मन की बात और मनमानी का डर..

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महामारी और पूर्णबंदी के इस दौर में देश में बहुत कुछ बदल गया है। जो चीजें कभी नहीं रुकती थीं, जैसे ट्रेन के पहिए, त्योहारों की गहमागहमी, लोगों का सैर-सपाटा, शादी-ब्याह की रौनक, वे सब भी रुक गई हैं। लेकिन मोदीजी के मन की बात इस दौर में भी बदस्तूर जारी है। वैसे तो बीते कुछ दिनों में देश आए दिन उनके मन की बात सुन ही रहा है, लेकिन फिर भी छह सालों से वे हर महीने के आखिरी रविवार लोगों से मुखातिब हो रहे हैं और आज भी हुए। उनके पास कहने को बहुत कुछ था, जैसे कोरोना के कारण जो आर्थिक संकट देश के सामने आया है, जिस तरह करोड़ों लोग बेरोजगार हुए हैं, उद्योग-व्यापार ठप्प हुए हैं, उन्हें तकलीफ से निकालने के लिए सरकार के पास क्या योजना है। देश में स्वास्थ्य सुविधाएं इस वक्त किस मुकाम पर हैं। देश के करोड़ों किसानों के सामने अपनी उपज को लेकर चिंताएं हैं, उन्हें दूर करने के लिए सरकार क्या कर रही है। करोड़ों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है, उनके बारे में सरकार क्या सोच रही है।

कोरोना के कारण जो सामाजिक, मनोवैज्ञानिक बदलाव हो रहे हैं, उनके बारे में क्या सरकार जानकारों से चर्चाएं कर रही है, ताकि इन क्षेत्रों में जो समस्याएं आएं, उनका मुकाबला करने के लिए पहले से तैयारी कर ली जाए। लाखों कामगार अपने घरों से दूर दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं, वे कब तक भोजन के लिए लाइन में खड़े होते रहेंगे, उनकी घर वापसी के लिए केंद्र क्या कुछ विचार कर रही है। सरकार लॉकडाउन बढ़ाएगी या खोल देगी या कुछ ढील देगी, ताकि संक्रमण की रफ्तार पर काबू रखा जाए। ऐसे कई मुद्दों और सवालों पर मोदीजी अपने मन की बात कर सकते थे। लेकिन उन्होंने जरूरी बातों की जगह थाली, ताली, दिए जैसी गैरजरूरी बातों पर फोकस रखा।

भारत की जनता की तारीफ की कि पूरा देश कोरोना से लड़ाई में एक लक्ष्य, एक दिशा, में साथ-साथ चल रहा है। उन्होंने रमजान और अक्षय तृतीया का जिक्र भी किया। साथ ही राज्य सरकारों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकारें जो अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं, उसकी कोरोना के खिलाफ लड़ाई में बहुत बड़ी भूमिका है। लेकिन मोदीजी ने यह नहीं बताया कि कोरोना जैसे गंभीर मसले पर उन्होंने शुरु से ऐसी नीति क्यों नहीं अपनाई कि राज्य सरकारें केंद्र पर भरोसा दिखाती। लॉकडाउन के पहले उन्होंने राज्य सरकारों से चर्चा नहीं की, लिहाजा अफरा-तफरी मच गई। बहुत से कामगार देश के दूसरे राज्यों में फंस गए। बहुत सी राज्य सरकारें अपने श्रमिकों को वापस बुलाना चाहती हैं, लेकिन केंद्र से उन्हें इसमें सहयोग नहीं मिला। केंद्र ने अलग-अलग राज्यों में जो स्वास्थ्य टीमें भेजी हैं, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। टीएमसी का आरोप है कि जिन राज्यों में मामले ज्यादा हैं, वहां कम टीमें भेजी गईं, जबकि प.बंगाल में कम मामले हैं, तो वहां 7 जिलों में टीमें भेजी गई हैं।

