हलाल और हलाल प्रमाणन का अंतर समझिए..

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-संजय कुमार सिंह।।
कट्टरपंथी हिन्दू मित्रों को पता है कि हलाल शाकाहारी लोगों का मामला नहीं है। पर अब कुछ हलाल प्रमाणन चल पड़ा है इसलिए बेचारे खुद को रोक नहीं पाते हैं और अपना अज्ञान सोशल मीडिया पर मुफ्त में उड़ेल दे रहे हैं। अज्ञान उड़ेलने में कोई बुराई नहीं है पर इसका मकसद सांप्रदायिकता भड़काना हो तो निश्चित रूप से गलत है। कट्टर पंथियों के साथ यही समस्या है कि वे अपने अज्ञान को भी ज्ञान मान लेते हैं और उसी आधार पर सबको ज्ञान देते हैं जो असल में सांप्रदायिकता फैलाता है। इस पोस्ट के साथ दो चित्र हैं, एक व्हाट्सऐप्प संदेश जो फॉर्वार्ड होता हुआ मेरे पास एक भक्त मित्र ने भेजा है जो एक इंजीनियरिंग पढ़कर एक सरकारी उपक्रम में बड़ा अधिकारी है। दूसरा एक भक्त मित्र की फेसबुक पोस्ट है जो पत्रकार हैं। दोनों घोषित तौर पर शाकाहारी हैं। कायदे से यह उनका विषय ही नहीं है पर कट्टर किस्म के लोग धर्म को खतरे में तो नहीं ही देख पाते हैं। दूसरे, (एक खास धर्म जिससे उन्हें खास परेशानी है) उसका अच्छा भी नहीं देखना चाहते हैं।


इसीलिए ऑपइंडिया पर अंग्रेजी में एक शीर्षक है जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह होगा, शाकाहारी उत्पादों के लिए हलाल प्रमाणन : अब यह पसंद का मामला नहीं रहा, बल्कि अपनी मान्यताओं के लिए दूसरों से पैसे वसूलने का है। इसका उपशीर्षक है, गैर जीव उत्पादों के लिए हलाल प्रमाणन को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, बुनियादी तौर पर बिल्कुल अलग है, पर दोनों के लिए प्रमाणन प्रक्रिया एक ही और इसका मकसद एक ही उद्देश्य हासिल करना है। hindujagruti.org पर लिखा है, मुसलमानों द्वारा प्रत्‍येक पदार्थ अथवा वस्‍तु इस्‍लाम के अनुसार वैध अर्थात ‘हलाल’ होने की मांग की जा रही है । उसके लिए ‘हलाल सर्टिफिकेट (प्रमाणपत्र)’ लेना अनिवार्य किया गया । इसके द्वारा इस्‍लामी अर्थव्‍यवस्‍था अर्थात ‘हलाल इकॉनॉमी’ को धर्म का आधार होते हुए भी बहुत ही चतुराई के साथ निधर्मी भारत में लागू किया गया। अब तो यह हलाल प्रमाणपत्र केवल मांसाहारतक सीमित न रहकर खाद्यपदार्थ, सौंदर्य प्रसाधन, औषधियां, चिकित्‍सालय, गृहसंस्‍थी से संबंधित आस्‍थापन और मॉल के लिए भी आरंभ हो गया है।
अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि हलाल प्रमाणन है क्या और इसकी सार्थकता क्यों है। बीबीसी की 2014 की एक खबर के अनुसार, मौली और गिरिश्मा अहमदाबाद के एक जैन परिवार में जन्मीं और उन्होंने दो साल पहले (मतलब 2012 में) इकोट्रेल पर्सनल केयर कंपनी शुरू की थी। अपनी विदेश यात्राओं के दौरान अक्सर दोनों बहनें ‘हलाल’ सौंदर्य उत्पाद की दुकानें देखतीं थीं। मौली कहती हैं, “जब हलाल के बारे में जाना और समझा तो पता चला कि भारत में मुस्लिम महिलाएं कई सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल नहीं कर पातीं, क्योंकि वो हलाल नहीं हैं. बस यहीं से शुरुआत हुई।” गिरिश्मा कहती हैं, “ज़्यादातर नेल पॉलिश में ऐसे पॉलीमर होते हैं, जो वज़ू करते वक़्त नाखून को गीला नहीं होने देते। कई लिपस्टिक उत्पादों में सूअर की चर्बी होती है और ज़्यादातर शैम्पू तथा परफ्यूम में अल्कोहल होता है। हमने शोध शुरू किया और डेढ़ वर्ष में सफलता मिली।” खबर के अनुसार, पुराने