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भाषा का मजहब

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एकता में अनेकता भारत का स्वस्थापित सत्य है। नाना प्रकार के खान-पान, वेशभूषा, कला-संस्कृति, साहित्य, भाषाएं और बोलियां- सब मिलकर देश की ऐसी धज बनाते हैं जो शायद सैकड़ों इन्द्रधनुष मिलकर भी न बना सकें। लेकिन अफसोस कि कुछ विघ्नसंतोषी लोग इस विविधरंगी छटा पर कालिख पोत देना चाहते हैं।

धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कवायद एक अरसे से चल ही रही है। इसके लिए कई तरकीबें आजमाई जा रही हैं, जिनमें से एक भाषा को मजहबी रंग दिया जाना भी है। यह कहा जा रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है, इसलिए उसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से तथाकथित उर्दू के शब्दों की एक सूची सोशल मीडिया पर इस आग्रह के साथ प्रसारित की जा रही है कि बोलचाल में उनका उपयोग न किया जाए। लोगों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है, हमारी राष्ट्रभाषा है, इसलिए उर्दू की जगह हिन्दी शब्दों का ही प्रयोग किया जाए।

मजे की बात है कि इस सूची में केवल 111 शब्द दिए गए हैं। पता नहीं इस संख्या को शुभ मानकर ऐसा किया गया है या सूची तैयार करने वालों को इससे ज़्यादा ज्ञान नहीं था। या  कहीं यह पहली किश्त तो नहीं! बहरहाल इन शब्दों के सामने उनके समानार्थी हिन्दी शब्द दिए गए हैं, जिनमें से कुछ के हिज्जे गलत हैं और कुछ के मायने। उदाहारण के लिए ‘ईमानदार’ को निष्ठावान, ‘शहीद’ को बलिदान, ‘हकीम’ को वैध, ‘खारिज’ को रद्द और  ‘तहत’  को अनुसार बताया गया है।  यह बात समझ के परे है कि जब सूची में ही ऐसी गड़बड़ है, तो कोई आम इंसान कैसे इन शब्दों को याद रख पाएगा।

इस सूची में एक विरोधाभास भी है कि इसे तैयार करने वाले खुद उर्दू के इस्तेमाल से बच नहीं पाए। उन्होंने ‘बेरहम’ का अर्थ बेदर्द/ दर्दनाक बताया है। सूची में ‘कोशिश’ का अर्थ प्रयास और चेष्टा बताया है, लेकिन दूसरी तरफ उर्दू के शब्दों को त्यागकर मातृभाषा के शब्दों के प्रयोग की ‘कोशिश’ करने की अपील भी की है। कल्पना कीजिए कि ऐसे अभियान चलाने वाले बोलचाल में क्या सचमुच शुद्ध हिन्दी का प्रयोग कर पाते होंगे! क्या वे ट्रेन को लौहपथ गामिनी कहते होंगे या फिर रामायण-महाभारत धारावाहिकों की शैली में वार्तालाप करते होंगे!

पाठकों को ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान’ का नारा याद होगा। इस नारे के जरिए यह जतलाने की कोशिश की जाती है कि हिन्दी, हिन्दुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की। जबकि उर्दू हमारे संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है, यानि वह भी उतनी ही भारतीय है, जितनी हिन्दी। और हकीकत यह है कि समूचे उत्तर भारत में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है वह न तो खालिस उर्दू है न ही विशुद्ध हिन्दी। वह हिन्दुस्तानी ज़ुबान कहलाती है, औरंगजेब के शासनकाल से लेकर आजाद भारत की संविधान सभा तक जिसका अपना अलग इतिहास है और खुद महात्मा गांधी जिसके सबसे बड़े पैरोकार थे।

हिन्दी हिन्दू, उर्दू मुसलमान-इस कुतर्क के हिसाब से तो हिन्दुओं- वह भी शायद केवल सवर्णों, के अलावा किसी और को हिन्दी बोलने का अधिकार नहीं होना चाहिए। फिर उन हिन्दुओं का क्या होगा जो हिन्दी बोलना ही नहीं जानते? और क्या ऐसे दुराग्रह गैर हिन्दीभाषी राज्यों पर थोपने की हिम्मत कोई कर सकता है? क्या देश की विभिन्न भाषाओं में शामिल उर्दू शब्द- जैसे मराठी में परवानगी, पंजाबी में रब, तमिल में वकील और मलयालम में फकीर हटाए जा सकते हैं? भाषा को नफरत का औजार बनाने वाले क्या नेताओं के जयघोष के लिए ‘जिदाबाद’ कहने से परहेज कर सकते हैं?

दरअसल, भाषा को धर्म के साथ जोड़ने वाले लोग खुद दोहरा चरित्र रखते हैं। इन्हें दीवाली मुबारक या होली मुबारक कहने पर तो ऐतराज होता है, लेकिन और लोगों की तरह ये भी द्वार से प्रवेश नहीं करते, बल्कि  ‘दरवाजा’ से भीतर आते हैं। पढ़ने के लिए वे दृष्टिवर्धक या दृष्टिविस्तारक का नहीं, ‘चश्मे’ का इस्तेमाल करते हैं, भोजन ग्रहण करने के बजाय ‘खाना’ खाते हैं और शैय्या पर नहीं, ‘बिस्तर’ पर सोते हैं। इन्हें अपने मुंह से निकलने वाले हर दूसरे या तीसरे शब्द के अंग्रेजी होने का अहसास नहीं होता, लेकिन उर्दू से इन्हें तकलीफ होने लगती है।

हिन्दी की आज जो भी दशा या दुर्दशा है, उसके अनेकानेक कारण हैं, जिन पर चर्चा ‘हरि अनन्त, हरि कथा अनंत’ की तर्ज पर चलती आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। लेकिन ये तय है कि  हिंदुस्तानी ज़ुबान से उर्दू-अरबी-फारसी को अलग करके हिन्दी का भला नहीं हो सकेगा। ऐसा करना तो वैसे ही होगा जैसे किसी फल से रस और गूदे को अलग कर देना। इसलिए हिन्दुस्तानी ज़ुबान को बनाए रखना है और उसकी मिठास कायम रखना है तो उसे शातिराना इरादों से बचाकर रखना होगा। याद रहे, यह मामला हमारी भाषा का ही नहीं, पहचान का भी है।

(देशबन्धु)

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