मजदूर के मुकाबले कहाँ टिकेगा ईश्वर, साफ नहीं..

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-सुनील कुमार।।

देश के कुछ प्रमुख धर्मस्थानों की खबरें आ रही हैं कि वहां कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए बैंकों में जमा एफडी तुड़वानी पड़ रही है। धर्मस्थलों के कपाट बंद हो गए हैं, वहां होने वाले जलसे, रस्म-रिवाज सब बंद हो गए हैं, वहां रोज पूजा-पाठ करने वाले गिने-चुने लोग रस्म अदायगी कर रहे हैं, बाकी धर्म का धंधा मंदा है। लोगों को याद होगा कि कई हफ्ते पहले जब दिल्ली में तब्दीली जमात के लोगों के बीच बड़ी संख्या में कोरोना पॉजीटिव मिलने लगे तो उसी वक्त मुस्लिमों के कुछ प्रमुख नेता होने का दावा करने वाले चेहरे टीवी के स्टूडियो पर और दूसरे वीडियो में बढ़-चढ़कर धार्मिक फतवे जारी करते दिख रहे थे कि मरने के लिए मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, और कई धर्म के लोगों का यह कहना था कि जीना-मरना तो ईश्वर की हाथ की बात होती है। लेकिन धीरे-धीरे जब कोरोना ने अपनी पकड़ फैलाई, तो ये सारे धार्मिक दावे बंद हो गए, और अब टीवी चैनलों का पेट भरने के लिए भी ऐसा कोई दावा अब नहीं हो रहा है। कुल मिलाकर यह समझ पड़ रहा है कि जब सचमुच में बचाने की नौबत आती है, तो ईश्वरों के कपाट बंद हो जाते हैं, महज अस्पताल काम आते हैं, आग बुझाने को दमकल काम आती है, सड़क हादसे से जख्मियों को अस्पताल ले जाने एम्बुलेंस काम आती है, और आज देश में चलते हुए दसियों लाख गरीब-भूखे मजदूरों को खाना खिलाने के लिए मोटेतौर पर समाज काम आता है। जिन ईश्वरों ने जिंदगी भर लोगों से दान हासिल किया, जिनके मंदिरों में जमा सोने को गिनने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तमाम धर्मों के ऐसे तमाम उपासना केन्द्र आज की मुसीबत में किसी काम के नहीं रह गए हैं। होनी वही जो राम रखि राखा से लेकर जाको राखे सांईंयां, मार सके नहिं कोय जैसी कई बातें इंसान की समझ विकसित करने के बाद से बढ़ती चली गई हैं। ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, उसने जितनी सांसें दी हैं उससे एक अधिक सांस मिल नहीं सकती, इस तरह की भी कई बातें प्रचलित हैं। लेकिन सवाल यह है कि न दिखने वाले, और आकार में नापे न जा सकने वाले कोरोना के चलते ईश्वर की धारणा से जुड़े कोई भी दावे काम नहीं आ रहे।

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि कोरोना के बाद गरीब-मजदूर की हालत चाहे जो हो, देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था चाहे जो हो, ईश्वर की धारणा का क्या होगा, उसकी अपनी अर्थव्यवस्था का क्या होगा? क्योंकि आज बाजार के मंदी के बीच भी शेयर बाजार में कंपनियों के शेयरों के कुछ तो दाम है। लेकिन ईश्वर का तो पूरा कारोबार ही बंद हो गया है। अब यह भक्तों पर है कि वे इस हकीकत को समझते हुए भी मान पाते हैं, या फिर एक खुशफहमी में जिंदा रहना चाहते हैं कि हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन…।

