मजदूर के पसीने से धरती का घड़ा भर सकता है..

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-सुनील कुमार।।

देश भर से गांवों में लौटने वाले मजदूरों के लिए अब बस एक ही किस्म के काम की गारंटी हो सकती है, सरकारी मनरेगा में मजदूरी। अभी एक-डेढ़ महीने के बाद खेती-किसानी में कुछ मौसमी काम निकल सकता है, लेकिन वह भी कुछ महीने ही चलेगा, और फसल के साथ ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में दशकों पहले केन्द्र सरकार ने नरेगा और मनरेगा नाम से जो योजना चल रही है उसमें देश में रोज करोड़ों लोगों को मजदूरी मिल रही है, और यह मजदूरी ठीक-ठाक रोजी की रहती है। कोरोना के माहौल में जब बहुत सावधानी के साथ काम करने की एक मजबूरी है, उस दौर में भी छत्तीसगढ़ ने मनरेगा में मिलने वाले काम की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर बताई जा रही है, फिर चाहे वह पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से बहुत ही कम ही क्यों न हो। पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से हिन्दुस्तान में आज एक ही चीज अधिक है, और वह है पैदल सफर। इतना पैदल सफर न विभाजन के वक्त हुआ था, और न ही पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को इतना सफर करना पड़ा था क्योंकि इन दोनों ही वक्त पर रेलगाड़ी और सड़क की गाडिय़ां भी हासिल थीं।

आज जब मनरेगा में रिकॉर्ड संख्या में लोगों को रोजगार मिलना है, और उसका अधिकांश हिस्सा तालाबों की खुदाई किस्म के पूरी तरह मजदूरी देने वाले काम रहेंगे, तो यह एक समस्या के साथ-साथ आया हुआ एक अवसर भी है। अवसर जिस हिसाब से बारिश के पहले-पहले सैकड़ों करोड़, या हो सकता है हजारों करोड़ भी मजदूरी में लगाए जाएं। ऐसे में इस पैसे का एक फायदा भी उठाया जा सकता है। अगर पूरे प्रदेश में बारिश के अतिरिक्त पानी को नदियों में जाकर बाढ़ बनने से रोकना है, तो नदियों के कैचमेन्ट एरिया में ऐसे बड़े-बड़े तालाब बनाने चाहिए जो कि अनिवार्य रूप से चाहे किसी आबादी के काम न भी आ सके। आबादी के लिए तालाबों का गहरीकरण एक बात है, और बारिश के अतिरिक्त पानी को बाढ़ में बर्बाद हो जाने से रोकना एक दूसरी किस्म का काम है। जहां से पानी नदियों में जाता है वहां पर उनको तालाब बनाकर रोकने का काम करना चाहिए। इसे आबादी के सीधे काम का न मानकर भूजल भंडारण बढ़ाने के काम का मानना चाहिए जिससे कि सारी जनता को बारिश के बाद के महीनों में पानी पाने में आसानी हो।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने आने के साथ ही नालों को बांधकर उनमें पानी रोकने का एक काम किया है जो कि बहुत बड़े पैमाने पर हुआ है। सरकार के डेढ़ साल में कम से कम एक साल ऐसे नाले बांधे गए हैं। अब सरकार को जमीन के भीतर पानी बढ़ाने के लिए अपना फोकस एक दूसरी तरफ मोडऩा चाहिए, और जिन इलाकों से बड़े पैमाने पर बारिश का पानी नदियों में जाता है, उन इलाकों में बड़े-बड़े तालाब बनवाने चाहिए, जिनमें मजदूरों के साथ-साथ अगर जरूरत पड़े तो मशीनों का इस्तेमाल करके भी बारिश के पानी का बड़े से बड़ा भंडार बनाना चाहिए। हमारी यह सलाह रोजगार को बढ़ाने के लिए तो है ही, लेकिन साथ-साथ धरती के भीतर घटते हुए पानी की भरपाई के लिए भी है। इस पानी की भरपाई किसी कर्ज के चुकारे के लिए नहीं है, बल्कि यह धरती के घड़े को भरकर रखने जैसा काम है ताकि जब गर्मी में तपकर इंसान घर लौटें तो उस घड़े का पानी पी सकें। इसके साथ-साथ योजना बनाने वालों की एक बड़ी खूबी यह भी हो सकती है कि वह महानगरों और शहरों से गांव लौट रहे देश भर के पांच-दस करोड़ मजदूरों और कामगारों के लिए गांवों में कुटीर उद्योग या किसी और तरह के स्वरोजगार की भी सोचे। खेती-किसानी, पशुपालन, मछलीपालन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, बकरी पालन, रेशम, ऐसे दर्जनों काम हैं जिनमें गांवों में अधिक पानी की जरूरत पड़ेगी, और आज अगर मनरेगा के तहत यह इंतजाम किया जा सकता है, तो हो सकता है कि बहुत से मजदूरों को शहर लौटना ही न पड़े।

जमीन के भीतर के पानी को खींचकर निकालने का काम छत्तीसगढ़ में खूब होता है। सरकार तकरीबन मुफ्त या अधिकतम रियायत वाली बिजली देती है, सोलर पंप लगाकर देती है, और धान का अधिकांश हिस्सा बाजार भाव से बहुत अधिक पर खरीद भी लेती है। नतीजा यह होता है कि छत्तीसगढ़ी किसान धान से परे अधिक नहीं सोच पाते। देश के दूसरे हिस्सों में तरह-तरह की फसलें ली जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में शायद नब्बे फीसदी से अधिक फसल सिर्फ धान की होती है। धान का मिजाज राजस्थानी ऊंट सरीखा होता है, और वह खूब पानी पीता है, महज पानी मांगता है, और फिर महीनों तक किसी और देखभाल की जरूरत नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि मुफ्त की बिजली, मुफ्त का भूजल, और फसल बिक जाने की गारंटी के चलते किसान धरती की एक-एक बूंद खींच लेने में जुट जाते हैं। ऐसे में धरती के भीतर जो नुकसान हो रहा है, उसका अंदाज अभी नहीं लग रहा है। लेकिन सिर्फ बहस के लिए एक बुरी कल्पना करके देखें, अगर धरती के भीतर भूकंप जैसी किसी नौबत से कोई प्लेट खिसक गई, और पानी एकदम से गिर गया तो क्या होगा? तो पंप किस काम आएंगे, और धान की सरकारी खरीदी लोगों की क्या मदद कर सकेगी? अगर पानी हजार फीट नीचे चले गया, तो कितने इलाकों में फसल हो पाएगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो दो बातों के बारे में सोचने को कहते हैं। पहली बात तो यह कि धरती के भीतर बारिश के पानी को बचाने के लिए हर किसी की कोशिश होनी चाहिए। इस सरकार की नीति के हिसाब से नाले भी बांधने चाहिए, और री-चार्ज तालाब भी बनाए जाने चाहिए जिससे नदियों की बाढ़ भी घटेगी, और ऐसे तालाबों का गर्मी के महीनों तक इस्तेमाल भी हो सकेगा। आज मनरेगा में मजदूरी देने के लिए सबसे आसान काम तालाबों का गहरीकरण है, और नए तालाब बनाना है। आज से एक-डेढ़ महीने तक ही यह काम चलने वाला है, और प्रदेश सरकारों को मजदूरी से जमीनी पानी को जोडऩे का एक अभियान चलाना चाहिए जो कि देश भर के मजदूरों के पसीने से धरती का घड़ा भर देगा।
(छत्तीसगढ़)

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