Home देश जितने मुंह उतनी बातें कोरोना दवा की..

जितने मुंह उतनी बातें कोरोना दवा की..

-चंद्र प्रकाश झा।।

कोरोना प्रकोप के मद्देनज़र इसकी दवा तैयार करने के काम मे दुनिया भर के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं. लेकिन अभी तक किसी ने कोई ऐसी दवा नहीं बनाई है जिसे प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक परीक्षणों  से आगे इंसानी ट्रायल में भी मुकम्मल कामयाबी मिल गयी हो.ऐसे में संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यूएचओ ) ने किसी भी दवा की अनुशंसा नहीं की है . लेकिन दुनिया भर में कोरोना के भय से माहौल कुछ इस तरह बन गया है कि लोग इस महामारी की  किसी की भी कोई भी दवा की अपुष्ट खबर भी मिलते ही उछल पड़ते हैं. जाहिर है कि दुनिया में जितने लोगों के मुंह हैं कोरोना वायरस से संक्रमण के उपचार की दवा  की भी उतनी बातें  हो रही हैं.

बहुत हद तक विभिन्न देशों की सरकारों और उतनी ही मीडिया ने भी इन बातों को शह ही दी है . इस स्तंभ के 25 अप्रैल अप्रैल के अंक में कोरोना की दवा ढूंढ लेने में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नितांत अवैज्ञानिक प्रलाप की विस्तार से चर्चा कर चुके हैं . हम उसके पहले  के अंक में तमिल कार्टूनिस्ट गोपाला वर्दराजन के एक कार्टून के हवाले से यह भी रेखांकित करचुके हैं कि यह पैंडेमिक ही नहीं इन्फोडेमिक का भी मामला है.

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंग्रेजी मुहावरा  ‘ प्रिवेंशन इज बेटर दैन
रिमेडी ‘ के मर्म को विश्वव्यापी   समर्थन मिला होने के बावजूद आम लोगों की  नज़रें कोरोना के निरोधक उपायों से ज्यादा उपचारात्मक बातों पर है .
मीडिया ने चीन के वुहान प्रान्त में कोरोना पसर जाने के बाद लॉक डाउन और सीलबंदी से वहां इस पर नियंत्रण की बात कुछ हद तक तो की लेकिन ताइवान और कुछ अन्य देशों में भी कोरोना के प्रसार के पहले ही उठाये गए निरोधक उपायों की लगभग कोई चर्चा नहीं की. कमोबेश वही रवैया केरल में कोरोना का पहला मरीज मिलते ही वहां के कम्युनिस्ट मुख्य मंत्री पी विजयन और स्वास्थ्य मंत्री   , जिन्हे वहाँ के लोग टीचर अम्मा कहने लगे हैं ,  की निरंतर सजग सक्रियता से मिली अप्रतिम सफलता की मीडिया में यथेष्ट चर्चा नहीं मिली जो अन्य राज्यों के लिए प्रेरक है. हम उस बारे में इस आलेख के सोशल मीडिया पर लिंक देने के बाद कमेंट बॉक्स में हमारी एक सहयोगी मित्र रेणु गुप्ता से मिली  वीडियो क्लिप संलग्न  करने का प्रयास करेंगे कर रहे हैं जो सरकारी प्रचार होते हुए भी देखने लायक है,

कुछ दिनो  पहले खबर मिली कि भारत के फ़राज़ ज़ैदी और रहमान ने दवा और इस सिलसिले में प्रगति हासिल की हैं. इलाहाबाद के फ़राज़ ज़ैदी, विजिटर इंस्टीट्यूट फिलाडेल्फिया में काम करते हैं। वे कोरोना की वैक्सीन इजाद करने में लगे हुए हैं, जिसका मनुष्य पर टेस्ट 6 अप्रैल को हुआ. बताया जाता है कि वो टेस्ट सफल रहा। दूसरी ओर , नदीम रहमान और उनकी टीम ने मिलकर कोविड19 की जांच की  सस्ती टेस्टिंग किट तैयार करने का दावा किया है , जिसकी कीमत 500 रुपए पडेगी। रहमान की कंपनी- न्यूलाईफ द्वारा विकसित  यह  किट 15 मिनट में रिपोर्ट दे देती है। रहमान का  कहना है कि यह किट
आगे चल कर और सस्ती होगी। खबर मिली कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने इस किट को अपनी हरी झंडी दिखा दी है और उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी  खरीद के आदेश दिये हैं ।

अब हम कुछ चर्चा  इन्फोडेमिक की करेंगे.बड़े जोर शोर से खबर मिली कि फ्रांस के वायरोलॉजिस्ट और 2008 में चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता ल्यूक मॉन्टैग्नियर ने दावा किया कि सार्स सीओवी-2 वायरस कृत्रिम यानि मानव निर्मित है। उन्होंने कहा कि ये वायरस चीन के लैबोरेट्री  में एड्स के वायरस के खिलाफ एक वैक्सीन के निर्माण के प्रयास  में  असावधानी से लीक हुआ. ल्यूक ने यह दावा कर पूरी दुनिया में के विज्ञान और राजनीतिक जगत में भी भूचाल सा पैदा कर दिया .ल्यूक ने एक इंटरव्यू में कहा  “कोरोना वायरस के जीनोम में एचआईवी समेत  मलेरिया के जर्म के तत्व पाए गए हैं जिससे शक होता है कि यह वायरस प्राकृतिक रूप से पैदा नहीं हो सकता।
वुहान की बायोसेफ्टी लैब 2000 के आसपास से वायरसों पर रिसर्च कर रही है इसलिए यह नोवल कोरोना वायरस एक तरह के औद्योगिक हादसे का नतीजा हो सकता है।” ल्यूक , जीव विज्ञानी जेम्स वाटसन की तरह विवादित हैं। उनके उन शोध पत्रों पर काफी विवाद रहा है जिनमें डीएनए से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे निकलने और  एड्स  एवं  पार्किसन रोग को ठीक करने में पपीते के फायदे पर बात कही गयी थी। इन रिसर्च पेपर की वैज्ञानिक समुदाय में काफी भद्द हुई .