क्या यह ऐसा वक्त आने वाला है जिसमें बहुत से लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया को मानो एक पिछली तारीख पर ले जाकर सेट किया जा सकेगा। कम्प्यूटरों को चलाने वाले सॉफ्टवेयर में ऐसा इंतजाम रहता है कि आप नए फेरबदल से खुश नहीं हैं, तो आप किसी एक पिछली तारीख पर इस सॉफ्टवेयर को ले जा सकते हैं, और आपका कम्प्यूटर उस तारीख सरीखा हो जाता है। क्या ईश्वर को लेकर समाज की धारणा में कोई ऐसा बुनियादी फेरबदल आ सकेगा? या फिर लोग और अधिक अंधविश्वासी होकर, भक्तिभाव और अधिक डूबकर ईश्वर की शरण में कुछ और हद तक चले जाएंगे कि कोरोना से हुए नुकसान से उबार दे ईश्वर? अभी यह बात साफ नहीं है क्योंकि इंसान का मिजाज समझना आसान नहीं है, और फिर यह बात भी है कि पिछले दो महीने में इंसान जिस दौर से गुजरे हैं, आज भी गुजर रहे हैं, और अगले कुछ महीने गुजरने वाले हैं, उससे यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि हिन्दुस्तान के दसियों करोड़ मजदूर ईश्वर की हकीकत को समझ जाएंगे या अपनी हकीकत को बदलने के लिए ईश्वर के चरणों में जाएंगे।

वैसे तो अब समय आ गया है जब लोग यह जान लें कि ईश्वर के बड़े-बड़े दरबारों वाली दिल्ली और मुम्बई में भूखे मजदूरों को ईश्वर के दिए महज भूख और बेदखली की सजा मिली, हासिल कुछ नहीं हुआ, एक वक्त का खाना भी नहीं मिला। जो मजदूर सैकड़ों मील चलकर, अपने कुनबे को ढोकर भी जिंदा हैं, उनको यह हकीकत समझ आना जरूरी है कि वे अपने दम पर जिंदा हैं, किसी ईश्वर की वजह से नहीं, किसी लोकतंत्र की वजह से नहीं, किसी सरकार की वजह से नहीं। बल्कि सच तो यह है कि वे ईश्वर के बावजूद जिंदा हैं, लोकतंत्र के बावजूद जिंदा हैं, और सरकारों के बावजूद जिंदा हैं। यह बात समझ में आना जरूरी है क्योंकि इसी मजदूर तबके को धार्मिक प्रवचनों से लेकर कारखानों में बने छोटे-छोटे मंदिरों तक कई प्रतीकों से ठगा और लूटा जाता है। ये मजदूर अगर आज भी राजा और व्यापारी का साथ देने वाले धर्म का सच नहीं समझ पाएंगे तो ये बाकी जिंदगी ऐसी ही गुलामी करते रहेंगे जैसी गुलामी उन्हें धर्मगुरुओं से लेकर कथावाचकों तक के हाथों दी जाती है।

पिछली कई पीढिय़ों के बाद, या कि एक सदी बाद हिन्दुस्तान में ईश्वर और धर्म पहली बार इस हद तक अप्रासंगिक हो गए हैं, इस हद तक हाशिए पर चले गए हैं कि देखते ही बनता है। एक सदी हम इसलिए कह रहे हैं कि पिछली महामारी 102 बरस पहले आई थी, और उसक वक्त कोई ऐसा सामाजिक अध्ययन अभी हमें याद नहीं पड़ रहा है कि 1918 के पहले या 1929 के बाद ईश्वर की धारणा में कोई फेरबदल आया था या नहीं। आज तो कायदे की बात यह है कि दुनिया के जो सबसे विकसित और सबसे सभ्य देश हैं, उनमें ईश्वर का धंधा कोरोना के पहले भी मंदा चल रहा था। लोग आस्था खो बैठे थे, धर्म को मानना बंद कर चुके थे, और नास्तिक हो गए थे। योरप के कुछ एक देशों में धर्म एकदम ही महत्वहीन हो चुका है। लेकिन यह अजीब बात है कि जो सबसे संपन्न लोग हैं, वे तो धर्म से दूर होते दिख रहे हैं लेकिन जो महज अपने खून-पसीने पर जिंदा हैं, और जिन्होंने अभी-अभी हिन्दुस्तान में अपनी ताकत को ईश्वर की ताकत के ऊपर साबित किया है, वे लोग अभी भी ईश्वर की तरफ जाएंगे या ईश्वर से दूर जाएंगे, यह अभी साफ नहीं है।

खैर, यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि ईश्वर नाम की एक कल्पना दुनिया पर फिर से अपना बेमिसाल राज कायम कर सकेगी, या नहीं कर सकेगी?
(छत्तीसगढ़)

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