Home देश मोदीजी की लोकप्रियता..

मोदीजी की लोकप्रियता..

देश में चल रहे लॉकडाउन के तीसरे चरण के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग कर बैठक की और 17 मई के बाद कितनी छूट दी जाए और कितनी सख्ती बरती जाए, इस पर उनकी राय मांगी। बताया जा रहा है कि पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना, बंगाल और बिहार ये पांच राज्य लॉकडाउन बढ़ाने के पक्ष में हैं, जबकि कोरोना वायरस से दूसरा सबसे ज्यादा पीड़ित राज्य गुजरात लॉकडाउन को 17 मई के बाद आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि कंटेनमेंट जोन को छोड़कर पूरी दिल्ली में आर्थिक गतिविधियां खोल दी जानी चाहिए।  इन विभिन्न रायों से केंद्र सरकार किस नतीजे पर पहुंचती है, यह तो मोदीजी का आगामी फैसला ही बताएगा। फिलहाल लॉकडाउन के बीच यात्री रेल सेवा शुरु हो गई है। लोग अपने घर लौटने के लिए कितने बेचैन हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आईआरसीटीसी की वेबसाइट कुछ देर के लिए ठप्प ही हो गई, क्योंकि एक साथ बहुत सारे लोगों ने टिकट बुकिंग करनी चाही। जब वेबसाइट दोबारा खुली तो हावड़ा-दिल्ली रूट की टिकटें 15-20 मिनट में ही पूरी तरह बुक हो गईं। खबरें हैं कि कई यात्री ट्रेन शुरु से 8-10 घंटे पहले ही स्टेशन पहुंच गए, ताकि किसी तरह की गड़बड़ न हो। 

इधर श्रमिक ट्रेनों से भी कामगारों के लौटने का सिलसिला जारी है और सड़क के सहारे लौटते मजदूरों की दर्दभरी कहानियां भी बढ़ती जा रही हैं।  मंगलवार को फिर खबर आई कि चार मजदूरों की सड़क दुर्घटना में अलग-अलग जगहों पर मौत हो गई। बंगलुरू से तस्वीर आई है जिसमें अपने राज्य वापस भेजे जाने की मांग कर रहे प्रवासी मजदूरों के साथ एक एएसआई ने बदसलूकी की। बेंगलुरू के केजी हल्ली पुलिस थाने पर एकत्रित हुए इन प्रवासी मजदूरों को एएसआई ने पहले समझाने की कोशिश की, लेकिन फिर उन्होंने थप्पड़ जड़े और दो लोगों को लात भी मारी। फिलहाल एएसआई को सस्पेंड कर दिया गया है।

पुलिस और सरकार की निर्ममता की ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें अभी देखनी बाकी हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इसके बाद भी सरकार की संवेदनशीलता में कोई हलचल नहीं दिखाई देती, मानो वह भी अर्थव्यवस्था की तरह ठप्प पड़ गई है। सरकार इतने घने संकट में भी लोगों के दर्द की थाह लेने की जगह अपनी वाहवाही में लगी हुई है। अभी कुछ दिन पहले एक टीवी चैनल ने सर्वे किया, जिसमें बताया गया कि अप्रैल में 71 प्रतिशत लोग कोविड-19 से लड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के फैसलों से खुश हैं। सर्वे कहता है कि मई में उनकी लोकप्रियता 79 प्रतिशत बढ़ गई है।

ध्यान रहे कि मई अभी आधा भी नहीं बीता है और मोदीजी की लोकप्रियता में इजाफा नजर आ रहा है। यह सर्वे किस आधार पर हुआ, इसमें असल में किन लोगों से राय ली गई, इसका खुलासा तो शायद होगा ही नहीं, क्योंकि इस तरह के काम छवि निर्माण के लिए कराए जाते हैं। भाजपा इसमें काफी माहिर है। वैसे जब देश में लाखों लोगों की नौकरी चली गई हो, करोड़ों लोगों के सामने भविष्य का संकट मंडरा रहा हो, तब बालकनी में ताली बजाते, दिए जलाते लोग ही इतनी फुर्सत में हो सकते हैं कि वे यह बताएं कि मोदीजी के फैसले कितने अच्छे हैं। जिन के पास रोजगार नहीं, खाने को रोटी नहीं और रहने को घर नहीं, असल में वे ही सत्ता के अदूरदर्शी फैसलों का दर्द भुगत रहे हैं। भाजपा इस बात को जानती है, इसलिए लोगों का ध्यान भटकाने के लिए सर्वे को सोशल मीडिया पर प्रसारित कर यह बता रही है कि मोदीजी कितने महान प्रधानमंत्री हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा तो ऐसे कठिन वक्त में भी निम्न स्तर की राजनीति से बाज नहीं आ रहे हैं। हाल ही में अपने एक ट्वीट में उन्होंने काल्पनिक घोटालों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस के वक्त कोरोना आया होता तो इतने-इतने हजार करोड़ के घोटाले हो जाते। संबित पात्रा एक डाक्टर हैं और वे बेहतर समझ सकते हैं कि कोरोना का किसी भी वक्त आना कितना बुरा है। इस वक्त कायदे से उन्हें अपनी चिकित्सीय सेवाएं देशहित में, जनहित में देनी चाहिए। और अगर वे घर पर सुरक्षित रहने के लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर समय बिता रहे हैं तो कम से कम उन लोगों के लिए दुख जाहिर करें जो सरकार के फैसलों के कारण सड़क पर दिन बिताने मजबूर हो गए हैं।

जो अपने घर पहुंचने के लिए सारे जोखिम उठा रहे हैं। उन्हें यह हकीकत स्वीकार करनी होगी कि कोरोना भाजपा के शासनकाल में आया और भाजपा सरकार की लापरवाही के कारण इसे समय रहते रोका नहीं गया, जिसका नतीजा ये है कि आज 70 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं।  सरकार लॉकडाउन के भरोसे इसका मुकाबला कर रही है, जिसमें अर्थव्यवस्था बदहाल हो गई है। भाजपा के लोग अगर इस वक्त मोदीजी की वाहवाही वाली चापलूसी छोड़ उन्हें सही सलाह दें तो सचमुच उनकी लोकप्रियता में इजाफा होगा।

(देशबन्धु)

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