चीन ने  कोरोना वायरस के वुहान लैबोरेट्री से निकलने के ल्यूक के दावों
का खंडन किया.चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि डबल्यूएचओ कह चुका है इसके कोई सबूत नहीं  कि यह वायरस किसी लैबोरेट्री में तैयार किया गया। साइन्स जर्नल ‘ नेचर मेडिसिन’ में प्रकाशित एक शोधपत्र में भी कहा गया कि ये वायरस कोई कृतिम जैविक हथियार नहीं बल्कि प्राकृतिक है। पत्रिका में छपा है कि अगर ये वायरस लैब निर्मित होता तो इंसानों में पाए जाने वाले कोरोना वायरस के जीनोम सीक्वेंस से ही इसका निर्माण किया जा सकता था.मगर वैज्ञानिकों द्वारा जब कोविड-19 के जीनोम को अब तक के ज्ञात जीनोम सीक्वेंस से मैच किया गया तब वह  प्राकृतिक वायरस पाया गया . नोवल कोरोना
वायरस का जीनोम चमगादड़ और पैंगोलिन में पाए जाने वाले बीटाकोरोना वायरस के समान है। ल्यूक की  थ्योरी काल्पनिक आधार पर टिकी है कि सार्स सीओवी-2 नामक वायरस के पूरे जीनोम में एचआईवी-1 के कुछ न्यूक्लिओटाइड सीक्वेंस पाए गए हैं। यूरोपियन साइन्टिस्ट के भी एक  लेख में ल्यूक की थ्योरी का अन्त्य परीक्षण कर कोरोना वायरस यानि सार्स सीओवी-2 और एचआईवी-1 के जेनेटिक कोड्स के हवाले से पुष्टि की गई कि दोनों में कोई सीधी समानता
नहीं है। सार्स सीओवी-2 में एचआईवी का कोई अंश नहीं पाया जाता। लेख के अनुसार कोरोना वायरस कहां पैदा हुआ, इसके बारे में  तार्किक अवधारणाएं सामने  आ चुकी हैं। अमेरिका के डॉ एंथनी फॉकी  भी कह चुके हैं कि ‘यह वायरस जानवरों की प्रजातियों से मनुष्यों में पहुंचा’।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्षेत्रीय निदेशक  रिचर्ड ब्रेनन ने कहा ‘यह
वायरस प्रथम दृष्ट्या ज़ूनोटिक है यानि  जानवरों की प्रजातियों से फैला
है’। पेरिस के वॉयरोलॉजिस्ट इटियेन सिमोन लॉरियर ने लूक के दावे को
बिलकुल खारिज कर कहा – “नोबेल विजेता ल्यूक का दावा तार्किक  नहीं है . क्योंकि अगर बहुत सूक्ष्म तत्व समान हैं भी तो ये तत्व पिछले वायरसों में भी मिले हैं।

इस बीच  ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने कोरोना की वैक्सीन बना लेने का दावा कर ये भी  कहा कि  जानवरों पर इन  वैक्सीन का ट्रायल कामयाब रहा और अब इंसानों पर इसे  परखने के  ट्रायल चल रहे हैं. उसके वैज्ञानिकों ने चिंपाजी में मौजूद एडेन वायरस की मदद से एक वैक्सीन तैयार की जिसका अब मानव  शरीर पर ट्रायल हो रहा है. उनके मुताबिक़ दो वालंटियर को वैक्सीन की पहली डोज दी गई और कोरोना महामारी से निजात दिलाने के लिए यह दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन ट्रायल है. यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रयू पोलार्ड ने कहा, ”ऑक्सफर्ड में हम कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के लिए एडेन वायरस के जीन का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी प्रक्रिया से तैयार दूसरी वैक्सीन का पहले भी हजारों लोगों पर इस्तेमाल हुआ है. इसलिए हमारे पास पहले से ही काफी डेटा है.पहले चरण में ब्रिटेन में 165 अस्पतालों में करीब 5 हजार मरीजों पर एक महीने तक और इसी तरह से यूरोप और अमेरिका में
सैकड़ों लोगों पर इस वैक्सीन का परीक्षण किया जाएगा जिसके नतीजे आगामी जून में आएंगे. प्रोफेसर पोलार्ड ने दावा किया सितंबर तक कोरोना वैक्सीन की पहली खेप बाजार में आ सकती हैं .

फिलहाल तो हम इतना जरूर कहेंगे इब्तदा -ऐ – कोरोना है रोता है क्या आगे आगे देखिये होता है क्या.

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