बेहतर की उम्मीद में मजदूरों को लाल सलाम..

बेहतर की उम्मीद में मजदूरों को लाल सलाम..

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-विष्णु नागर।।

वैसे तो आर्थिक उदारीकरण के बाद से ही मजदूर दिवस का अर्थ खत्म कर दिया गया है मगर आज का मई दिवस सबसे भयानक समय में आया है।भविष्य में यह संभावनाएं लेकर भी शायद आए मगर अभी तो मजदूरों पर भयानकतम बीत रही है।लाकडाउन के बाद शायद लाखों मजदूर शहरों से गाँवों की तरफ चले गए।कुछ बचे, कुछ रास्ते में भूख -प्यास, धूप-थकान से मर गए।गाँव पहुंच कर मरने की घटनाएँ भी हैं।गोवा, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि से आज भी न जाने कितने घर जाने के लिए तड़प रहे हैं।इधर भूख है,उधर सरकारों की उन्हें मदद पहुँचाने में नाकामयाबी है।इसे नाकामयाबी कहना भी गलत है,यह मजदूरों के प्रति दशकों से पनप रही उदासीनता का ही प्रतिबिंब है।उधर कुछ स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों ने उनकी उदारतापूर्वक मदद न की हौती तो भूख का साम्राज्य और व्यापक होता।अभी भी बहुत से करुण दृश्य हैं।दो लोगों का खाना सात लोग खा रहे हैं,जिनमें बच्चे भी हैं। अपने बच्चों को भूखा रखकर कौन माँ बाप खा सकते हैं?लाजिमी तौर पर वे भूखे मरते होंगे।ऐसे भी दृश्य हैं,जब घंटों खाने की लाइन खड़े रहने के बाद माँ को कुछ नहीं मिला और शाम को मिलने की संभावना भी नहीं।खबर ऐसी भी आई है फेसबुक मित्रों के जरिए कि दिल्ली में यमुना पुश्ते के पास तंबुओं में रह रहे मजदूर नदी तैर कर दूसरी तरफ गुरूद्वारे खाना खाने जाते हैं।इसमें एक मजदूर डूब कर मर चुका है।

भूख-प्यास के इस पक्ष के अलावा मेहनतकश से भिखारी बना दिए गए मजदूर भावनात्मक यंत्रणा से भी गुजर रहे हैं।उन्हें किसी भी कीमत पर घर जाना है और अभी भी इसकी कोई साफ सूरत नजर नहीं आती।अभी गोवा में फँसे मजदूरों की भूख और यंत्रणा की कहानी पढ़ी।वे इतने हताश हैं कि कुछ कहने लगे हैं,चलते हैं सड़क पर और मर जाते हैं कोरोना से।कम से कम हमारी गिनती उन लोगों में तो होगी, जो कोरोना से मरे हैं।इन मजदूरों ने हजारों किलोमीटर दूर दो पैसे कमाने के लिए आकर अच्छी तरह देख लिया है कि मुसीबत में उनका कोई नहीं है।न मालिक, न मकान मालिक,न दूकानदार, न सरकार, न शहर और न पूरी तरह समाज ही।कई मालिकों ने तो कचरे की तरह बुहार कर फेंक देने में एक दिन की भी देरी नहीं की।ऐसे निर्मम समाज के लिए गालियाँ, लात घूंसे खाकर क्यों और किसलिए वे खटें ?कई कहने लगे हैं,जो हो,अब नहीं आएँगे।शहरों का आधार खिसक गया है,जिसे किसी ने सम्मान नहीं दिया।व्यवस्था गलतफहमी में रही कि पूँजी से सबकुछ अपनी शर्तों पर खरीदा जा सकता है।नहीं श्रीमन अब शायद और नहीं।कम से कम इन परिस्थितियों, इन शर्तों, इन खतरों,इस निर्ममता के बीच और नहीं।

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