माला चाहे जो पहन लें, पर सच यही है

माला चाहे जो पहन लें, पर सच यही है

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-देवेंद्र शास्त्री।।

पहले दिन से ये वैज्ञानिक जानकारी प्रसारित की जा चुकी है कि 23 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर कोरोना वायरस का चर्बी से बना कवच पिघलने लगता है, जिससे उसकी ताकत 50 फीसद तक घट जाती है। चूंकि अब देश के अधिकांश इलाकों में तापमान 18 से 39 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच चल रहा है। इसलिए इस वायरस का फैलाव धीमा पड़ गया है और मारक क्षमता भी घट गई है। लिहाजा ज्यादा संख्या में लोग ठीक हो रहे हैं और मरने वालों की संख्या भी गिरती जा रही है। लोक डाउन से भी फैलाव की गति कम करने में मदद मिली है। पर बिना तैयारी के लोकडाउन से देश को असहनीय आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर लॉक डाउन से एक हफ्ता भी पूर्व तैयारी का दिया जाता तो दिहाड़ी मजदूरों की भूख और पैदल यात्रा से हुई मौतों से बचा जा सकता था। फूलमाला पहनने की जल्दबाजी के कारण देश को ये नुकसान उठाना पड़ा है।

कोरोना महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई में प्रकृतिक और भौगोलिक स्थिति से लाभ यहां के नागरिकों को मिला है। पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देश भी हमारी जैसी ही जलवायु वाले देश हैं। वहां के हालात हमसे भी बेहतर हैं। वहां तो कोई भारत जैसे मसीहा भी नहीं है।

हालात और बेहतर होते अगर

  • पहला कोरोना पेशेंट मिलते ही विदेश से आने वाले लोगों को 14 दिन के क़्वारटाईन करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया होता।
  • कोरोना संक्रमित देशों से लाये गए भारतीयों की कोरोना जांच ठीक से होती
  • लोकडाउन से पहले उद्योग, व्यवसाय, किसान व मजदूरों को तैयारी के दो तीन दिन दिये जाते।
  • समय रहते मास्क, PPE, और टेस्टिंग कीटस उपलब्ध करवा दी जाती
  • मोदीजी, अशोक गहलोत और अरविंद केजरीवाल के बीच कोरोना सेनापति का कोल्डवार नहीं चलता।

राज्य सरकारों ने निश्चित रूप से बहुत मेहनत की है। मोदीजी की जल्दबाजी और बिना तैयारी के फैसलों का बोझ भी अंततः राज्य सरकारों को ही झेलना पड़ा है।

केरल, राजस्थान, दिल्ली राज्यों ने लीक से हट कर परिणाम देने वाली मेहनत की। महाराष्ट्र सरकार ने संयम से काम लिया है। यह बात भी कम नहीं है।

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