देश प्रयोगशाला नही है पागलपन की..

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मोदी जी ! रहम करके अब तो बन्द करो बेवकूफियां..

-महेश झालानी।।

अब यह पूरी तरह प्रमाणित हो चुका है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार कोरोना से निपटने में पूरी तरह असफल रहे है । जिस तरह नोटबन्दी के मामले में मोदी को मुँह की खानी पड़ी, वही हाल कोरोना के वक्त हुआ है । आखिरकार हालत को राज्यों के हवाले छोड़कर मोदी ने मुक्ति पा ली है ।

ध्यान होगा आपको मोदी का राष्ट्र के नाम पहला संबोधन जिसमे उन्होंने लोगो से पुरजोर अपील की थी कि कोई भी व्यक्ति जो जहाँ है, वही रहे । फिर लॉक डाउन के चलते ट्रेन, बस और हवाई जहाज क्यो चलाए गए ? लोगों को आवागमन एक राज्यो से दूसरे राज्यो में क्यो हुआ ?

जब यही सबकुछ करना था तो यह कार्य लॉक डाउन लागू करने से पूर्व क्यो नही किया गया ? श्रमिको, छात्रों, नौकरीपेशा लोगों को मकानों के अंदर कैदी की भांति कैद रखने के मोदी अपराधी है जिसकी समय आने पर जनता सजा अवश्य देगी । डेढ़ महीने तक करोड़ो लोग मरीजों की मानिंद नारकीय जीवन व्यतीत करते रहे । ऊपर से तुर्रा यह कि बजाओ थाली और ताली । इसे मूर्खता की पराकाष्ठा नही कहेंगे ?

केंद्र सरकार की बेवकूफी, नासमझी और अविवेकपूर्ण निर्णय की वजह से देश की सारी अर्थ व्यवस्था चौपट हो चुकी है । रोज कुआ खोदकर पानी पीने वालों के पास आज ना कुआ और न ही पीने को पानी । चंद लोगों के आंसू पोछने से लोगो की तकलीफ दूर नही होने वाली है । उधोग धंधे, कारोबार, उत्पादन, विकास की रफ्तार सब कुछ थम चुकी है ।

आज मूर्खो की मूर्खता के कारण देश दस साल पीछे चला गया है । मूर्खता इसी तरह जारी रही तो जीडीपी माइनस में आ जाये तो कोई ताज्जुब नही है । बन्दर के हाथ मे उस्तरा आने से यही हाल होता है । अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मोदी को ईगो का लबादा फेंकते हुए मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह तथा रघुराम राजन जैसे लोगों से सलाह लेनी चाहिए । इससे कम से कम थोड़ी इज्जत तो बच जाएगी ।

बेवकूफी की बानगी तो देखिए । जो व्यक्ति या दुकानदार, व्यवसायी खुद अपनी रोटी का जुगाड़ करने में असहाय है, उसको हिदायत दी जाती है कि आप मजदूरों, नौकरों की पगार, भत्ते आदि का भुगतान करो । आदेश तो ऐसे दे रहे है जैसे मैय्या निर्मला सीतारमण धन गाड़ कर गई है । मोदी जी-आपके निर्देश और अपील को लोगों ने जुमला समझकर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल कर बाहर फेंक दिया ।

मोदीजी की बेवकूफी और बचकानी बयानबाजी का एक और नमूना 12 मई को राष्ट्र के नाम संदेश के दौरान देखने को मिला । पुरजोर शब्दो मे लटके-झटके के साथ मोदी ने आत्मनिर्भर और स्वदेशी की बात कही । मान्यवर ! आज हम जंगल राज में विचरित नही कर रहे है । एक तरफ वसुदेव कुटुंब….की बात की जाती है तो दूसरे तरह पूरी तरह आत्मनिर्भर होने का नया और ताजा जुमला परोसा जाता है ।

मान्यवर मोदी जी । आपकी तरह सभी देशों ने आत्मनिर्भर होने और स्वदेशी अपनाने का बीड़ा उठा लिया तो भारत से निर्यातित माल को अमित शाह खरीदेगा या अम्मा निर्मला ? दवा, मोबाइल, मेडिकल इक्विपमेंट, बुलेट ट्रेन और उसकी तकनीक क्या नागपुर के संघ कार्यालय से आयात होगी ?

बहुत बेवकूफी हो चुकी है । कृपया अब देश को पागलपन की प्रयोगशाला मत बनाओ । जीएसटी का घंटा या कोरोना के नाम पर ताली पीटने से कुछ नही होने वाला है । जिस तरह नोटबन्दी के नाम पर देश को तबाह कर दिया, अब तो मेहरबानी करो । क्या आतंकवाद समाप्त होगया ? नकली नोट छपने बन्द हो गये ? देश की जनता आपसे हाथ जोड़कर रहम की भीख मांग रही है । अब तमाशा बन्द होना चाहिए ।

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