राष्ट्रवाद के जमाने में सेना का विमान और तानाशाही

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-संजय कुमार सिंह।।
आपको याद होगा कि कैंसर से हार गए शौर्य चक्र विजेता कर्नल नवजोत सिंह बल को बंगलूर में अंतिम विदाई देने के लिए उनके बूढ़े माता-पिता को कार से दिल्ली से बंगलौर की यात्रा करनी पड़ी। बेशक इसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। नवजोत का निधन 9 अप्रैल 20 को हुआ था। अंतिम संस्कार की तस्वीरें ट्वीट करते हुए @manaman_chhinna ने लिखा था, इसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए। एनडीटीवी डॉट कॉम ने लिखा था, सेना के दिग्गजों ने इसपर नाराजगी जताई है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने नवजोत के भाई नवतेज के ट्वीट के जवाब में लिखा था, …. दुखद, भारत सरकार ने सहायता नहीं की। नियम कभी पत्थर पर नहीं लिखे जाते हैं। विशेष परिस्थितियों में उन्हें बदला या संशोधित किया जाता है।
अब खबर है कि मुंबई की एक मॉडल को इस लॉकडाउन में सेना के विमान और फिर गाड़ी से देहरादून पहुंचाया गया है। इस मामले में पत्रकार नवनीत चतुर्वेदी की सूचना इस तरह है, लॉक डाउन से पहले मॉडल मुम्बई से हिमाचल प्रदेश गई थी अपने बॉय फ्रेंड के पास जो आर्मी में मेजर है। हिमाचल राजभवन की अनुशंसा पर मेजर के प्रार्थना पत्र पर कि उसको हिमाचल से अर्जेन्ट देहरादून जाना है, राजभवन ने पास जारी किया था, जहां इस मॉडल ने खुद को मेजर की पत्नी बताया। देहरादून आने पर इसको क़वारन्टीन में रहना था, स्थानीय थाने को बताना था जो इसने नही किया। अपने आस पड़ोस में गप्प उड़ाई कि मुझे भगत सिंह कोश्यारी राज्यपाल ने हेलीकाप्टर से यहां तक भिजवाया। इस सूचना पर नवनीत जी ने महाराष्ट्र राज्यपाल कार्यालय से आरटीआई के जरिए कुछ सूचनाएं मांगी थीं।


