अमरीका को लेकर भारत को हीनभावना से बाहर आना चाहिए..

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-सुनील कुमार।।

अभी कल से हिन्दुस्तान में यह खलबली मची हुई है कि अमरीकी राष्ट्रपति के घर-दफ्तर, व्हाईटहाऊस के ट्विटर हैंडल ने भारत के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति को फॉलो करना बंद कर दिया है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने तो इसे सदमा पहुंचाने वाला बताकर कहा है कि विदेश मंत्रालय इस मामले में देखे। जिन लोगों को किसी भी बात पर मोदी की या अमरीका की आलोचना करना ही है, उन्हें यह एक मौका और मिल गया है, और कल से सोशल मीडिया पर वे लोग भी जुट गए हैं जिन्हें ऐसे जुटने के लिए कोई भुगतान नहीं मिलता है।

अगर किसी बंद कमरे में भारतीय विदेश मंत्रालय या भारतीय दूतावास से जुड़े हुए कोई लोग अमरीका में अपने समकक्ष अमरीकी अधिकारियों से शराब के एक प्याले पर मजाक में इसकी चर्चा कर देते, तो भी बहुत होता। उससे अधिक महत्व का इसे समझना भारत की एक हीनभावना की दिख रही है कि वह अमरीका से महत्व पाने के ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों का मोहताज है। यह एक पूरी तरह महत्वहीन बात है, और इसे मीडिया के चटपटे कॉलमों तक सीमित रखना था। राहुल गांधी का इस मामले को उठाना एक महत्वहीन बात को तूल देना है, अगर ऐसी कोई बात लिखनी भी थी तो कांग्रेस पार्टी की तरफदारी करने वाले कुछ चर्चित लोग सोशल मीडिया पर ऐसा कर सकते थे।

दिक्कत एक यह भी रही कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के बहुत से फैसले ऐसे ही रहते हैं जिनसे दुनिया में विवाद होते रहता है। खुद अमरीकी राष्ट्रपति उबासी लेने के लिए भी मुंह खोलते हैं, तो उतनी देर में भी एक विवाद खड़ा कर देते हैं। उनका हर बयान पिछले बयान से थोड़ा अधिक घटिया, थोड़े अधिक पागलपन का होता है, और आम अमरीकी यह मानकर चलते हैं कि उन्हें ऐसा ही एक राष्ट्रपति झेलना है जो कि सुधारा नहीं जा सकता। भारत के मुकाबले अमरीका में एक फर्क यह है कि ट्रंप को एक कटु आलोचक मीडिया का सामना करना पड़ रहा है, जो कि भारत में नामौजूद है। इसलिए ट्रंप के दफ्तर ने भारत से दवाई मिलते ही ट्विटर पर भारत को फॉलो करना शुरू कर दिया था, और उस दवाई की खेप पहुंचने के बाद अब शायद जरूरत न रह जाने पर मोदी-राष्ट्रपति तक को अनफॉलो कर दिया। यह बेहूदा हरकत खुद अमरीकी राष्ट्रपति की तस्वीर अधिक बिगाड़ रही है, और भारत को तो जिस दिन दवा न मिलने पर ट्रंप की धमकी पर कुछ प्रतिक्रिया दिखानी थी, उस दिन भी भारत ने नहीं दिखाई, अब तो इस पर कोई प्रतिक्रिया जरूरी भी नहीं है, क्योंकि महत्वहीन लोगों के लिए ही यह महत्वपूर्ण होता है कि वे इस बात को मुद्दा बनाएं कि उन्हें कौन-कौन फॉलो करते हैं। हिन्दुस्तान में नरेन्द्र मोदी कभी यह चर्चा नहीं करते कि उन्हें कौन फॉलो करते हैं, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां आए दिन पोस्ट करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि फख्र के इस बात का जिक्र अपने सोशल प्रोफाईल पर करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें फॉलो करते हैं। जहां तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है तो वे पिछले बरसों में लाखों लोगों द्वारा उठाए गए इस सवाल के जवाब में कुछ भी नहीं कहते।

भारत को अमरीका के मुकाबले अपने आपको इतना हीन नहीं समझना चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति की नजरे-इनायत के लिए वह बेताब रहे। देश की सरकार का रूख इस बारे में ठीक है कि उसने ट्रंप के ट्विटर हैंडल को भगवान की तरह नहीं माना, और उसके रूख को मुद्दा नहीं बनाया। भारत अमरीका के मुकाबले कई मायनों में एक बेहतर देश है, इसने दूसरे देशों पर अमरीका की तरह हमले नहीं किए हैं, और कारोबार की गुंडागर्दी भी नहीं की है। इसलिए भारत को न अमरीकी धमकी में आना चाहिए, और न ही अमरीका की ओर मंत्रमुग्ध होकर देखना चाहिए। वैसे भी ट्रंप अपने इस कार्यकाल के आखिरी कुछ महीनों में है, और वह इस हद तक नाशुकरा इंसान है कि कोरोना के खतरे को उठाते हुए भी अहमदाबाद में मोदी ने जिस तरह ट्रंप की मेहमाननवाजी की, उसकी भी कोई इज्जत ट्रंप ने नहीं की, और दवा न मिलने की बात छेड़कर उस पर भारत को खुली धमकी भी दे डाली। आज ट्रंप की उस लाखों की भीड़ के बाद अहमदाबाद कोरोना की मार झेल रहा है, और ट्रंप है कि हिन्दुस्तान के किसी भी एहसान को नहीं मान रहा है। ऐसा व्यक्ति दुबारा चुनाव जीतकर आ जाए तो अलग बात है, वरना ऐसे बददिमाग और बेदिमाग तथाकथित दोस्त से छोड़छुट्टी पा लेना ही बेहतर है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 30 अप्रैल 2020)

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