शहर और मॉल को छोड़कर अहमदाबाद में चंद ही जगहें हैं, जहाँ हिन्दू और मुसलमान साथ में ख़रीदारी करते हैं। फिर भी हलाल के बारे में ऐसी खबरें? मौली कहती हैं, “ज़्यादातर लोग हलाल का मतलब मीट या नॉनवेज समझते हैं। हम यह सोच दूर करना चाहते हैं।” संक्षेप में हलाल प्रमाणित उत्पाद का मतलब होता है उसमें जानवरों का उपयोग नहीं किया गया है। ना ही परीक्षण में ना किसी और काम के लिए। यह शाकाहारियों के लिए भी अच्छा है। पर प्रचारकों के राज में प्रचार जो न कराए।
भारत में यह प्रमाणन देने वाली प्रमुख एजेंसी, ग्लोबल इस्लामिक सरिया सर्विसेज (जीआईएसएस) है। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी दूसरे प्रमाणन की ही तरह है। अगर आपको एक प्रमाणन से भरोसा हो तो दो प्रमाणन से वह भरोसा कम नहीं होना चाहिए बल्कि बढ़ना चाहिए। देसी उत्पादों के निर्यात के लिए भी यह प्रमाणन जरूरी है। लेकिन हमारे यहां इसका प्रचार अलग तरह से चल रहा है। इसके बावजूद सत्तू और नमक भी हलाल प्रमाणित हैं। देश भर के उपभोक्ताओं में मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग है अगर उस वर्ग में अपने उत्पादों की बिक्री करनी है वह प्रमाणन चाहता है तो लेना होगा और अगर दूसरा वर्ग ऐसे उत्पादों का विरोध करे तो कारोबार मुश्किल होगा। बेचने वालों के साथ विवाद और तनाव के छिपटपुट मामले होते रहेंगे सो अलग। इसलिए जरूरी है इसे बढ़ने से पहले खत्म कर दिया जाए। अगर सरकार समझती है कि यह अनावश्यक विवाद खड़े करेगा तो इसकी जरूरत खत्म कर देनी चाहिए और अगर जरूरी है तो लोगों को समझाया जाना चाहिए। गलत जानकारी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, उद्योग बीच का रास्ता निकाल लेंगे।
वैसे भी मैकडोनल्ड्स अगर हलाल मांस का उपयोग करता है तो यह मांस खाने वालों की समस्या है। शाकाहारियों की नहीं होनी चाहिए। अगर यह तर्क दिया जाए कि दूसरे किस्म का मांस बेचने वालों को मैकडोनल्ड्सतरजीह नहीं देता है तो यह भी उसका और उसके ग्राहकों के बीच का मामला है। अगर ग्राहकों को इसपर एतराज नहीं है तो मैकडोनल्ड्स दूसरे किस्म का मांस क्यों खरीदे और एक ग्राहक या विक्रेता के रूप में बर्गर खरीदते हुए यह कहना कि उसे नॉन वेज में हलाल मांस वाला बर्गर और गैर हलाल आटे वाला बन दिया जाए या दोनों झटका ही हो तो रेस्त्रां का काम बढ़ेगा और उत्पाद महंगे होंगे। ग्राहकों को इसकी जरूरत होगी तो वो इसके पैसे भी देंगे पर जब तक ग्राहक ऐसी मांग नहीं कर रहे हैं और करेंगे तो पहले रेस्त्रां में शुरू होगा जहां मांस की खपत अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है। इस हलाल मांस और हलाल प्रमाणित आटे में बहुत फर्क है। और अगर बर्गर पर दोनों बातें लागू कर दी जाएं तो उसकी इतनी किस्में प्रमाणित हो जाएंगी कि सब कुछ उपलब्ध कराना एक रेस्त्रां के लिए शायद संभव ही नहीं हो। तब वहां वही जाएंगे जिन्हें वहां परोसी जाने वाली चीजें पसंद हों।
वैसे भी, मैकडोनल्ड्स अगर कहता है कि उसके सभी रेस्त्रां हलाल प्रमाणित हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हलाल मटन का उपयोग करता है। हलाल दरअसल एक प्रमाणन है जो एक अलग एजेंसी देती है और ग्राहकों का एक बड़ा वर्ग इस प्रमाणन की मांग करता है या इसपर यकीन करता है। इसलिए कारोबार करने वालों की मजबूरी है कि वे हलाल प्रमाणित हों। यह आईएसआई या आईएसओ 9001 प्रमाणित होने की ही तरह है। ऐसे में अगर वह कहता है कि उसके यहां हलाल मांस का उपयोग होता है तो वह अलग मामला है और यह मैकडोनल्ड्स व उसके ग्राहकों के बीच की बात है। सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा नहीं हालांकि मैकडोनल्ड्स का मामला थोड़ा अलग है। आइए उसे भी जान लें।
