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पुराना मुहावरा है काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। लेकिन मोदी सरकार ये साबित कर चुकी है कि वह काठ की हांडी को एक बार क्या दस बार चढ़ाकर भी अपना मतलब साध सकती है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कोरोना का यह भयावह काल, जिसमें लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन पर संकट बन आया है। पूरी दुनिया एक साथ इस संकट को देख रही है और इसे दूर करने के उपाय तलाश रही है। लेकिन भारत में इस वक्त भी सरकार जुमलेबाजी की आदत छोड़ नहीं रही है। भाजपा हमेशा चुनाव जीतने की जुगत में लगी रहती है, यह तो पता था।

लेकिन यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि इस वक्त भी उसकी प्राथमिकता आम जनता का दुख दर्द दूर करना नहीं है, बल्कि छद्म राष्ट्रवाद के बूते सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना है। यह बात अब हर कोई जानता है कि जिस समय कोरोना को भारत में फैलने से रोका जा सकता था, उस वक्त भी भाजपा मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिराने की तिकड़म भिड़ा रही थी। उसने सत्ता को दोबारा जीत लिया, लेकिन देश को हरा दिया। कोरोना के कारण जान पर तो आफत आई ही, लाखों जिंदगियां आर्थिक बदहाली का शिकार हो गईं। अब भी रोजाना घर लौटते मजदूरों की जान पर संकट बना हुआ है। उन्हें तत्काल नकद राशि की सहायता देकर या वाहन की व्यवस्था कर सुरक्षित घर पहुंचाने की जगह सरकार आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा रही है।

मोदीजी ने लगभग आधे घंटे कर आत्मनिर्भरता का जो प्रवचन टीवी पर दिया, उससे जाहिर है कि वे देश की मौजूदा हकीकत से नावाकिफ हैं।  जो लोग श्रद्धाभाव से उनका प्रवचन सुनकर गदगद हो रहे थे, वे खुद अपने रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। अभी महीने-डेढ़ महीने हाथ से काम करने में सबको शारीरिक श्रम की महत्ता का अंदाज लग चुका होगा। और मजदूर तबका तो सड़कों पर है, इसलिए आत्मनिर्भरता का यह सरकारी ज्ञान उसने लिया ही नहीं होगा। वैसे भी यह तबका काफी खुद्दार था, लेकिन मोदीजी की नीतियों और फैसलों से उसकी खुद्दारी भी दांव पर लग गई। 

बहरहाल, आत्मनिर्भर भारत अभियान और लोकल के लिए वोकल, ये दो जुमले इस बार मोदीजी के भाषण में निकलकर आए। इनमें विचार नया नहीं है, केवल नयी पैकिंग में पुराना माल है। एक चतुर व्यापारी अक्सर पुराने सामान को इसी तरह बेचता है।

लेकिन क्या देश कोई बाजार है, जिसमें मोदीजी अपना पुराना माल बेचने निकले हैं। आत्मनिर्भर भारत के लिए इस वक्त अभियान कहां से खड़ा कर दिया गया। आजादी के बाद से ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम चल रही है। देश के कई बड़े कारखाने, अस्पताल, शोध संस्थान, सार्वजनिक निकाय भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए ही बड़ी सूझबूझ के साथ बनाए गए थे। नेहरूजी की दूरदृष्टि का परिणाम था कि अमेरिका या रूस दोनों में से किसी एक का पिछलग्गू बनने की जगह गुटनिरपेक्षता को अपनी ताकत बनाया जाए और आर्थिक रूप से सक्षम होने के लिए अगर विदेशी मदद की जरूरत भी पड़े तो उसमें बराबरी से, बल्कि सिर ऊंचा करके बात की जाए। यही कारण है कि रूस, जर्मनी, जापान सबका सहयोग भारत को मिला। लेकिन मोदी सरकार ने गुटनिरपेक्षता को दबे पांव तिलांजलि तो दे ही दी, कई मौके ऐसे भी आए, जब अमेरिका हम पर हावी होता दिखा। हाल ही में जिस धमकी भरे अंदाज में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से दवा की मांग की थी, वह इसका उदाहरण है।

भारत को आत्मनिर्भर बनाने में जिन सार्वजनिक निकायों और राष्ट्रीय, सहकारी बैंकों की बड़ी भूमिका थी, वे भी मोदीकाल में बदहाल हो गए। धन जुटाने के नाम पर कई सार्वजनिक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को निजी हाथों में गिरवी रख दिया गया या पूरी तरह नीलाम कर दिया गया। संचार, बिजली, तेल, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य हर क्षेत्र में तो निजी कंपनियों का दखल है, और इन निजी कंपनियों के बड़े खेल विदेशों से संचालित होते हैं। फिर किस तरह सरकार आत्मनिर्भरता का ज्ञान दे रही है। छह साल पहले मोदीजी ने मेक इन इंडिया का शेर खड़ा किया था और फिर मुनाफाखोर उद्योगपतियों के सामने उसे भीगी बिल्ली बना दिया। स्टैंडअप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल डेवलपमेंट, ये सब मेक इन इंडिया के बाद की योजनाएं थीं।

 जाहिर है जब पहली योजना ही कारगर साबित नहीं हुई, तो बाकियों का हाल बिगड़ना ही था। मेक इन इंडिया में जो शुरुआती लक्ष्य बताए गए थे, उनमें विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 12-14 फीसदी सालाना तक बढ़ाना,  2022 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण की हिस्सेदारी 16 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करना और  2022 तक विनिर्माण के क्षेत्र में 10 करोड़ रोजगार का सृजन करना आदि शामिल थे।  कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पर असर तो अब नजर आ रहा है, लेकिन उससे पहले भी देश में मेक इन इंडिया के कारण न भारत में मैन्युफैक्चरिंग में कोई वृद्धि हुई और न रोजगार बढ़े।

बल्कि 2019 की तीसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार 0.6 फीसदी तक आ गिरी। मोदीजी ने घोषणाओं पर अंग्रेजी शब्दों की परत चढ़ाकर उसे सुनहरा बनाने की कोशिश तो की, लेकिन मुसीबत का धूप-पानी लगते ही परत उतर गई और हकीकत सामने आ गई। अब लोकल के लिए वोकल भी ऐसा ही एक और अंग्रेजियत भरा जुमला है, उसकी जगह स्वदेशी या स्थानीय शब्द के इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं था। लेकिन सरकार का मकसद तो जनता को भरमाना है, सो वह इन चमकदार जुमलों से उसे बहलाने में जुटी है, अब समझना जनता को है कि वह कब तक इस जुमलेबाजी के फेर में पड़कर काठ की हांडी को बार-बार चढ़ने देगी।

(देशबन्धु)

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