ट्रम्प: जो दवा के नाम पर जहर दे दे..

-चंद्र प्रकाश झा।।

कोरोना के खिलाफ मुकाबला में वैश्विक वीर की भूमिका में नजर आने को आतुर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली एक जैसी लगती है. अमेरिका में कोरोना का पहला संक्रमित मरीज भारत से 10 दिन पहले 20 जनवरी को मिला। वहाँ भी भारत की ही तरह व्यापक टेस्टिंग की तैयारी नहीं थी। कोरोना को भगाने के लिये मोदी जी विज्ञान से परे अपने ज्ञान के सहारे भारत के लोगो से ताली–थाली बजवा कर और फिर अपने घरो में घंटो बत्ती गुल रखने का उपक्रम कर चुके हैं. ट्रंप जी उन से पीछे नहीं हैं.वो कभी कह्ते हैं कि अमेरिका ने कोरोना की दवा ढूंढ ली है.तो कभी इसका ठीकरा चीन पर फोड देते है. कभी इसकी रोकथाम में लगी डब्ल्युएचओ से तो कभी इसी दिसम्बर में राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को चुनौती देने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन से भिड जाते हैं।

 कोरोना वायरस के सबसे ज्यादा मरीज अमेरिका में हैं जहाँ करीब 10 लाख लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं और अब तक 50 हजार से ज्यादा की मौत हो चुकी है. सबसे ज़्यादा कहर न्यूयॉर्क प्रांत में है जहाँ 20 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है. ट्रंप जी ने 21 मार्च को दावा किया कि अमेरिका ने कोरोना की दवा बना ली है.उनका ट्वीट था, ”हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और एज़िथ्रोमाइसिन का कॉम्बिनेशन मेडिसिन की दुनिया में बड़ा गेम चेंजर साबित हो सकता है. एफ़डीए ने ये बड़ा काम कर दिखाया है-थैंक्यू. इन दोनों को तत्काल इस्तेमाल में लाना चाहिए, लोगों की जान जा रही है.” ट्रंप के इस बयान के बाद 21 मार्च को ही अमरीका के सेंटर फॉर डिज़िज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कोरोना के मरीज़ों के लिए एफ़डीए
ने कोई दवा अब तक स्वीक्रित नहीं की है. लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका और कई देशों में कोरोना मरीज़ों के उपचार मैं
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल किया जा रहा है. अब ट्रंप जी ने नई सलाह दी है कि रोगाणुनाशकों को शरीर में इंजेक्ट करने से कोरोना का इलाज हो सकने के बारे मे शोध हो.प्रेस ब्रीफिंग में ट्रंप ने ये भी प्रस्ताव दे डाला कि अल्ट्रावॉयलेट लाइट से मरीज़ों के शरीर को इरेडिएट (वैसी चिकित्सा पद्धति जिसमें विकिरण का इस्तेमाल होता है) किया जा सकता है. डॉक्टरों ने ट्रम्प ग्यान को ख़ारिज कर दिया.ट्रंप की ब्रीफिंग से पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने भी कह दिया कि सूरज की
किरणों और रोगाणुनाशकों से संक्रमण ख़त्म होने की बात सबको पता
है.राष्ट्रपति ट्रंप की अपनी पब्लिक हेल्थ एजेंसी ने भी , ब्लीच को दवा
के रूप में इस्तेमाल करने पर  चेतावनी दी है. व्हाइट हाउस अधिकारी ने
अमेरिकी सरकार की रिसर्च के हवाले से कहा कि सूरज की रोशनी और गर्मी से कोरोना  तेज़ी से कमज़ोर होता है.दावा किया गया है कि सलाइवा और श्वसन तंत्र में मौजूद कोरोना वायरस को ब्लीच पाँच मिनट में  ख़त्म कर देता है.ये भी दावा किया गया कि आइसोप्रोपिल अल्कोहल इस वायरस को और भी  तेज़ी से ख़त्म कर सकता है.आइसोप्रोपिल का इस्तेमाल डिसइंफेक्टेंट्स, डिटर्जेंट्स और एंटिसेप्टिक्स जैसे केमिकल में होता है. न्यूज़ कॉन्फ़्रेंस में यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटीज़ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी डायरेक्टोरेट के एक्टिंग हेड विलियम ब्रायन ने इस रिसर्च का खुलासा किया.प्रेस ब्रीफ़िंग में व्हाइट हाउस के कोरोना वायरस रेस्पांस कोऑर्डिनेटर डॉक्टर डेबोरा बिर्क्स की ओर देख डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “तो मान लीजिए हम शरीर पर कोई अल्ट्रावॉयलेट या बहुत शक्तिशाली किरण डालते हैं, और मैं समझता हूँ कि आपने ये कहा है कि इसकी अभी जाँच नहीं हुई है, लेकिन आप इसका टेस्ट करने जा रहे हैं.” राष्ट्रपति ट्रंप ने ये भी कहा-
और फिर मान लीजिए आप शरीर के अंदर किरण डालते हैं वो चाहे त्वचा के ज़रिए हो या फिर किसी और तरीक़े से.और आपने ये कहा है कि आप इसका टेस्ट जल्द ही करने जा रहा है. काफ़ी रोचक लग रहा है ये. ट्रंप ने ये भी सलाह दे डाली कि अगर रोगाणुनाशकों को इंजेक्ट कर दिया जाए, तो ये एक मिनट में ख़त्म हो सकता है और ये जाँच करना भी काफ़ी रोचक होगा. लेकिन ट्रंप ने माना कि वे डॉक्टर नहीं हैं. ट्रंप ने डॉक्टर बिर्क्स से पूछा कि क्या उन्होंने गर्मी और लाइट से कोरोना के इलाज के बारे में सुना है.डॉक्टर बिर्क्स ने कहा- नहीं, इलाज के रूप में नहीं. इस पर ट्रंप ने कहा- मेरा मानना है कि ये बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है. इसे देखने की आवश्यकता है. ट्रंप ने दावा किया कि लाइजॉल, डेटॉल जैसे रोगाणुओं को मारने वाले पदार्थो को निगलने से कोरोना वायरस का संक्रमण ठीक हो जाएगा।

