हमारा मीडिया आखिर किसके लिए है

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-संजय कुमार सिंह।।

हमारा मीडिया आखिर किसके लिए है और किसलिए है। लॉक डाउन में बाहर निकलने वालों की पिटाई गलत है। किसी कानून के तहत कोई किसी को डंडे से मार कर घायल नहीं कर सकता है। यहां तो जान चली गई। मीडिया ने खबर नहीं छापी। कार्रवाई की मांग तो बहुत दूर। मीडिया और पुलिस के काम और मनमानी पर अक्सर स्वयं संज्ञान लेने वाला कोई भी आम गरीब – कमजोर के हित में सामने नहीं आया। नहीं आने से मेरा मतलब है कि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं करवा पाया कि किसी को पीटा नहीं जाए। बैंक खुले हैं, दवा राशन की दुकानें खुली हैं, लोग पैदा हो रहे हैं मर भी रहे हैं, अंतिम संस्कार नहीं किया जाए पर लाशें घर में तो नहीं रखी जा सकतीं। इसके लिए लोग निकलेंगे ही। वैसे भी बाहर कर्फ्यू नहीं है। लॉक डाउन है। दोनों का अंतर बताने की जरूरत नहीं है।

ऐसे में पुलिस की वर्दी में तैनात कुछ अत्याचारी, कुंठित, मनोरोगी और अधिकार या ठंडे की ताकत से पागल हुए सरकार और प्रशासन के प्रतिनिधि लोगों को पीट रहे हैं। और मीडिया उनकी खबरें नहीं के बराबर छाप रहा है शिकायत तो नहीं ही कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी लोग मजे ले रहे हैं जैसे उनकी बारी आएगी ही नहीं। कल यह वीडियो मेरे पास भी आया था। इसमें उठक बैठक करा रहा यह प्रतिनिधि खाकी वर्दी में नहीं है। और सड़क पर उठक बैठक कराने का क्या मतलब? अगर वह बैंक जा रहा हो, दवाई लाने जा रहा हो तो क्या कोई सिपाहियों से बस करके मार-पीट को न्यौता दे? क्या लॉक डाउन में निकलने की सजा उठक-बैठक ही है? मुझे लगता है यह इस लड़के की भलमनसाहत है जिसका अखबारों ने मजाक बनाया है। मीडिया गरीब के साथ नहीं है, अमीर के साथ नहीं है, सही के साथ नहीं है, पर गलत के साथ कैसे हो सकता है?

मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों को विरोध करना सिखाना चाहिए। अपने अधिकार के लिए लड़ना आना चाहिए। मध्यम और उच्च वर्गीय परिवार बचपन से ही बच्चे को पिल्ले की तरह स्टैंड अप और सिट डाउन सिखाते हैं और वही बच्चे बड़े होकर किसी का भी आदेश मान लेते हैं। कोई मतलब नहीं है कि इस तरह किसी का कोई आदेश माना जाए। इस निजी सिक्यूरिटी गार्ड की आर्थिक, मानसिक या शैक्षिक औकात नहीं है कि इस रईसजादे को उठक बैठक कराए। पर अच्छी सीख नहीं मिलने और माता पिता ने अपनी खुशी के लिए इस बच्चे को बर्बाद कर दिया है।

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About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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