अखबारों की पुरानी खबरों के अनुसार 22 अगस्त 2019 को किसी ने ट्वीट कर मैकडोनल्ड्स इंडिया से पूछा कि क्या मैकडोनल्ड्स इंडिया हलाल प्रमाणित है? मैकडोनल्ड्स ने इसका दवाब ट्वीट के जरिए ही दो हिस्सों में दिया। दैनिक भास्कर ने इसका हिन्दी अनुवाद छापा है, “शख्स को जवाब देते हुए कंपनी ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, ‘वक्त निकालकर मैक्डॉनाल्ड इंडिया से संपर्क करने के लिए धन्यवाद। आपके सवाल का जवाब देने के लिए मिले इस मौके से हम बेहद खुश हैं। सभी रेस्टोरेंट्स में हम जो मीट इस्तेमाल करते हैं, वो उच्चतम गुणवत्ता वाला होता है और एचएसीसीपी सर्टिफिकेट रखने वाले सरकारी मान्यता प्राप्त आपूर्तिकर्ताओं से लिया जाता है।
दूसरे हिस्से में लिखा था, हमारे सभी रेस्टोरेंट्स हलाल सर्टिफिकेट्स प्राप्त हैं। आप अपनी संतुष्टि और पुष्टि के लिए संबंधित रेस्टोरेंट मैनेजर से प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कह सकते हैं।’” (अखबार में दोनों ट्वीट के स्क्रीन शॉट हैं। इनमें से एक को लोग दिखाकर कहते हैं कि मैकडोनल्ड्स हलाल मीट का उपयोग करता है जबकि लिखा हलाल प्रमाणन के लिए गया है और संभवतः इसलिए कि प्रश्नकर्ता मुस्लिम लगता/लगती है। पहले हिस्से में साफ लिखा है कि मांस एचएसीसीपी प्रमाणित होता है। हलाल प्रमाणित नहीं। आप इसका जो मतलब लगाइए, पर तथ्य यही है कि मैकडोनल्ड्स ने हलाल प्रमाणित मांस के उपयोग की बात नहीं कही है बल्कि अपने रेस्त्रां को हालल प्रमाणित होने का दावा किया है और दोनों बातों में भारी अंतर है।
अरबी में हलाल शब्द का मतलब ‘अनुमति’ है और हलाल सर्टिफिकेशन के मायने ऐसे प्रॉडक्ट से है, जिसे बनाने में इस्लामिक कानून को पूरी तरह माना गया हो। 3.2 लाख करोड़ डॉलर के ग्लोबल हलाल मार्केट में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2 फीसदी है। देश में हलाल कॉस्मेटिक्स का चलन शुरू ही हुआ है और अभी इस इंडस्ट्री का साइज 10 अरब डॉलर है। हलाल के बारे में कल मैंने लिखा था कि बीबीसी की 2014 की खबर अहमदाबाद से शुरू हुई थी और आज फिर मैं अहमदाबाद की ही 2015 की खबर का उल्लेख कर रहा हूं। मोटे तौर पर इसका मतलब है कि यह विवाद तथाकथित गुजरात मॉडल का हिस्सा हो सकता है जो पहले गुजरात में सीमित था और अब राष्ट्रीय स्तर पर है। ना इसे तब निपटाया गया ना अब निपटाने की कोशिश की जा रही है। गलत या आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर भड़काने वाली पोस्ट लिखना अपनी जगह है ही। जानकारी नहीं होना बुरा नहीं है। बुरा है, अधूरी या गलत जानकारी पर भड़काने वाली पोस्ट लिखना।
