अर्णब से 12 घण्टे की पूछताछ सवाल खड़े करती है..

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-नारायण बारेठ।।

बेशक ! तुम्हे अपने विरोधी का सफाया करने का हक है। अगर तुमने यह ऐसे तरीको से किया जिसे न्यायोचित नहीं कहा जा सकता तो तुम खुद भी अपने सफाये के हकदार हो जाओगे – अर्नेस्ट हेमिंग्वे –

अर्णब गोस्वामी से पूछताछ में इतना वक्त लगना संदेह और सवाल खड़े करता है। महाराष्ट्र पुलिस को इस बारे में अपना पक्ष रखना चाहिये / किसी प्राथमिकी पर पुलिस को उस व्यक्ति से पूछताछ करने का अधिकार है। लेकिन क्या इसमें 12 घटे [जैसा कि बताया गया है ] ल
ग सकते है ? हेमिंग्वे के विचार महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ शिव सेना और उनके सहयोगियों पर लागु है तो मीडिया पर भी उतना ही लाजिम है। जैसे आजकल किसी प्रोडक्ट के नीचे लिखा रहता है -शर्ते लागु !

अर्णब के साथ ना इंसाफ़ी हो तो जमकर विरोध करना चाहिए। कोई इस पक्ष के साथ है और कोई उस पक्ष के साथ है। पर दोनों तरफ से पत्रकार निशाने पर है / इसमें मीडिया की साख और सम्मान को नुकसान पहुंचता है। कामयाब लोकतंत्र की कसौटी इसमें है कि वहां असहमति कितनी सलामत है और उसका कितना सम्मान है। जनतंत्र में खंडित जनादेश तो देखते रहे है। लेकिन पिछले कुछ सालो में खंडित सवेंदना और खंडित आक्रोश भी एक स्थाई भाव बन गया है। दो साल पहले जब पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की गई ,कुछ लोगो ने प्रकारांतर से जो कुछ कहा ,वो बहुत दर्दनाक था। उनकी मौत के बाद भी उनके बारे में अपशब्द बोले गए ,लिखे गए।

क्या यह सही नहीं है कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत कुछ अंक नीचे आया है ? मीडिया में जो बड़े नाम है ,वे किसी भी सूरत से निबटने में सक्षम है / लेकिन आम पत्रकार के लिए धरातल पर जीवन बहुत मुश्किल होता है। यह 2018 की घटनाये है। चंदन तिवारी झारखंड में आज अख़बार के लिए काम करते थे। पहले धमकिया मिली ,फिर हत्या हो गई। बिहार के आरा में नवीन निश्छल और विजय सिंह बाइक पर जा रहे थे। एक वाहन ने लक्ष्य कर कुचल दिया। दोनों की मौत हो गई। मध्य प्रदेश के भिंड में संदीप शर्मा [ सम्भवत रेत माफिया के हाथो ] की हत्या कर दी गई। अचुत्यानन्द साहू छत्तीसगढ़ में दूर दर्शन के लिए काम करते थे ,मावोवादी हमले ने उनकी जान लेली। कश्मीर में शुजात बुखारी ऐसे ही मारे गए।

पिछले साल यूपी के मिर्जापुर में पत्रकार पवन जायसवाल ने मिड डे मील का एक वीडियो बना लिया / कहा बच्चो को सिर्फ रोटी नमक मिल रहा है। मुकदमा दर्ज हो गया। काफी परेशानी से गुजरना पड़ा। गनीमत रही शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी ने उनका बचाव किया। बाद में सभी तरह की जाँच में पवन को क्लीन चिट मिल गई। लेकिन प्रशांत कनोजिया को मुख्य मंत्री के बारे में एक ट्वीट पर हवालात जाना पड़ा। उन्हें 11 दिन के लिए हवालात भेजने का आदेश हो गया। उनकी पत्नी जागीशा अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट से फरियाद की। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और ए के रस्तोगी ने पुलिस को फटकारा। कहा एक ट्वीट के लिए ऐसी जेल नहीं भेज सकते। पर साथ ही कोर्ट ने ट्वीट को अच्छा नहीं बताया और जाँच जारी रखने को कहा।
कुछ घटनाये सामने आती है ,कुछ स्थानीय स्तर पर ही रह जाती है। Geeta Seshu & Urvashi Sarkar की स्टडी कहती है भारत में पांच साल में पत्रकारों पर हमले की 198 गंभीर घटनाये हुई है। कदाचित महिला पत्रकारों के लिए तो और भी चुनौतीभरा वक्त है। कुछ लोग उनके प्रति जो भाषा इस्तेमाल करते है ,क्या वो उसी देश की जबान है जहाँ इंसान ने सबसे पहले भाषा सीखी ? क्या हम केरल की उस फीमेल वीडियो जर्नलिस्ट शजिला को भूल जाये जो पराक्रमी भीड़ के हाथो पिटती रही /मगर केमेरा नहीं छोड़ा / कहने लगी ‘ मुझे अपने प्राणो की नहीं ,कैमरे की चिंता थी ,आठ लाख का है।

हुकूमत मीडिया को निर्देश नहीं दे सकती। यह उसूलन बहुत ठीक है । इसलिए मीडिया ने अपने लिए एक ‘सेल्फ रेगुलेटरी ‘ संस्था बना रखी है। नेशनल ब्राडकास्टिंग अथॉरिटी। किसी को शिकवा हो तो आप अथॉरिटी को फरियाद कर सकते है। एक सवा साल पहले की बात है। अथॉरिटी ने रिपब्लिक टीवी से कहा वे जिग्नेष मेवानी के बारे में की गई टिप्पणियों पर खेद व्यक्त करे। लेकिन टीवी ने अनसुना कर दिया।

क्या वो वक्त नहीं आ गया जब हम खुद के बारे में विचार करे। क्या हम बगैर चीखे चिल्लाये अपनी बात नहीं कह सकते ? देश कोशिश कर रहा था कि पुलिस थानों में भाषा ठीक हो। उनकी जबान में सुधार की खबरे आती रही है। लेकिन जो ख़बर सुनाते और दिखाते है , उनकी भाषा क्या होती जा रही है ?

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