कौन है असली पत्रकार

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उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में दो साधुओं की हत्या की खबर मंगलवार को सुर्खियों में रही। बहुत से पत्रकारों ने इसे महाराष्ट्र के पालघर के बाद अब यूपी में साधुओं की हत्या जैसे शीर्षक से पेश किया, मानो दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध हो। पालघर में जिस तरह भीड़ ने दो संतों समेत तीन लोगों की हत्या की, पुलिस के मुताबिक वह माब लिंचिंग का मामला है, भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह के चलते कानून अपने हाथ में लेने का जुर्म किया और तीन लोगों की हत्या की। जबकि बुलंदशहर में पुलिस के मुताबिक यह हत्या जिस युवक ने की, वह नशे की हालत में पकड़ा गया है और कहा जा रहा है कि उसने बाबा का चिमटा दो दिन पहले गायब किया था, जिस वजह से बाबा ने उसे डांटा था और इस नाराजगी में उसने शायद हत्या की। दोनों घटनाओं में केवल समानता यही है कि मृतक साधु-संत समुदाय से हैं, लेकिन इन घटनाओं में धर्म को लेकर विवाद की कोई बात सामने नहीं आई है। लिहाजा इन पर किसी तरह की सियासत करना या इन्हें सनसनीखेज मामले की तरह पेश करना गलत ही माना जाना चाहिए। यूं भी हत्या चाहे आम आदमी की हो, या किसी संत की, किसी के प्राण लेना कानूनी और नैतिक दोनों ही तौर पर गलत है। लेकिन देश में राजनीतिक लाभ लेने के लिए या जबरन अल्पसंख्यकों को कटघरे में खड़े करने और बहुसंख्यक समाज को पीड़ित के तौर पर पेश करने के लिए इन मामलों को कानून के दायरे से भी बाहर देखने की कोशिशें हो रही हैं। 
अभी कुछ दिन पहले ऐसी ही एक कुत्सित कोशिश रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णव गोस्वामी ने की थी। अर्णव गोस्वामी को देश में बहुत से लोग तेज तर्रार पत्रकार मानते हैं। लेकिन अपने टीवी चैनल पर पालघर मसले पर जिस तरह चीख-चीख कर उन्होंने सारा दोष सोनिया गांधी पर मढ़ने की कोशिश की थी, वह किसी लिहाज से पत्रकारिता नहीं थी। बल्कि सीधे तौर पर सोनिया गांधी की छवि खराब करने के साथ देश का सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश थी। जब महाराष्ट्र पुलिस यह कह चुकी है कि पालघर मामले का कोई सांप्रदायिक कोण नहीं है, मृतक और हत्यारे सभी एक ही धर्म के थे और पुलिस ने सौ से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार भी किया है, तब अर्णव गोस्वामी किस उद्देश्य से कानूनी कार्रवाई के विपरीत जाकर इसमें धार्मिक एंगल जोड़ रहे थे और किस आधार पर यह आरोप लगा रहे थे कि सोनिया गांधी मन ही मन खुश हैं कि संतों को सड़क पर मारा गया, और वे इसकी रिपोर्ट इटली भेजेंगी। उनकी घृणा से भरी इस एंकरिंग से उनके राजनैतिक उद्देश्य भले ही पूरे होते हों, लेकिन इससे देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने का खतरा बढ़ रहा है, इसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अभी बहुत दिन नहीं हुए, जब इसी तरह की नफरत भरी राजनीति के कारण दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा दंगों की चपेट में आया और हजारों जिंदगियां प्रभावित हुईं। पत्रकारिता की आड़ में की जा रही इस राजनीति के खिलाफ देश के कुछ हिस्सों में अर्णव गोस्वामी पर एफआईआर दर्ज कराई गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें फिलहाल राहत मिल गई है। बीते शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई इस मामले की सुनवाई में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने गोस्वामी की गिरफ्तारी पर तीन सप्ताह के लिए रोक लगा दी। 
इधर सोमवार को मुंबई में एक स्थानीय कांग्रेस नेता द्वारा दर्ज कराए गए मामले के आधार पर मुंबई पुलिस ने अर्णव गोस्वामी से करीब 12 घंटे पूछताछ की। सत्ता के करीबी माने जाने वाले एक राष्ट्रीय स्तर के स्वघोषित पत्रकार से इस तरह की पूछताछ को लेकर अब देश में नयी बहस शुरु हो गई है। अर्णव की तरह की राजनैतिक विचारधारा रखने वाले कई नामी पत्रकार खुलकर उनके समर्थन में आ गए हैं, जबकि बहुत से तथाकथित बड़े पत्रकार इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं, इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल को आज के माहौल से जोड़ रहे हैं, इसे कांग्रेस की राजनीति का तरीका बता रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए वे भूल रहे हैं कि इस वक्त देश में केंद्र समेत अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकार है। और देश वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों के समूह में दो स्थान नीचे उतरकर 142 वें नंबर पर आ गया है। जिन्हें अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता है क्या वह केवल देश के चर्चित चेहरों के लिए है। क्या छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगलों या जम्मू-कश्मीर की घाटियों में यह अभिव्यक्ति की आजादी गुम हो जाती है। अभी कश्मीर में महिला पत्रकार मोसर्रत जहरा के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने के यूएपीए कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था और उसके बाद पत्रकार और लेखक गौहर गिलानी के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। उत्तरप्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी अभिव्यक्ति की इस आजादी पर कई हमले हुए हैं। तब इन्हें ट्विटर पर ट्रेंड नहीं कराया जाता। तब तो आसान सा तर्क दे दिया जाता है कि कानून अपना काम कर रहा है और इस वक्त जब कानून वाकई अपना काम कर रहा है, तो उसमें मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अर्णव गोस्वामी ने अगर पत्रकारिता के उसूलों पर चलते हुए टिप्पणी की होती और फिर भी उन्हें प्रताड़ित किया जाता, तब तो पत्रकार बिरादरी की इस पर चिंता  समझ में आती। लेकिन अपने टीवी चैनल का इस्तेमाल उन्होंने देश का माहौल बिगाड़ने के लिए किया, जिसमें पत्रकारिता की जगह राजनैतिक विद्वेष भरा हुआ था। पत्रकारों को तो इसी बात की चिंता करनी चाहिए कि देश में राजनैतिक दलों के एजेंडे को पूरा करने के लिए कुछ लोगों को पत्रकारों की तरह पेश किया जा रहा है, जिससे पत्रकारिता का माहौल बिगड़ रहा है, उसे आदर्शों की धज्जियां उड़ रही हैं। कोई अच्छी अंग्रेजी बोले या सत्ता में बैठे बड़े लोगों से उसे संबंध हों या अपने चैनल पर बुलाकर वह समाज के नामी लोगों से चिल्लाकर बात कर ले, इससे कोई बड़ा पत्रकार नहीं बन जाता। असल पत्रकार तो वो होता है जो देशहित और जनहित दोनों का ध्यान रखकर, तथ्यों के साथ, सत्ता के राग-द्वेष से परे होकर, निष्पक्षता और सच्चाई के साथ अपनी बात कहे। अभिव्यक्ति की आजादी ऐसे ही पत्रकारों के दम पर सुरक्षित रहती है, सत्ता के गलियारों में हाजरी लगाने वालों से नहीं।

(देशबन्धु)

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