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उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बने रहना और राज्यपाल के विशेषाधिकार..

उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बने रहना और राज्यपाल के विशेषाधिकार..

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-संजय कुमार सिंह।।


महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे राज्य विधानसभा के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं और नियमानुसार शपथग्रहण के छह महीने के अंदर उन्हें किसी भी सदन का सदस्य होना है। लॉक डाउन के कारण चुनाव नहीं हो सकते और छह महीने पूरे हो जाएं तो क्या हो? तरह-तरह के उदाहरण और नजीर होंगे पर इसमें राज्यपाल की भूमिका भी होती है। महाराष्ट्र में राज्यमंत्रिमंडल ने सिफारिश की कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी उद्धव ठाकरे को राज्यपाल कोटा से विधानपरिषद का सदस्य मनोनीत कर दें। निश्चित रूप से यह इस स्थिति में सबसे आसान तरीका है। दो पद खाली भी हैं। अमूमन कोई विधायक इस्तीफा देता है और चुनाव होता है। यह आखिरकार सरकारी पैसों का अपव्यय ही है।
महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने 9 अप्रैल को यह सिफारिश राज्यपाल से की थी पर अभी तक इसपर फैसला नहीं हो पाया है। अब मंत्रिमंडल ने तय किया है कि वह अपना फैसला राज्यपाल से फिर दोहराएगा और आग्रह करेगा कि वे शीघ्रातिशीघ्र इसपर फैसला करें। कोरोना के संकट में अगर अधिकारियों को एक्सटेंशन दिया जा रहा है तो मुख्यमंत्री के मामले में विधानसभा की सिफारिश के बाद यह कुछ खास मामला नहीं है। और बगैर मुद्दा बनाए ऐसा हो जाना चाहिए था। वैसे भी जब सरकार को लाभ पहुंचा चुके यौन आरोपी को संसद में मनोनीत किया जा सकता है तो विधानसभा में यह किसी भी तरह से अनुचित नहीं है पर मामला लटका हुआ है। निश्चित रूप से यह राज्यपाल के विवेक का मामला है। पर मुख्यमंत्री अगर छह महीने पूरे होने से पहले इस्तीफा दें और राज्य मंत्रिमंडल फिर उनका नाम प्रस्तावित करे तो राज्यपाल क्या करेंगे यह भी देखना दिलचस्प होगा।
वैसे तो राज्यपाल का पद संवैधानिक है और विधानसभा की सिफारिश मानना उनका काम है पर जब राज्यपाल राजनीतिक करें या उनसे करवाया जाए तो कुछ भी हो सकता है। यहां सिक्किम का एक मामला याद आता है। यह पिछले दिसंबर की ही बात है। सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के प्रेसिडेंट पीएस तमांग (गोले) विधानसभा का सदस्य हुए बगैर मुख्यमंत्री बनाए गए और जब मुख्यमंत्री बने तो चुनाव नहीं लड़ सकते थे क्योंकि भ्रष्टाचार के एक मामले में सजा हुई थी। चुनाव आयोग ने उनकी सजा की अवधि कम कर दी तो वे चुनाव लड़कर विधायक बन गए। चुनाव जीते बगैर छह महीने ही मुख्यमंत्री रह सकते थे सो पूरा हुआ तो (तकनीकी तौर पर) सिक्कम में कोई सरकार नहीं थी। अमूमन चुनाव जीतने के बाद कोई मुख्यमंत्री दोबारा शपथ नहीं लेता है पर गोले मंत्रिमंडल को दिल्ली में शपथ दिलाई गई क्योंकि राज्यपाल अस्वस्थ थे और शपथ दिलाने गंगटोक नहीं जा सकते थे। इसलिए मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने दिल्ली आ गया। महाराष्ट्र में क्या होता है यह देखने लायक होगा।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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