एक पत्रकार ने सवाल उठाया कि राष्ट्रपति ट्रंप की बिना सोचे समझे की गई टिप्पणी से अमरीकियों में ग़लत सूचना फैल सकती है जो काफ़ी ख़तरनाक है. डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप के इस आइडिया के विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं. पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर विन गुप्ता ने कहा , “किसी भी तरह के क्लिन्जिंग प्रोडक्ट को शरीर में इंजेक्ट करने की धारणा ग़ैरज़िम्मेदाराना है और ये ख़तरनाक है. जब लोग अपने को मारना चाहते हैं, तो वे ये तरीक़ा अपनाते हैं.”

राष्‍ट्रपति के बयान के बाद अमेरिकी स्‍वस्‍थ्‍य विशेषज्ञों को आगे आना
पड़ा और उन्होने लोगों से कहा कि ऐसे ‘खतरनाक’ सुझाव पर ध्‍यान देने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है रोगाणुनाशक बेहद जहरीला पदार्थ होता है।
आइसोप्रोपिल अल्कोहल का इस्तेमाल डिसइंफेक्टेंट्स, सेनेटाइजर जैसे
केमिकलों में होता है। ज़करबर्ग सैन फ़्रांसिस्को जनरल हॉस्पिटल में
पल्मोनोलॉजिस्ट जॉन बाम्स ने चेतावनी दी है कि सांस लेने के दौरान ब्लीच का धुआँ अगर आपके शरीर में चला जाए, तो भी वे स्वास्थ्य के लिए नुक़सानदेह होता है. उन्होंने ब्लूमबर्ग न्यूज़ को बताया, “अगर सांस लेने के क्रम में आप क्लोरीन ब्लीच ले लें, तो ये आपके लंग्स के लिए बहुत ख़तरनाक होता है. सांस लेने वाली नली और लंग्स ऐसे रोगाणुनाशकों की गंध तक को बर्दाश्त नहीं कर सकते. ब्लीज की हल्की मात्रा या आइसोप्रोपिल अल्कोहल शरीर के लिए एकदम सुरक्षित नहीं है. ये बेकार की बातें है . चिकित्सकों और लाइजॉल और डेटॉल बनाने वाली कंपनियों ने आगाह किया है कि रोगाणुनाशक का शरीर में प्रवेश खतरनाक है। यूएस सेंटर फ़ॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने अमरीकियों को क्लीनिंग प्रोडक्ट्स को लेकर सावधान रखने को कहा क्योंकि कोरोना महामारी के बीच घर में इस्तेमाल  कीटाणुनाशकों की
ख़रीद बढ़ गई है.अमरीकी फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी चेतावनी दे
कहा है- एफ़डीए को ऐसी रिपोर्टें मिली हैं, जिनमें लोग ऐसे प्रोडक्ट पीकर बीमार पड़ रहे हैं.लोगों को उल्टियाँ हो रही हैं, लोग डायरिया से पीड़ित हो रहे हैं, कई लोगों का ब्लड प्रेशर काफ़ी कम हो जा रहा है और कई लोगों के लिवर की बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं.

 राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को चुनौती देने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के
उम्मीदवार जो बाइडन ने ट्वीट किया- अल्ट्रावॉयलेट लाइट? रोगाणुनाशकों का इंजेक्शन? ये आइडिया है, ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट मिस्टर प्रेसिडेंट. अभी. साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षा उपकरण. बाद में ट्रंप ने कहा कि उन्होंने  डॉक्‍टरों को कोविड-19 के मरीजों के उपचार के लिए शरीर में टीके से जीवाणुनाशक पहुंचाने या पराबैंगनी किरणों, ताप के प्रयोग पर विचार करने के लिए जो कहा वो  दरअसल ‘व्यंग्य’ में कहा !

इससे पहले ट्रंप जी ने फरमाया था कि कोरोना वायरस  फ्लू नहीं अमेरिका पर हमला है. उन्होने व्हाइट हाउस  में अपनी डेली ब्रीफिंग में कहा, ‘ हम पर हमला हुआ.यह हमला था. यह कोई फ्लू नहीं था. कभी किसी ने ऐसा कुछ नहीं देखा, 1917 में ऐसा आखिरी बार हुआ था.’
वह कई हजार अरब डॉलर के पैकेजों के परिणामस्वरूप बढ़ते अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण के बारे में पूछे सवाल का जवाब दे रहे थे.उन्होंने कहा , ‘हमारे पास कोई विकल्प नहीं है.क्या है? मुझे हमेशा हर चीज की चिंता रहती है.हमें इस समस्या से पार पाना ही होगा.विश्व के इतिहास में हमारी अर्थव्यवस्था सबसे बढ रही है. चीन से बेहतर, किसी भी अन्य देश से बेहतर. हमने पिछले तीन साल में इसे खड़ा किया हमनें अपनी एयरलाइन्स बचा लीं. हमनें कई कम्पनियां बचा लीं. वायरस से निपटने की अक्रामक रणनीति रंग ला रही है ‘

इससे पहले ट्रंप जी ने मोदी जी पर दवाब डाल कर मलेरिया के उपचार में प्रयुक्त हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टेबलेट्स के भारत से निर्याय पर
प्रतिबंध हटवा लिया.चार अप्रैल को सुबह 0708 बजे मोदी जी ने ट्वीट किया,
“ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फ़ोन पर लंबी बात हुई. हमारी
बातचीत अछी रही.दोनों देश कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में पूरे दम-खम से एकबदूसरे का साथ देने राजी हुए.” मोदी जी ने ये नहीं बताया अमेरिका भारत से क्या मदद चाहता है.पर खुद ट्रंप जी ने इसका खुलसा कर दिया.उन्होने अमेरिकी मीडिया से कहा,“ मैंने भारत के प्रधानमंत्री मोदी से बात की है.भारत भारी मात्रा में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन बनाता है. फिलहाल उसने इस दवा के निर्यात पर रोक लगा दी है. भारत में ख़ुद इस दवा की बहुत ज़्यादा खपत है. उसकी आबादी भी ज़्यादा है.लेकिन हमने इस दवा के लिएबउन्हें अपना ऑर्डर भेज दिया है.उन्होंने भरोसा दिया है कि वो हमारे ऑर्डर पर विचार करेंगें.वो हमारे ऑर्डर को भेजते हैं तो मैं आभारी रहूंगा. मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने हमारेनअनुरोध को मंजूरी दी। वह बड़े दिल वाले हैं। हम इस मदद को हमेशा याद रखेंगे। चुनौतीपूर्ण समय में दोस्तों के बीच करीबी सहयोग की जरूरत होती है। हम हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पर फैसले के लिए भारत का धन्यवाद करते हैं। हम इसे कभी नहीं भूलेंगे।प्रधानमंत्री मोदी का शुक्रिया बोलते हुए कहा कि उनके मजबूत नेतृत्व से न सिर्फ भारत को बल्कि इस चुनौती से लड़ रही मानवता को मदद मिलेगी।

