बड़ा कड़ा वक्त कल्पनाओं को बड़ा भी कर जाता है, सोचें..

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-सुनील कुमार।।

चूंकि कोरोना को कुछ खाना-पीना नहीं पड़ता है, और उसके दूसरे खर्च भी नहीं हैं, इसलिए वह तो आसानी से जिंदा है, लेकिन इंसानों को उसके साथ जिंदा रहना पड़ रहा है, और उसके साथ जिंदा रहना खासा भारी भी पड़ रहा है। रोजगार चले गए हैं और खर्च तकरीबन वैसे ही कायम हंै। ऐसे में कमाई के नए रास्ते ढूंढना जरूरी है, और खर्च में खासी कटौती करना भी जरूरी है। कंपनियां और छोटे मालिक सभी लोग तनख्वाह घटाते चल रहे हैं, और नौकरियां भी, इसलिए लोगों को जिंदा रहने के नए रास्ते ढूंढने होंगे।

अभी कुछ दिन पहले एक कंपनी ने ऐसे मास्क बाजार में उतारे हैं जिनमें तरह-तरह के दिलचस्प वाक्य लिखे हुए हैं। अभी एक अलग तस्वीर देखने में आई जिसमें बिहार के लोक कलाकार फेस मास्क पर कलाकारी दिखा रहे हैं, और एक साधारण सा अटपटा लगने वाला मास्क भी खूबसूरत हुए जा रहा है। हमें अधिक वक्त नहीं दिखता कि हाथ के बुने हुए, हाथ के छपे हुए कपड़ों से पोशाकें बनाने वाली देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाकी कपड़ों के साथ-साथ मैचिंग-मास्क मुफ्त देने लगें, या कपड़ों की कतरनों से अलग से भी मास्क बनाने लगेंं। यह संकट एक अवसर लेकर भी आया है कि हर राज्य अपने हस्तशिल्पियों, बुनकरों को लगाकर अब नई जरूरतों के मुताबिक हस्तकला की संभावनाएं देखें। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ की गुदना कला (टैटू) को हाल के बरसों में बदन से उतरकर कपड़ों में भी आते देखा गया है, और अब लोक कलाकार बिल्कुल बदन के टैटू की तरह कपड़ों पर वैसी ही पक्की काली स्याही से टैटू जैसी कलाकृतियां बनाने लगे हैं। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है, और ऐसे में हस्तशिल्प एक सबसे ही गैरजरूरी सामान हैं जिसे कि लोग महज शौक के लिए लेते हैं। ऐसे में अगर फेस मास्क को लोककला से जोड़ा जाए, तो एक नई संभावना निकलती है।

इसी तरह डिजाइनरों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या कमर में बांधे जाने वाले ऐसे कुछ पट्टे फैशन में आ सकते हैं जिनमें मोबाइल भी रखा जा सके, और जिनमें लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर की जगह भी हो? आमतौर पर विदेशी सैलानी कमर में ऐसे बेल्ट लगाए रहते हैं जिनमें चेन के भीतर ऐसी छोटी-मोटी चीजें रखी जाती हैं। ऐसे बेल्ट अगर लोक कलाकारों से स्थानीय कलाकृतियों के साथ बनवाए जा सकें, तो आने वाला वक्त उनका ग्राहक हो सकता है। अपने सामानों को संक्रमण से बचाने के लिए, और सफाई की जरूरी छोटी बोतलें रखने के लिए ऐसे बेल्ट का फैशन आ सकता है, या लाया जाना चाहिए क्योंकि अब मोबाइल फोन को भी हर जगह मेज पर रखना खतरनाक ही कहलाएगा। देश-प्रदेश के कारोबारियों, सरकार के संबंधित अधिकारियों, और डिजाइनिंग के छात्र-छात्राओं को ऐसे प्रयोग करने चाहिए।

यह मौका ऐसी कल्पनाओं के चैरिटी में भी इस्तेमाल करने का है। आज जब देश के धर्मस्थलों में भी तनख्वाह देने लायक कमाई नहीं बची है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारों से लेकर क्रिकेट खिलाडिय़ों तक, सब खाली बैठे हैं, तो ऐसे समाजसेवी संगठन जिनको दान की जरूरत है, वे मशहूर लोगों से संपर्क कर सकते हैं, और अमिताभ बच्चन के दस्तखत वाले फेस मास्क, या सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली के ऑटोग्राफ वाले फेस मास्क लाखों रूपए कमा सकते हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब किसी पहाड़ी पर कोई विमान गिर जाता है, और कई दिनों तक कोई बचाव दल नहीं रहता, तो लोग उन पहाडिय़ों पर ही किसी तरह जिंदा रहना सीखने लगते हैं, और जिंदा रहने की चाह उन्हें बहुत कल्पनाशील बना देती है। वे पेड़ों के पत्तों पर जमीं ओस की बूंदों से पीने के लिए पानी जुटा लेते हैं, वे चकमक पत्थरों से आग सुलगा लेते हैं, और कुछ फिल्में ऐसी भी आई हैं जिनमें किसी टापू पर अकेले फंस गए इंसान के जिंदा रहने के संघर्ष की कहानी है। आज तमाम लोगों को ऐसा कल्पनाशील होना पड़ेगा।