पर्वतजन डॉट कॉम ने भी इस संबंध में खबर दी थी कि पहले जयंती ने मुंबई से आने की बात की और फिर कहा कि वह हिमाचल से आई है। बाद में राज खुला कि ये हिमाचल राजभवन के पास पर आर्मी मेजर की पत्नी बन कर देहरादून पहुंची है। भगत सिंह कोश्यारी भी उत्तराखण्ड से हैं अतः इसने अपना रौब आस-पास में झाड़ने हेतु यह कहानी उड़ाई। इसके बाद नवनीत जी ने महाराष्ट्र राजभवन को स्पष्टीकरण दे दिया है, और उस आरटीआई आवेदन को वापस लेने की रिक्वेस्ट दी। पर मुद्दा वही है, सेना के रिटायर अधिकारी को सैनिक बेटे के निधन पर जाने के लिए विमान नहीं मिला पर मेजर की ‘पत्नी’ को मिल गया। मेजर की पत्नी के लिए पति को छोड़कर आना इतना महत्वपूर्ण क्य़ों है? यह कैसा राष्ट्रवाद है?
इस मनमानी और सेना के विमान के दुरुपयोग पर एक पुराना किस्सा याद आता है। इसका जिक्र पूर्व विदेश सचिव जेएन दीक्षित ने अपनी पुस्तक, “एनाटोमी ऑफ फ्लॉड इनहेरीटेंस“ (कोणार्क – 1995) में किया था। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद मैंने किया था जो हिन्द पाक रिश्ते 1970-1994 के नाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें जेएन दीक्षित ने एक घटना का वर्णन किया था जब पाकिस्तानी तानाशाह जियाउल हक ने भारतीय पत्रकारों को घूमने के लिए सेना का विमान दे दिया। इसपर उन्होंने कहा था कि भारतीय पत्रकार यह नहीं समझें कि पाकिस्तान में यह काम कितनी आसानी से हो गया और भारत में तो हो ही नहीं सकता है। श्री दीक्षित ने कहा था कि तानाशाही और लोकतंत्र का यही अंतर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते रहे हैं कि 70 साल में कुछ नहीं हुआ पर भारत पाकिस्तान संबंध ठीक करने के लिए जो कोशिशें हुईं उसका बड़ा हिस्सा इस किताब में भी है। पर वह अलग मुद्दा है। रेखांकित करने वाली बात है कि भारत में मेजर की पत्नी इतनी शक्तिशाली हो गई जितने कई पत्रकार नहीं होते थे।
पुस्तक का संबंधित अंश इस प्रकार है : “…. यह मुलाकात प्रतिनिधिमंडल के बहुत वरिष्ठ सदस्यों के लिए ही थी। यहां तक कि एक्सटर्नल पब्लिसिटी के संयुक्त सचिव, मैं खुद और पाकिस्तान में हमारे मिशन के उप प्रमुख एसके लांबा भी कमरे में नहीं गए। …. हमलोग (पीवी नरसिंह) राव के साथ गए ढेरों भारतीय पत्रकारों के साथ बैठे हुए थे। उनमें से कुछ लोग कह रहे थे कि लाहौर और कराची के औपचारिक समारोहों में शामिल होने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। बल्कि पाकिस्तान सरकार आवश्यक व्यवस्था कर दे तो वे पाकिस्तान के कुछ दूसरे हिस्से देखना चाहेंगे। उन लोगों ने यह बात मेरे सहयोगी से कही। उन्होंने कहा कि इस बारे में। पाकिस्तानी अधिकारियों से बात करनी पड़ेगी और इसमें समय लग सकता है। इस बीच राष्ट्रपति जिया के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल आरिफ बैठक वाले कमरे से थोड़ी देर के लिए बाहर आए। हमारे यहां के पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और उनसे पूछा कि वे लोग पाकिस्तान घूम सकते थे कि नहीं। जनरल आरिफ एक सौम्य व्यक्ति हैं, उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक राजी हो जाएं तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
इसके बाद लगभग आधे घंटे में राव और जिया की बैठक खत्म हो गई। जिया को उनके शिष्टाचार के लिए जाना जाता था। वे राव को विदा करने के लिए बाहरी दरवाजे तक आए। भारतीय पत्रकारों ने उन्हें वहां घेर लिया और राव से हुई बातचीत के बारे में सवाल पूछने के बाद उन लोगों ने पाकिस्तान के दूसरे हिस्से की यात्रा का आग्रह किया। जिया अपने एडीसी में से एक और जनरल आरिफ की ओर मुड़े तथा कहा, ‘हम लोगों को अपने भारतीय मित्रों को जितना ज्यादा संभव हो पाकिस्तान देखने की इजाजत देनी चाहिए। कृपया इन्हें एक विशेष विमान दे दें ताकि वे पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की यात्रा कर सके और राव के साथ वापस दिल्ली जाने के लिए समय पर विशेष उड़ान पकड़ सकें।” जिया अपने कमरे में वापस चले गए तो भारतीय पत्रकार मेरी ओर मुखातिब हो लिए या कहना चाहिए कि मुझे उकसा दिया। उन लोगों ने कहा, ‘जनसंपर्क ऐसे बनाकर रखा जाता है। अगर भारत में, पाकिस्तानी या अन्य पत्रकारों ने ऐसा आग्रह किया होता तो जिया ने जो सकारात्मक जवाब दिया उसकी बजाय भारतीय राजनैतिक नेतृत्व या नौकरशाही ने ढेरों प्रक्रियागत मुश्किलें बताई होती। बेशक, पत्रकारों को विशेष विमान देने का कोई सवाल नहीं था। मैंने अपने भारतीय पत्रकार मित्रों से कहा कि लोकतंत्र के लिए उन्हें यही कीमत चुकानी पड़ती है।“

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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