान में पूरे शहर के लिए एक मनोरंजक स्थान है और इस क्षेत्र में परिवार गर्मियों में रात में घूमते हैं और खुली हवा में बैठते हैं लेकिन विस्टा में बदलाव से वे इससे वंचित रह जाएंगे।

जो चिंता पूर्व नौकरशाहों ने व्यक्त की है, वह पहले भी जतलाई जा चुकी हैं, लेकिन सरकार अपने खोखले तर्कों और हठधर्मिता के सहारे इसे सही साबित करने पर तुली है। नीरो ने रोम में क्या किया, क्यों किया, यह तो इतिहास की बात है, लेकिन जनता इस कठिन वक्त में नीरो की सौगात देख रही है। यह सौगात और यह व्यवहार इतिहास में किस रूप में दर्ज होगा, यह भावी पीढ़ियां देखेंगी।

(देशबन्धु)

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