इससे पहले ट्रंप जी ने मीडिया को संबोधित कर कहा था कि अगर भारत
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा सप्लाई करता है तो ठीक, वरना हम जवाबी
कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत  एंटी मलेरिया दवा सप्लाई नहीं
करता है तो हम जवाबी कार्रवाई करेंगे। आखिर हम इसका जवाब क्यों नहीं
देंगे।

 भारत सरकार के वाणिज्य एवं व्यापार मंत्रालय के मातहत डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड ने 25 मार्च 2020 को इस दवा के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का सर्कुलर जारी कर कहा था कि विशेष परिस्थिति (एसईज़ेड यानि विशेष आर्थिक क्षेत्र  और जहां पूरी पेमेंट ली जा चुकी हो) में ही इसके निर्यात की इजाजत मिल सकती है. इस सर्कुलर में 4 अप्रैल को संशोधन कर नया सर्कुलर जारी कर कहा गया कि इस दवा के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी है.किसी भी परिस्थिति में इसे बाहर निर्यात नहीं किया जा सकेगा. भारत में इस दवा का इस्तेमाल आर्थेराइटिस(गठिया), मलेरिया और ल्यूपस बीमारी के उपचार में
किया जाता है.इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के डायरेक्टर जनरल बलराम भार्गव के अनुसार ‘ हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल सिर्फ़ हास्पिटल वर्कर कर सक्ते हैं जो कोविड-19 के मरीज़ों की देखभाल कर रहे हैं.या फिर अगर किसी के घर में कोई संक्रमित है तो उसकी देखभाल करने वाला ही इस दवा का इस्तेमाल करे ‘.आईसीएमआर ने 21 मार्च को प्रेस रिलीज़ में बताया कि नेशनल टास्क फोर्स कोविड-19 का गठन किया गया जिसके मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन दवा वही ले सकते हैं जो कोविड-19 के हाई रिस्क में हों. यानी सिर्फ वही अस्पतालकर्मी जो कोरोना वारयस से संक्रमित मरीज़ का इलाज कर रहे हों या जिनके घर कोई कोरोना पॉज़िटिव पाया गया हो तो उससे संपर्क में रहने वाले भी इस दवा का सेवन कर सकते हैं.ये दवा मान्यता प्राप्त डॉक्टर की प्रिस्किप्शन पर ही दी जाएगी.इस दवा का इस्तेमाल करने वाले को कोरोना के लक्षणों के अलावा कोई परेशानी होती है तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना होगा.

भारत में ये दवा पांच कंपनियां बनाती है जिनमें सिपला , आईपीसीए, इटास, वैलेस और जायडस कैडिला शामिल हैं. इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (आईडीएमए) के कार्यपालक निदेशक अशोक कुमार मदान के अनुसार भारत में अब तक इस दवा की सप्लाई में कोई कमी नहीं है.सरकार को जितनी दवा की ज़रूरत है उतनी हम सप्लाई कर रहे हैं. भारत ये दवा ज्यादातर अफ्रीकी देशों को निर्यात करता था.

