हेडलाइन मैनेजमेंट की एक बड़ी कोशिश और उसका प्रभाव..

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-संजय कुमार सिंह।।
वैसे तो बीस लाख करोड़ का सच सब जानते हैं। जब विदेश में रखा काला धन नहीं आया। आना तो छोड़िए, लाने के लिए क्या प्रयास हुए इसे बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई। 1,25,000 करोड़ का बिहार पैकेज और 1,70,000 करोड़ का हाल का पैकेट सब जानते हैं फिर भी इस खबर ने आज के अखबारों से कोरोना की खबर की गंभीरता को लगभग खत्म कर दिया है। आइए देखे अखबारों में इस खबर का शीर्षक क्या है। पहले हिन्दी अखबार फिर अंग्रेजी वाले –

  1. दैनिक भास्कर
    प्रधानमंत्री मोदी का एलान; कोरोना संकट से उबरने का एक ही मार्ग-आत्मनिर्भरता। आत्म निर्भर भारत अभियान 20 लाख करोड़ का पैकेज। और इसके साथ ही अखबार ने बताया है, आज से स्वास्थ्य मंत्रालय की ब्रीफिंग नहीं, वित्त मंत्री घोषणाएं करेंगी। कोरोना की स्थिति बताने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय और अन्य मंत्रालयो की रूटीन प्रेस ब्रीफिंग रविवार तक स्थगित कर दी गई है। इसकी जगह हेल्थ बुलेटिन जारी होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बुधवार से रविवार तक वित्तीय पैकेज का सिलसिलेवार ब्योरा देंगी। वैसे तो प्रेस कांफ्रेंस करना सरकार का काम था देखना-दिखाना और उसपर लिखना अखबारों-मीडिया का काम था। लेकिन सरकार को अपने मीडिया की कमजोर हालत पता है। इसलिए यह राहत।
  2. नवोदय टाइम्स
    कोरोना संकट के दौरान पीएम मोदी का पांचवां सबसे बड़ा …. 20 लाख करोड़ से आत्म निर्भर भारत। लैंड, लेबर, लिक्विडिटी और लॉस आधारित आर्थिक पैकेज तैयार, घोषणा आज। भारत के लिए संकेत, संदेश और अवसर लेकर आई है यह आपदा
  3. राजस्थान पत्रिका
    आत्मनिर्भर भारत के लिए पैकेज
    वैसे तो अखबार ने इस खबर को सात कॉलम में लीड बनाया है। पर इससे ऊपर सात कॉलम में ही खबर है, अकेले अप्रैल में देश भर के 6 करोड़ नौजवानों की नौकरी छिनी। जाहिर है, इस शीर्षक के साथ आत्म निर्भर बनने की प्रधानमंत्री की अपील और लोकल से ग्लोबल जैसे दावे मुंगेरी लाल के हसीन सपनों से कम हसीन नहीं है। पर ऐसी खबरें अब कभी-कभी कहीं कहीं ही होती हैं।
  4. दैनिक जागरण
    भारत निर्माण के लिए 20 लाख करोड़ (यहां निर्माण गौरतलब है)
  5. अमर उजाला
    देश को पांचवें संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मंगल मंत्र, आत्म निर्भर भारत के लिए 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज …. नए रंग रूप में लॉक डाउन। अखबार के तमाम उपशीर्षक में एक दिलचस्प है, स्वालंबन की इमारत के पांच स्तंभ। मुझे लोकतंत्र के चारों स्तंभों की बहुत याद आई। लोकतंत्र भूलकर स्वावलंबी बनेंगे पैदल चलते मजदूरों की तरह?
  6. नवभारत टाइम्स
    लगता है शीर्षक की हवा ही निकाल दी है। चार कॉलम की सामान्य सी खबर है और शीर्षक राजमार्ग पर पैदल चलते मजदूर जैसा, आ रहा है स्पेशल पैकेज में लिपटा लॉकडाउन-4। उपशीर्षक है, 20 लाख करोड़ रुपए के विशेष आर्थिक पैकेज का ऐलान। अगर मेरी हैसियत 20 लाख करोड़ की होती तो मैं इस शीर्षक के लिए अपनी मानहानि का दावा कर देता। पर मैं अपनी हैसियत जानता हूं। आज के अखबारों में 20 लाख करोड़ को जो इज्जत मिली है उसके मद्देनजर नवभारत टाइम्स सबसे अलग है।
  7. हिन्दुस्तान
    आत्म निर्भरता के लिए अपूर्व पैकेज
    बेशक, इसमें अपूर्व का मतलब समझना टेढ़ी खीर है। हो सकता है, आप से कहा जा रहा हो कि इसे 1,25,000 और 1,70,000 करोड़ के आम पैकेज से अलग करके देखिए या यह भी कि यह कांग्रेस की सरकार में जो पैकेज रोज दिए जाते थे वैसा नहीं है कोरोना से लड़ने के लिए अपूर्व है। या यह भी कि इस बार सबको 15 लाख नहीं मिलेंगे, सरकार ही देगी और वही खर्च करेगी।
  8. इंडियन एक्सप्रेस
    डोजेज : ₹20 लाख करोड़। खुराक की गंभीरता होती है। इसपर कोई टीका टिप्पणी नहीं।
  9. हिन्दुस्तान टाइम्स
    आत्म निर्भर भारत के लिए ₹20 लाख करोड़ का बूस्ट (बूस्टर खुराक की तरह)
  10. टाइम्स ऑफ इंडिया
    पीएम रेजेज स्टिमुलस साइज टू 10% ऑफ जीडीपी
    यह कुछ गंभीर किस्म का मामला है। इसे रहने देता हूं। आप इसे स्टिमुलस (प्रोत्साहन) या बूस्टर ही मानिए। पर इसे पैदल चल रहे मजदूरों के लिए मत समझ लीजिएगा।
  11. द हिन्दू
    पीएम अनाउंसेज ₹20 लाख करोड़ इकनोमिक स्टिमुलस पैकेज। उपशीर्षक में कहा गया है, यह आत्म निर्भरता पर केंद्रित होगा।
    12 द टेलीग्राफ
    Rs. 20000000000000
    इसके नीचे लिखा है, जब तक शून्य गिनना पूरा करेंगे, उम्मीद है निर्मला (सीतारमण, वित्तमंत्री) विवरण देंगी। इसके साथ अखबार ने पूछा है, प्रधानमंत्री जी, इन खाली बर्तनों में आप कितने पैसे डाल रहे हैं? इस बारे में मैं सुबह ही अलग से लिख चुका हूं।