राज्य सरकारों को केंद्र से आर्थिक मदद न मिलने की भी शिकायत है। इन तमाम बातों से यह संकेत मिल रहे हैं कि कोरोना के संकट में केंद्र पहले के मुकाबले अधिक शक्तिशाली होता जा रहा है, जबकि राज्यों की निर्भरता केंद्र पर बढ़ रही है। राज्यों के पास आय के साधन घटते जा रहे हैं। स्थानीय कारोबार बंद हैं, सम्पत्तियों का लेन-देन बंद है, लॉकडाउन के कारण पेट्रोल/डीजल की बिक्री लगभग शून्य है, और शराब बिक्री पर भी रोक है। कई राज्य सरकारों को अपने कर्मचारियों को वेतन देने में भी मुश्किल हो रही है। शराब और पेट्रोलियम दो ऐसी चीजो हैं. जिन पर राज्य सरकार सीधे टैक्स लगा सकती है, जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र ने पेट्रोलियम पर पहले से ही बड़ा टैक्स लगा रखा है, और शराब की बिक्री पर कोरोना के चलते रोक लगी हुई है, जिसने राज्य सरकारों की मुश्किल और बढ़ा दी है। इस पर सवाल भी उठ रहे हैं, जिसका जवाब देना या न देना केंद्र की मर्जी पर निर्भर है।

दरअसल अभी सब कुछ या बहुत कुछ केंद्र की ही मर्जी पर निर्भर नजर आ रहा है और इस आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तरकोरोना काल में हम केंद्र के वर्चस्व को बढ़ते देख सकते हैं। केवल भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में इस तरह का बदलाव हो सकता है। जानकारों का मानना है कि महामारी के इस दौर में दुनिया भर में आक्रामक राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिलेगा और मुक्त व्यापार भी कठिन हो जाएगा। मनमाने तरीके से शासन करने वाले नेता कोरोना का फायदा उठाकर ख़ुद को और मजबूत करेंगे और उनकी निरंकुशता बढ़ेगी, जबकि जनता पर तरह-तरह की पाबंदियां और निगरानियां थोपी जाएंगी। 

‘सेपियंस’ जैसी नामी किताब के लेखक युवाल नोआ हरारी ने फाइनेंशियल टाइम्स में एक चर्चित लेख में लिखा है कि सरकारें और बड़ी कंपनियां लोगों को ट्रैक, मॉनिटर और मैनिप्युलेट करने के लिए अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती रही हैं। लेकिन अगर हम सचेत नहीं हुए तो यह महामारी सरकारी निगरानी के मामले में एक मील का पत्थर साबित होगी। अब तक तो यह होता है कि जब आपकी ऊंगली स्मार्टफोन से एक लिंक पर क्लिक करती है तो सरकार जानना चाहती है कि आप क्या देख-पढ़ रहे हैं लेकिन कोरोना वायरस के बाद अब इंटरनेट का फोकस बदल जाएगा। अब सरकार आपकी ऊंगली का तापमान और चमड़ी के नीचे का ब्लड प्रेशर भी जानने लगेगी। सरकार को मालूम होगा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं है।

सिस्टम को यह भी पता होगा कि आप कहां-कहां गए, किस-किस से मिले, इस तरह का सिस्टम किसी संक्रमण को कुछ ही दिनों में खत्म कर सकता है। कोरोना को रोकने के लिए तो यह तकनीक बेहतरीन लगती है, लेकिन हरारी लिखते हैं जो टेक्नोलॉजी खांसी का पता लगा सकती है, वही हँसी का भी। अगर सरकारों और बड़ी कंपनियों को बड़े पैमाने पर हमारा डेटा जुटाने की आजादी मिल जाएगी तो वे हमारे बारे में हमसे बेहतर जानने लगेंगे।

वे हमारी भावनाओं का अंदाजा पहले ही लगा पाएंगे, यही नहीं, वे हमारी भावनाओं से खिलवाड़ भी कर पाएंगे।  हरारी कहते हैं, ‘कोरोना वायरस का फैलाव नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का बड़ा इम्तिहान है। अगर हमने सही फैसले नहीं किए तो हम अपनी सबसे कीमती आजादियां खो देंगे, हम ये मान लेंगे कि सरकारी निगरानी सेहत की रक्षा करने के लिए सही फैसला है। हरारी की ये चिंताएं निराधार नहीं हैं। अभी कुछ समय पहले कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे प्रकरण हमने देखे हैं। चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं की जानकारियों को चोरी-छिपे जुटाने का काम राजनैतिक दल नई तकनीकों के माध्यम से करते रहे हैं।

कोरोना की रोकथाम के नाम पर निगरानी का दायरा बढ़ेगा, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि महामारी खत्म होने के बाद लोकतंत्र की खातिर उसे वापस समेटा जाएगा। बल्कि आशंका इस बात की ही ज्यादा है कि इस स्वास्थ्य आपातकाल में आजमाए तरीके बाद में लोकतंत्र में आपातकाल की तरह इस्तेमाल न होने लगें। इसलिए जनता और राजनैतिक दलों को दोहरी सतर्कता बरतने की जरूरत है।

(देशबन्धु)

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