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अब तक आग लगने पर कुआं खोदने को घोर लापरवाही का प्रमाण माना जाता था, लेकिन मोदी सरकार तो आग लगने पर कुआं भी नहीं खोद रही, केवल कागज पर नक्शा दिखा रही है औऱ बतला रही है कि कुआं खोदने के लिए जमीन चिन्हित कर ली गई है, इसमें कितने कुदाली, कितने फावड़े लगेंगे, जो मिट्टी निकलेगी, उसे कहां डाला जाएगा, कुआं कितना गहरा, कितना चौड़ा होगा और उसमें से पानी निकालने के लिए कितनी लंबी रस्सी डलेगी। गरीबी, लाचारी, अव्यवस्था की आग पूरी तरह भड़की हुई है और उसे बुझाने के लिए पानी का इंतजाम ही नहीं है।

लॉकडाउन के तीन चरण खत्म हो गए हैं, लेकिन कोरोना के मामले खत्म नहीं हुए, बल्कि बढ़ते जा रहे हैं। हम दुनिया में कोरोना प्रभावित देशों की सूची में 12 से 11 वें स्थान पर आ गए हैं। एक ओर बीमारी का खतरा है, दूसरी ओर सरकार की अविचारित रणनीतियों के कारण अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो चुकी है। इन दो पाटों के बीच मजदूर बुरी तरह पिस गए हैं। मार्च, अप्रैल, मई कैलेंडर के पन्ने बदलते जा रहे हैं, लेकिन अपने घरों की ओर लौटते मजदूरों की तस्वीरें नहीं बदलीं। देश के तमाम राज्यों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर गाड़ियां कम और लुटे-पिटे दिखते इंसान अधिक नजर आ रहे हैं।

 तपती सड़क पर चलते कई मजदूरों की चप्पलें टूट चुकी हैं। किसी के कंधे पर बच्चा है तो किसी झुकी कमर पर भारी गठरी।  कहीं बूढ़े मां-बाप डगमगाते हुए चल रहे हैं, कहीं सूटकेस पर निढाल बच्चा सरक रहा है। इन सब तस्वीरों को देखकर संवेदनशील समाज का दिल पसीज रहा है, लेकिन सरकार की आंखों पर तो मानो पट्टी बंधी हुई है। धृतराष्ट्र कुरुसभा में न्याय का दिखावा कर रहे हैं और जिंदगी की महाभारत में मजदूर रोज हार रहे हैं।

औरंगाबाद से औरेया तक रोजाना दम तोड़ते मजदूर सरकार की नाकामी का कच्चा खोल रहे हैं। और सरकार अब भी उनके जख्मों पर मलहम लगाने की जगह राहत पैकेज का नमक छिड़क रही है। 12 मई को सरकारी सीरियल राहत पैकेज का प्रोमो पीएम मोदी ने जारी किया और 13 मई से उसके नए-नए एपिसोड्स के साथ वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण हाजिर होने लगीं। पहले उन्होंने एमएसएमई के लिए बड़ी घोषणाएं कीं, फिर प्रवासी मजदूरों और खोमचे वालों के लिए, फिर किसानों और मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी आदि के लिए, फिर बुनियादी ढांचे के सुधारों पर जोर दिया और आखिरी किस्त में बताया कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ाएगी।

इस तरह पांच एपिसोड्स का धारावाहिक खत्म हुआ। अब लोग ताली बजाते, दिए जलाते, छह साल बेमिसाल के गीत गा सकते हैं। अपने संबोधन में न मोदीजी ने, न पांच दिनों में निर्मला सीतारमण ने ये बताया कि इस राहत पैकेज से रोजाना बेमौत मर रहे मजदूरों को कैसे बचाया जा सकता है। वित्त मंत्रालय के अनुसार यह पैकेज में लैंड, लेबर, लॉ, लिक्विडिटी और लॉस को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।  पहले दिन की प्रेस कांफ्रेंस में वित्त मंत्री ने 5,94,550 करोड़ रुपये की योजनाओं और सुधारों, दूसरे दिन 3,10,000 करोड़ की योजनाओं, तीसरी प्रेस कांफ्रेंस में 1,50,000 करोड़ और चौथी तथा पांचवी में 48,100 करोड़ रुपये की योजनाओं और बदलावों के बारे में बताया गया। 

इस तरह पांच दिन में सरकार ने कुल 11,02,650 करोड़ रुपये की योजनाओं और बदलावों का लेखा-जोखा पेश किया। राहत पैकेज में कर्ज का ऐलान तो है, लेकिन मजदूरों को तत्काल नकद राशि देने के बारे में कुछ नहीं कहा गया। सबसे ज्यादा चिंता इस बात को देखकर हो रही है कि सरकार को अब भी उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए काम कर रही है। चौथे चरण के ऐलान में वित्तमंत्री ने कोयला खनन में सरकारी एकाधिकार को खत्म करने की बात कही साथ ही खनिज पदार्थ, रक्षा विनिर्माण, एयरोस्पेस मैनेजमेंट, अंतरिक्ष और आणविक ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश पर विशेष जोर दिया।

श्रम कानूनों में बदलाव तो पहले ही किए जा रहे हैं और अब निजीकरण से मजदूरों की झुकती कमर को पूरी तरह तोड़ने की तैयारी सरकार ने कर ली है, तिस पर दावा ये कि यह सब आत्मनिर्भर भारत के लिए किया जा रहा है। इस राहत पैकेज को देखकर यह अंदेशा होता है कि कहीं देश चलाने की जिम्मेदारी से भी सरकार हाथ न खींच ले और इसे किसी कंपनी के हाथों सौंप दे। मुसीबत में मौके की तलाश क्या इसी को कहते हैं साहेब।

(देशबन्धु)

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