कुल मिलाकर, अखबारों ने आलोचना, व्यंग और प्रश्न – तीनों को लगभग पूरी तरह छोड़ दिया है। प्रश्न स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कांफ्रेंस में नहीं होते थे तो बाकी कहीं क्या उम्मीद करें। अब वह प्रेस कांफ्रेंस कुछ दिन नहीं होगी। अब पैकेज की खबर सुनिए, देखिए, पढ़िए। हेड लाइन मैनेजमेंट की दिशा में यह बड़ी कोशिश है। कामयाबी पर शक करने का कोई कारण नहीं है। सब कुछ फिकस्ड जैसा लगता है। इस तरह की खबरों का मकसद बहुत सारे प्रश्नों को दबा देना होता है। आज ही यह खबर तो है कि ट्रेन चली पर लोग स्टेशन कैसे पहुंचे या गंतव्य पर उतरकर घर कैसे जाएंगे यह ना बताया गया है ना किसी ने पूछ कर प्रमुखता से (मेरा मतलब ट्रेन चली जैसी अच्छी खबर के साथ) बताया है। पहले यह सब सामान्य होता था। इससे सुधार भी होते थे। पर अब वह जमाना गया। इस खबर के चक्कर में आज किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर कोरोना की खबर का राउंड अप नहीं है। रोज वित्त मंत्री की प्रेस कांफ्रेंस होने और स्वास्थ्य मंत्रालय की नहीं होने के मद्देनजर संभव है अब यह अंदर के पन्ने पर ही चला जाए। वैसे भी अब आंकड़े ऐसे हो गए हैं कि पहले पन्ने शायद उनका भार न उठा पाएं। देखा जाए।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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