आज जब देश भर में स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई बुरी तरह पिछड़ गई है, बहुत से छोटे स्कूल-कॉलेज बंद भी होने की नौबत आ गई है, तो उस वक्त एक नई संभावना यह निकलती है कि संपन्न मां-बाप अपने बच्चों की पिछड़ गई पढ़ाई की भरपाई के लिए उनकी ट्यूशन लगवाएं, और बहुत से नौजवानों को, शिक्षकों को ऐसा रोजगार मिल सकता है। आज कोरोना जैसा खतरा अगर लंबा जारी रहा, स्कूल-कॉलेज बंद रहे, तो मां-बाप बच्चों को किसी कोचिंग क्लास भेजने के बजाय अपनी संपन्नता के मुताबिक बच्चों के लिए घर पर ही ट्यूशन लगवा सकते हैं। लोगों को काम की ऐसी संभावना के बारे में जरूर सोचना चाहिए, और अपनी शैक्षणिक योग्यता, अपने तजुर्बे के आधार पर अपना बायोडेटा बनाकर तैयार रखना चाहिए, एक प्रभावशाली संदेश बनाकर सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर भेजना भी चाहिए कि वे किस तरह के काम के लिए उपलब्ध हैं। हमारा अंदाज है कि छात्र-छात्राओं वाले हर संपन्न परिवार में किसी न किसी शिक्षक या ट्यूटर की कई महीनों की संभावना निकल सकती है। और लोगों को यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि जब ऐसा कोई काम बहुत अच्छे से किया जाता है तो लोग उन सेवाओं को लंबे समय तक जारी रखते हैं।

कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए कई किस्म के कलाकार, या दूसरे किस्म के प्रशिक्षक भी अपने-अपने हुनर की वीडियो क्लास ले सकते हैं, और रायपुर में ही एक पेशेवर शिक्षिका स्कूल जाने से पहले की उम्र वाले बच्चों के लिए ऐसी वीडियो क्लास लेना ने शुरू भी कर दिया है। कहते हैं कि ऊपर वाला एक दरवाजा बंद करता है, तो दूसरा खोल देता है। फिलहाल तो कोरोना से डरे-सहमे उस ऊपर वाले का तो पता-ठिकाना नहीं लगता है, लेकिन लोग खुद अपने लिए नई संभावनाएं तलाश सकते हैं। आज का वक्त ऐसा है जब बहुत सारे संपन्न लोग डिप्रेशन से भी गुजर रहे हैं, और ऐसे में उन्हें पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। मनोविज्ञान के जानकार और प्रशिक्षक ऐसा नया काम पा सकते हैं। सरकारों को चाहिए कि वे मौलिक सूझबूझ वाले जानकार और कल्पनाशील लोगों को लगाकर ऐसी संभावनाओं पर एक पर्चा तैयार करवाए, और इन नई संभावनाओं को स्किल डेवलपमेंट जैसी योजना से जोड़े ताकि समाज की एक नई जरूरत पूरी हो सके।

आज भी लोगों के घरों में जाकर दीमक का इलाज और दीमक से बचाव करने वाले लोगों का एक बड़ा कारोबार है। अब तक कई होशियार लोग घरों को वायरस और बैक्टीरिया से मुक्त कराने के कारोबार की योजना बना चुके होंगे, वह एक नई संभावना है, और उसमें कारोबार के अलावा प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत भी होगी, और लोगों को ऐसे नए कारोबार की भी सोचना चाहिए। जिस तरह आज हर चौराहे पर मोबाइल फोन के कवर, या नए सिमकार्ड बेचने वाले लोग छाता लगाकर बैठे रहते हैं, उस तरह से लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर बेचने वाले लोग भी रह सकते हैं, और ऐसे फुटपाथी हैंडवॉश करवाने वाले लोग भी रह सकते हैं जो लिक्विड सोप और सेनेटाइजर से आपके हाथ साफ करवाकर एक-दो रूपए ले सकें। ऐसे नए कारोबार, ऐसे नए पोर्टेबल सिंक के बारे में भी जरूर सोचना चाहिए क्योंकि कई किस्म की भीड़ भरी जगहों से धक्का खाकर निकलने के बाद हो सकता है कि लोग एक रूपए में हाथ साफ करवाना चाहें। चूंकि लोगों के मुंह अब आमतौर पर ढके रहेंगे, इसलिए वे ऐसे टी-शर्ट भी पहन सकते हैं जो आगे-पीछे पूरे इश्तहार छपे हुए हों, और उन्हें मुफ्त में मिल जाएं, या साथ में कुछ पैसे भी मिल जाएं।

हमने यहां पर सिर्फ कुछ मिसालें सामने रखी हैं। सरकार में स्किल डेवलपमेंट से जुड़े लोग, बाजार में व्यापारियों के संगठन, और जनता के बीच तरह-तरह के सामाजिक संगठन आने वाली अर्थव्यवस्था में लोगों के जिंदा रहने के लिए ऐसी तरकीबें सोच सकते हैं, उनकी बुनियाद पर योजनाएं बना सकते हैं। खुद बेरोजगारों को आपस में ऐसी वीडियो चैट करनी चाहिए, या डिस्कशन-ग्रुप बनाकर ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए। वक्त जब अधिक कड़ा होता है तो वह कल्पनाओं को अधिक बड़ा भी कर जाता है। हम तो अखबार के एक कमरे में कैद रहकर, बिना बेरोजगारी के कुछ कल्पनाएं कर पा रहे हैं, लेकिन असल जिंदगी में संघर्ष करते लोग, असल जिंदगी में कारोबार खोते हुए लोग अधिक दूर तक कल्पना कर सकते हैं। अगर आप इसमें लेट होंगे, तो आपके ही इलाके की लोककला छपा हुआ फेस मास्क चीन से आकर आपके गांव-मोहल्ले में बिकने लगेगा, फिर उसके बहिष्कार की बात से कुछ हासिल नहीं होगा।

(छत्तीसगढ़)

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