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IAS को भी अधिकार है अभिव्यक्ति का..

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भाजपा सरकार द्वारा IAS अधिकारी मोहसिन को एक पोस्ट के लिए नोटिस थमा देना कितना जायज? कितना नाजायज?

-श्याम मीरा सिंह।।

कर्नाटक भाजपा सरकार ने IAS अधिकारी मोहम्मद मोहसिन को नोटिस थमाकर आगे की कार्यवाई की बात कही है। मोहसिन ने बस एक ट्वीट किया था कि “अकेले दिल्ली में 300 से अधिक तबलीगी हीरोज ने देश के लिए अपना प्लाज्मा डोनेट किया है। लेकिन गोदी मीडिया कहाँ हैं? मीडिया इन हीरोज के द्वारा किए जा रहे मानवता के काम को नहीं दिखाएगा।”

इतना ट्वीट कर देने भर पर भाजपा सरकार ने इस आईएएस अधिकारी की जुबान कुचलने के लिए नोटिस थमा दिया है। यहां तकनीकी तौर पर आपको लग रहा होगा कि आईएएस अधिकरियों के भी सिविल सर्विस कोड होते होंगे, नियम-कानून होते होंगे। तो मैं आपको बता दूं आर्टिकल 33 के अंतर्गत आने वाली कुछ सर्विसेज जैसे आर्मी, इंटेलिजेंस एजेंसीज आदि को छोड़कर राज्य किसी भी नागरिक के फ्रीडम ऑफ स्पीच पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता। सिविल सर्विस कोड भी किसी नागरिक कर्मचारी को अपना जायज मत रखने से नहीं रोक सकते

साल 2020 में ही त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक जजमेंट पास करते हुए कहा था कि सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों को भी अपने राजनीतिक व्यूज रखने का पूरा हक है। इस मसले पर केरल हाईकोर्ट ने भी त्रिपुरा हाईकोर्ट की तरह ही अपना मत दिया था।

साल 1962 में भी ये मसला उठा था कि सरकारी कर्मचारियों को अपनी बात रखने का हक है कि नहीं, वह केस था “कमलेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य।” तब भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा था कि “राज्य के किसी भी नागरिक का फ्रीडम ऑफ स्पीच केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता क्योंकि वह सरकारी कर्मचारी है। सब को अपनी बात रखने का बराबर हक है, चाहे वह सरकारी कर्मचारी ही क्यों न हो”

सिविल सर्विस कोड और फ्रीडम ऑफ स्पीच के बीच एक सामंजस्य है। जो अभी तक बहुत स्पष्ट नहीं हुआ है। यह न्यायपालिका के आदेशों, निर्णयों से कुछ कुछ साफ हुआ है। जिसमें स्पष्टता की अभी भी कमीं हैं। लेकिन इसपर डिटेल्ड स्टडी करने पर आप पाएंगे कि भारतीय संविधान कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म का अधिकार प्रत्येक नागरिक को देता है चाहे वह सरकारी कर्मचारी है या सामान्य नागरिक या पत्रकार। सरकारी कर्मचारी भी इस देश में बराबर दर्जे का नागरिक है, उसकी भी इच्छाएं हैं, उसके भी सवाल हैं, उसका भी मत है उसे भी अपनी बात रखने का पूरा हक है। आप इस ट्वीट की व्यक्तिगत रूप से आलोचना कर सकते हैं। ये भी सुझा सकते हैं कि मोहसिन को इससे बचना चाहिए था। लेकिन इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं था, कम से कम ऐसा कंटेंट तो बिल्कुल भी नहीं था कि सरकार इसपर कार्यवाई करे।

यह वही मोहसिन हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हेलीकॉप्टर की जांच करवाई थी। तब वह निर्वाचन आयोग की तरफ से नियुक्त पोल अधिकारी थे। ये पिछले साल की ही बात है जब अप्रैल महीने में प्रधानमंत्री उड़ीसा दौरे पर थे। तब भी मोहसिन को सस्पेंड कर दिया गया था। आज फिर नोटिस थमा दिया गया है। क्या ये सरकारी अधिकारियों पर दबाव बनाना नहीं है? क्या ये सभी आईएएस अधिकरियों, कर्मचारियों के लिए एक हिडन संकेत है?

यहां इस दृश्य को थोड़ा उलटकर देखिए। सोचिए मोहम्मद मोहसिन की जगह मनमोहन या मोहनसिंह है। मोहनसिंह कुम्भ मेले की तारीफ करते हुए कुछ लिखते, या वह हिन्दू साधु संतों की प्रशंसा करते हुए मीडिया पर कोई प्रश्न करते तो क्या उन्हें भी नोटिस थमा दिया जाता?

हर नागरिक को अपनी बात रखने का बराबर अधिकार है बशर्ते वह देश की एखता अखंडता, सम्प्रुभता आदि ऐसी चीजों को खंडित न करता हो जिसका उल्लेख संविधान में है। यदि मोहनसिंह को अपनी बात रखने का हक है तो मोहसिन को भी होना चाहिए।

दो एक दिन पहले अर्नब गोस्वामी की दंगाई भाषा पर की गई पूछताछ को भी फ्रीडम ऑफ स्पीच का उल्लंघन मानने वाले बरसाती उदारवादी, मोहसिन के मामले में भी उदारता दिखाएंगे? क्या अब कोई टीवी शो चलाएगा? क्या अब कोई ट्वीट करेगा?

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