हलाल शब्द का एक अर्थ है। पर जब यह अंतरराष्ट्रीय हो गया है और आप इस पर लिखना चाहते हैं तो पहली जरूरत है कि इसे समझने की कोशिश करें। जरूरी नहीं है कि एक ही कोशिश में सब कुछ समझ में जा जाए पर समझना चाहिए कि भारत में अगर कुछ हो रहा है, भारतीय कंपनियां ऐसा प्रमाणन ले रही हैं तो भारत सरकार की जानकारी में हो रहा होगा और गलत नहीं होगा। फिर भी आपको लगता है कि गलत है तो सरकार को लिखिए, पोस्ट लिखकर लोगों को भड़काने का क्या मतलब? 2015 की ही एक खबर में भी कहा गया था, भारत में ‘हलाल’ शब्द का मतलब मीट या मीट प्रॉडक्ट्स से लगाया जाते हैं, लेकिन देश के कई पर्सनल केयर ब्रांड्स अपने प्रॉडक्ट्स के लिए हलाल सर्टिफिकेशन लेने में जुटे हैं। इस सर्टिफिकेशन का मतलब है कि उस खास प्रॉडक्ट को बनाने में किसी जानवर, केमिकल्स या अल्कोहल का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
उपभोक्ताओं के एक वर्ग के बीच ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिसे बनाने में जानवरों के साथ कोई बदसलूकी नहीं की गई हो और जो पूरी तरह सुरक्षित हो। कॉस्मेटिक कंपनियों में इबा, इमामी, केविनकेयर, तेजस नेचरोपैथी, इंडस कॉस्मेटिकल्स, माजा हेल्थकेयर और वीकेयर ने अपने कई प्रॉडक्ट्स के लिए हलाल सर्टिफकेशन लिया है। हलाल सर्टिफिकेशन के तहत बनने वाले प्रॉडक्ट्स में एनिमल फैट या कीड़ों के रंग के अलावा दूध से बनी चीजों और बीवैक्स का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके साथ ही वे इन कॉस्मेटिक की टेस्टिंग जानवरों पर नहीं कर सकते हैं। यानी जो प्रॉडक्ट्स हलाल सर्टिफिकेशन के तहत बनते हैं वो पूरी तरह शाकाहारी होते हैं। इसके बावजूद सिर्फ सर्टिफिकेशन का नाम हलाल होने से इसे मुसलमानों के मतलब का कहा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे पहले बाल मजदूरी के खिलाफ ऐसा अभियान चल चुका है जब सामान खरीदने वाले इस बात पर जोर देते थे कि उत्पादन के निर्माण में किसी भी स्तर पर बाल श्रम का उपयोग नहीं हुआ है। हलाला प्रमाणन का यह अभियान पशु क्रूरता का खिलाफ है पर चूंकि यह नाम मांस के लिए जानवरों को काटने की मुसलमानों की एक विधि से मिलता है और शायद कुछ अन्य कारणों से भी इसे मुसलमानों से जोड़ दिया गया है जबकि हलाल उत्पाद का संबंध शुद्धता या पशु क्रूरता से मुक्त होना है। देश की हलाल सर्टिफाइंग बॉडी हलाल इंडिया के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर मोहम्मद जिन्ना ने बताया, ‘हलाल सर्टिफिकेशन का मतलब है कि प्रॉडक्ट बनाने में क्लीन सप्लाई चेन और कम्प्लायंस का पूरा ध्यान रखा गया है, जिसमें सोर्सिंग से लेकर ट्रेड तक शामिल है। इस कॉन्सेप्ट के बारे में जागरूकता बढ़ने के बाद हम देख रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा कंपनियां हलाल सर्टिफिकेशन ले रही हैं।’ उम्मीद है अब पाठकों को समझ में आ जाएगा कि आटा, नमक या सत्तू क्यों हलाल प्रमाणित है और यह भी कि बिना हलाल किया हलाल प्रामाणित का सर्टिफिकेट कैसे बनता है।
यह इसलिए भी जरूरी है कि तथ्य बताने और कोई तुक नहीं होने के बावजूद सोशल मीडिया पर #BoycottMcDonalds (मैक्डॉनाल्ड का बहिष्कार करें) ट्रेंड करने लगा था। इस पोस्ट का साथ लगा आटे का पैकेट ट्वीटर से लिया गया है। @IntrepidSaffron ने निर्माता कंपनी से पूछा है कि इसकी जरूरत क्यों है? और आगे एलान है, मैं कसम खाता हूं कि मैं अपने किसी हिन्दू मित्र और रिश्तेदार को आशीर्वाद आटा नहीं खरीदने दूंगा। मैं सभी हलाल उत्पादों का बहिष्कार करने जा रहा हूं। #Hinduphobia_in_Jharkhand 25 अप्रैल के इस ट्वीट को 2100 बार रीट्वीट किया गया है 3100 लोगों ने लाइक किया है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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