पहले तीन बीमारियों के लिए इसका इस्तेमाल ज्यादा होता है, जिसे  ‘ ऑटो इम्यून ‘ बीमारियां कहते हैं. लेकिन कोरोना के संक्रमण से निपटने के लिए भी इस दवा का इस्तेमाल किया जाने लगा. राजस्थान में कोरोना के पॉजिटिव मरीज़ को ये दवा दी गई. वहा के सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज एवम  अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. सुधीर भंडारी के मुताबिक राजस्थान सरकार की तरफ से उन्हें ये दवाइयां मुहैया कराई गई. उन्होंने कोरोना मरीज़ों का इलाज करने वाले डाक्टरों और पौज़िटिव मरीज़ों को भी ये दवा दी और अब भारत में ये दवा इलाज का हिस्सा है.आने वाले दिनों में इसकी मांग बढ़ सकती है. अगर भारत खपत में अनुमानित बढोत्तरी से ज्यादा परिमाण मे ये दवा बना सकता है तभी उसे अमेरिका की मदद करनी चाहिए. इस दवा की डिमांड अचानक बढ़ गई है. उसे भारत में बनाने के लिए कुछ अवयव की घरेलू आपूर्ति हो जाती है और
कुछ चीन से आता है. मार्केट में पहले ये दवा थी पर अब ग़ायब सी है.

ट्रम्प ख़ुद आशंका जता चुके हैं कि कोरोना 2.5 लाख अमेरिकियों की बलि लिये बग़ैर नहीं मानने वाला। अमेरिका में इसी दिसम्बर में राष्ट्रपति
चुनाव होने हैं। शायद इसीलिए वो इसे ‘अमेरिका पर हमला’ बता रहे हैं।
ट्रम्प का इशारा चीन पर था। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र
कोरोना का ठीकरा चीन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्युएचओ) और डेमोक्रेटिकनपार्टी के अपने प्रतिद्वन्दी जोए बिडेन पर फोडा है। उन्होने डब्ल्युएचओनको अमेरिकी अंशदान रोक दी। उन्होने कहा  “चीन, पूर्व उपराष्ट्रपति जोएन बिडेन का समर्थन कर रहा है।यदि बिडेन जीत गये तो अमेरिका पर चीन का कब्ज़ा हो जाएगा।” ट्रम्प को कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली से  सहयोग मिला है। सभी दावा करते हैं कि चीन ने कोरोना को जैविक हथियार की तरह बनाया , वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से कोरोना लीक हो गया, चीन ने कोरोना का ब्यौरा दुनिया को नहीं दिया, चीन में अमेरिका से ज़्यादा मौत हुईं जिसे उसने छिपा लिया , चीनी कम्पनियों ने अपने सुरक्षा उपकरण , वैक्सीन, वेंटिलेटर, टेस्टिंग किट, मॉस्क आदि के व्यव साय को बढाने के लिए दुनिया को कोरोना की आग में झोंक दिया। अमेरिका और जर्मनी की निजी
कम्पनियों ने चीन से भारी-भरकम हर्ज़ाना माँग डाला। अमेरिकी राज्य मिसूरी ने चीन के ख़िलाफ़ मुक़दमा ठोकने की धमकी दी . चीन , नाटो देशों के निशाने पर है। लेकिन फ़्राँस ने कहा है कि कोरोना प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता। वुहान में इसका प्रगट होना सन्योग है.

ट्रम्प जी अमेरिकी जाँच दल को वुहान भेजने की बात कह चुके हैं। इस पर चीन ने कहा कि ‘हम दोषी नहीं, पीड़ित हैं। हमने ज़िम्‍मेदारी से काम किया.
लेकिन लगता नहीं कि ट्रम्प जी चीन से हार  मानने वाले हैं. प्रसिद्ध
समकालीन वैश्विक समाज के महान विचारकों में शामिल 91 वर्षीय प्रोफेसर नॉम चॉम्स्की कह चुके हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के भाषण से हिटलर की तरह की प्रतिध्वनि महसूस होती है। वह सामाजिक रूप से विकृत है ,  सोशिओपैथ है जिसे अपनी ही फ़िक्र होती है। कोरोना काल में ट्रंप की वैश्विक अगुवाई खतरनाक है।

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