गाडी बुला रही है, सिटी बजा रही है !

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-नारायण बारेठ।।

ये दुर्दिन है / वक्त की मार है। उसे लगा इस संकट में रेलगाड़ी जरूर हमसफ़र बनेगी। उसे मालूम है। उसे फख्र है अपने मुल्क की रेल पर। क्योंकि यह आकार में दुनिया में सबसे बड़ी रेलवे में शुमार है। उसे मालूम है आज़ादी के वक्त 53 हजार किमी नेटवर्क था। आज 121407 किमी लम्बी रेल ट्रैक और 95 हजार किमी लम्बा नेटवर्क है। उसे मालूम है हर दिन 20 हजार गाड़िया ऑस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर लोगो को अपने मकाम तक पहुंचती है। यानि करोड़ से अधिक। उसे मालूम है 55 हजार अधिक कोच है। सात हजार ज्यादा स्टेशन है।

उसे मालूम है वो रेल जो ऊँचे मकामो से गुजरती है ,नदी नालो और पहाड़ो को लांघती है ,जो निर्जन मरुस्थल में रास्ता बनाती है, इस तकलीफ में मुश्किलें आसान कर देगी। जब रेल ने उसकी अंतर्वेदना नहीं सुनी ,उसने बसों को आवाज दी। उसे मालूम है भारत में 19 लाख बसे है। इनमे तीन लाख सरकारी रोडवेज है। उसने सड़क पर खड़े होकर आसमां को निहारा और अपने बच्चो के साथ उड़ते जहाज देखे। उसे लगा विमान तो कभी उसके ख्वाब में नहीं आये। मगर रेल और बसे जरूर हमदर्द होगी। उसे लगा फूल खिले है गुलशन गुलशन और वो गुनगुनाने लगा मोटर चली पम्म पम्म / लेकिन घड़ी,घंटे ,प्रहर और दिन बीते। उसे सबने तन्हा छोड़ दिया।
उसने रुआंसे होकर उस रेल पटरी को देखा और अतीत की गलियों में लौट गया। उसे याद आया पटरिया बिछने और उसकी मरम्मत में कैसे उसका पसीना बहा था। सड़क ,इमारतों ,पुल बँधो और परियोजनाओं की तस्वीर उसके जेहन में उतरती चली गई। इन सब में उसके हाथ का हुनर लगा था। लेकिन आज वो सड़क पर तन्हा खड़ा है। वो फूल से कोमल बच्चो को लेकर पैदल चल पड़ा। कभी किसी दरख्त ने पनाह दी ,कभी खुले में रात गुजारी। सड़क राजमार्गो पर कही कुपोषित पत्नी के दामन से लिपटा बचपन है तो कही थके मांदे मजदूर रफ्ता रफ्ता चल रहे है। जिंदगी भी चल रही है ,राजनीति भी। टूटी चपले ,फ़टे जूते बिलखता बचपन ,रुआंसी जिन्दगिया ,बेबस चेहरों पर रुदन की लकीरे। सब साथ साथ चल रहे है। न कोई जात बिरादरी का भेद न कोई मजहब की दीवारे। फिजा में गूंज रहा है साथी हाथ बढ़ाना ,एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना।
गाँधी ने इस रेल के जरिये भारत की आज़ादी का अलख जगाया था। वे अक्सर आम आदमी के साथ रेल के तीसरे दर्जे में सफर करते थे /जब वे कलकत्ता से गोखले के निवास से रेल स्टेशन जाने लगे ,गोखले साथ हो लिए। गाँधी ने मना किया। गोखले बोले ‘ बापू मुझे तुम्हारी चिंता है। आप अगर फर्स्ट क्लास में सफर करते तो स्टेशन नहीं आता। मैं देखना चाहता हूँ तुम्हे जगह कैसे मिलेगी। उस वकत कहा जाता था ‘ गाँधी के लिए रेल का डिब्बा ही घर है ,डिब्बा ही आश्रम है। ठीक वैसे ही जैसे उस वक्त बड़ोदा राजपरिवार के परचम पर लिखा रहता था ‘ अश्व की पीठ ही हमारा राज सिंहासन है ,घोड़े की काठी है हमारा आवास है -The saddle is our home, the saddle is our throne ! तीसरे दर्जे के मुसाफिर सड़को पर भटक रहे है। लेकिन अब ऐसे रहनुमा कहा है ?
जब इंसान जिल्ल्त से गुजरता है और तोहिंन होती है ,उसके भीतर एक नए इंसान का जन्म होता है। यह पहले वाले इंसान से अधिक मजबूत होता है। अगर सवासो साल पहले दक्षिण अफ्रीका में उस यात्री को अपमानित कर रेल से नीचे नहीं उतारा होता ,वो महज एक वकील होकर रह जाता। उस घटना ने मोहन दास को सबरमति का संत बना दिया। पर वो और दौर था ,आज वक्त कुछ और है।
वो राह गुजर है। उसने कभी कुछ मांगा नहीं। उसने हर बार कहा तुमको हमारी उम्र लग जाए। पर क्या सियासत भी पलट कर कुछ कहेगी ?

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