इन मुस्कुराहटों को जो समझ नहीं पाएंगे वे एक पूरा युग समझना चूक जाएंगे…

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-सुनील कुमार।।

आज जब तप रही सड़कों पर करोड़ों मजदूर नंगे पैर या टूटी-फूटी चप्पलों के साथ एक अंतहीन सफर पर हैं, तब बीच रास्ते उन्हें करीब से देखना एक ऐसा तजुर्बा है जिसे फोटोग्राफर, रिपोर्टर, और मौके पर तैनात सरकारी कर्मचारी, या समाजसेवी लोग कभी भूल नहीं पाएंगे। आज जो लोग अपने एयरकंडीशंड घरों में बैठे इस बात का रोना रो रहे हैं कि उनका बाहर निकलना नहीं हो पा रहा है, अधिक संपन्न लोग इस बात का रोना रो रहे हैं कि वे कहीं जा नहीं पा रहे हैं, कुछ खरीद नहीं पा रहे हैं, और घर में रहते हुए उब गए हैं, पता नहीं रेस्त्रां और सिनेमा कब शुरू होंगे। देश में इससे अधिक विरोधाभास वाला कोई माहौल शायद इतिहास में कभी नहीं रहा कि घर बैठे लोग बाहर निकलने को झींक रहे हैं, और बाहर के लोग अपने घर पहुंचने के लिए मौत का एक सफर तय कर रहे हैं। ऐसे में हम सड़कों पर लोगों को देखने की बात इसलिए भी कर रहे हैं कि जगह-जगह सड़कों पर लोग जिन छोटी-छोटी बातों से खुश होते दिख रहे हैं, वह हैरतअंगेज है। लोगों को याद होगा कि लॉकडाऊन के कुछ दिनों के भीतर ही इस अखबार में हमने दिल्ली की एक रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के लिए पैदल रवाना हुए एक परिवार और उसके दो बच्चे सामान लेकर चल रहे थे, और एक मददगार युवती ने जब उन्हें रोककर खाने-पीने का सामान देना चाहा, तो परिवार का जवाब था कि साथ में सामान है, और हैरान करने वाले एक संतोष के साथ परिवार आगे बढ़ा। आज जब करोड़पति इंसान में अरबपति बनने के लिए, अरबपति में खरबपति बनने के लिए एक हवस सवार रहती है, तब हजार किलोमीटर के ऐसे पैदल परिवार का संतोष देखने लायक लगता है।

इस महीने भर में गंगा में बहुत पानी बह चुका है, दसियों लाख मजदूर अपने गांव पहुंच चुके हैं, तब भी आज फिर इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझ रही है कि सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल चुके लोग अगर आगे के सफर के लिए तपते हुए लोहे से लदी हुई ट्रक पर भी बैठने की जगह पा रहे हैं, तो उनके चेहरे खुशी से खिल जा रहे हैं। ऐसे ही लंबे सफर के बाद किसी बस में परिवार को आगे के लिए जगह मिल गई, तो छोटे बच्चों से लेकर उनकी मां तक के चेहरे हॅंसी से जगमगाते दिख रहे हैं। जिंदगी कैसी हो गई है कि जिंदा रहना भी एक तसल्ली दे रहा है, ट्रक पर जगह मिल जाना भी सब कुछ हासिल हो जाने सरीखा साबित हो रहा है। जो लोग अपने घरों में आराम से बैठे हैं, जिनके पास टीवी और इंटरनेट पर सैकड़ों चैनल का मनोरंजन देखने की सहूलियत है, वैसे लोग क्या इस एक महीने में ऐसी महिला, ऐसी बच्ची जैसी खुशी पा सके हैं?

आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखना इसलिए सूझ रहा है कि दुख और तकलीफ का ऐसा दौर हमने पहले कभी देखा नहीं, और शायद आगे की बाकी जिंदगी में ऐसा देखना न हो। इसलिए सैकड़ों किलोमीटर जले हुए तलुओं के ऊपर की देह पर के चेहरे पर जो हॅंसी और खुशी देखने मिल रही है, उसे देखने का मौका किसी को चूकना नहीं चाहिए। हम यह तो नहीं कहते कि यह खुशी सचमुच ही खुश करने वाली है, क्योंकि इस खुशी की एक वजह वह यातना भी है जिससे गुजरने के बाद की थोड़ी सी राहत के चलते यह खुशी मिल रही है। इस पूरे नजारे को देखें, इस पूरी नौबत को समझें तो यह समझ आता है कि सुख और दुख ये सब कुछ तुलनात्मक रूप से होते हैं, ये अपने आपमें कुछ भी नहीं होते। किसी एक की खुशी दूसरे के लिए बिल्कुल भी बेमायने हो सकती है। एक परिवार में जिस उम्र की छोटे बच्चे मोबाइल और टीवी की स्क्रीन पर कार्टून फिल्म देखकर भी खुश नहीं होते, जिन्हें खिलाना मां-बाप के लिए एक मशक्कत होता है, उसी उम्र के मजदूर-परिवारों के बच्चे सड़कों पर जिस तरह एक पैकेट बिस्किट पाकर खुश हैं, उससे समझ पड़ता है कि खुशी और गम हरेक के लिए बिल्कुल ही अलग-अलग पैमानों पर शुरू होते हैं, और अलग-अलग घटते-बढ़ते हैं।

लेकिन इसके साथ-साथ एक बात जो समझने की है, वह यह है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के भीतर मेहनतकश गरीब आबादी का यह क्या हाल हो गया है कि सफर के आखिरी हिस्से के लिए मिली कुछ राहत भी उसे शुरू की सारी तकलीफ भूल जाने में मदद कर रही है। लोकतंत्र में यह कैसी नौबत आई हुई है कि अच्छी खासी बड़ी तकलीफ भी उसके पहले की पहाड़ से बड़ी तकलीफ का दर्द भुला देती है, और चेहरे पर मुस्कुराहट ले आती है। क्या यह सचमुच ही लोकतंत्र है, या लोकतंत्र की एक ऐसी कागजी शक्ल है जिसके भीतर सब कुछ खोखला है? जब आबादी का आधा हिस्सा कम तकलीफ को ही आराम मानने लगता है, तो यह समझ पड़ता है कि लोकतंत्र में आम लोगों की हालत आम की ऐसी चूसी हुई गुठली की तरह हो गई है, जिसे पाकर घूरे पर जिंदा गाय खुश हो जाती है।

क्या यह सचमुच ही एक लोकतंत्र का नजारा है? क्या यह सचमुच ही इंसानियत का नजारा है? क्या सचमुच ही पांच ट्रिलियन डॉलर की तरफ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है? क्या यह लोकतंत्र लोगों के अपने पैरों पर सैकड़ों मील के सफर के बाद उनको कुछ भरोसा दिलाने वाला रह गया है? नोटबंदी के बाद एक वक्त का, एक लंबा दौर था जब लोगों की अपने खाते में पड़ी हुई रकम भी उनके काम की नहीं रह गई थी। आज हिन्दुस्तानी जनता के पास, उनकी देह के भीतर ताकत का पॉवरहाऊस भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, उनका हुनर भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, किसी जगह बरसों काम करने का तजुर्बा भी उनके काम का नहीं रह गया है, किसी कारोबारी महानगरी की झोपड़पट्टी में जुटाया गया टूटा-फूटा सामान भी उनके काम का नहीं रह गया है। कल ही सोशल मीडिया पर किसी ने यह सवाल उठाया है कि जिंदा रहने के लिए जिन सामानों की जरूरत पड़ती है, उन फटे-पुराने सामानों को लोग महानगरों के खाली किए हुए मकानों के बाहर न तो ढोकर ला पाए होंगे, और न ही उनके बिना आगे उनका काम चलेगा।

ऐसी नौबत के लोग भी पल भर के लिए अगर मुस्कुरा सकते हैं, मुस्कुरा रहे हैं तो यह कम से कम हमको बहुत बुरी तरह हैरान करने वाली बात है कि देह का इतना दर्द, मन का इतना विचलन, और दिमाग का दहशत से भरा होना भी उन्हें जिंदगी के लिए उम्मीद से रोक नहीं पा रहा है। ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं जिनके पास सबसे बड़ी ताकत अपनी देह की ताकत है, जिसे कि हजार मील का सफर भी छीन नहीं पाया है। जो लोग त्रासदी के इस दौर में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे ऐसे योद्धाओं के चेहरों को देखकर इन बातों को सोच-समझ नहीं पाएंगे, उनके लिए एक पूरा युग बिना कुछ समझे निकल जाएगा।
(दैनिक छत्तीसगढ़)

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