गांवों की आत्मनिर्भरता पर जोर तो सही. पर कब , कैसे ?

-चंद्र प्रकाश झा।।

कोरोना प्रकोप से उत्पन्न  हालात के बीच प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने आज
वीडियो कॉन्फरेंसिंग के जरिये देश के पंचायती राज निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने सम्बोधन में स्वीकार किया कि इस प्रकोप ने हमें आत्मनिर्भर होने की सीख दी है , जिसे गांवों से आगे जिला , प्रांत और फिर राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाना होगा। मोदी जी बोले, ‘ गांव अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर बने, जिला अपने स्तर पर, राज्य अपने स्तर पर, और इसी तरह पूरा देश कैसे आत्मनिर्भर बने, अब ये बहुत आवश्यक हो गया है। कोरोना संकट ने दिखा दिया है कि देश के गांवों में रहने वाले लोग, इस दौरान उन्होंने अपने संस्कारों-अपनी परंपराओं की शिक्षा के दर्शन कराए हैं। गांवों से जो अपडेट आ रहा है, वो बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी प्रेरणा देने वाला है। आप सभी ने दुनिया को मंत्र दिया है-‘दो गज दूरी’ का, या कहें ‘दो गज देह की दूरी’ का। इस मंत्र के पालन पर गांवों में
बहुत ध्यान दिया जा रहा है। “

मीडिया दरबार के इस दैनिक स्तम्भ के 23 और 20 अप्रैल के अंकों में
हिन्दुस्तान के गांवो की आत्मनिर्भरता की ऐतिहासिकता को  इंगित कर
महात्मा गांधी के कथन के हवाले से कि ‘ भारत की आत्मा गाँवों में बसी हुई है ‘ इस बात पर जोर दिया गया था कि कोरोना से भी बचाने में मौजूदा हिन्दुस्तान के आबादी वाले करीब छह लाख  गांवों की भूमिका से शायद ही कोई इंकार कर सके। मोदी जी ने  पुष्टि कर दी कि भारत की 135 करोड़ की आबादी का 65 प्रतिशत गाँवों में हैं। मोदी जी ने यह भी कहा कि भारत के  गांव  ‘ सदियों से ‘ आत्मनिर्भर रहे। लेकिन उन्होंने इसका कोई जिक्र नहीं किया कि गांवों की ये आत्मनिर्भरता  कब और कैसे खत्म या कम हो गई।

मोदी जी  ने इस सम्बोधन में अपने मन की बात कही और सरकार द्वारा चयनित कुछ प्रतिनिधियों के लॉकडाउन के  संक्षिप्त अनुभव  सुने। किसी को कोई सवाल पूछने का मौक़ा नहीं मिला। बिहार , पंजाब , महाराष्ट्र आदि उत्तरी और कुछ दक्षिणी राज्यों के भी जिन  प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव बताये वे लॉकडाउन के सरकारी आदेश के अनुसरण में तोता रटंत बातें ही थीं. किसी ने भी लॉकडाउन के कारण  ग्रामीण क्षेत्रों के करोड़ों माइग्रेंट लेबर के बारे में कोई चर्चा नहीं की। कोरोना के उत्पात के बाद हिन्दुस्तान के उत्तरी राज्यों के माइग्रेंट लेबर का रिवर्स भागना शुरू हुआ। सरकार की अदूरदर्शिता के कारण  लोकडाउन की कोई तैयारी नहीं  थी।  मोदी जी ने इसे 25 मार्च को  रात 8 बजे घोषित करने के चार घंटे बाद ही लागू कर दिया। मोटे तौर पर अपने घरों से निकले मजदूरों की संख्या 40 करोड़ हैं

मोदी जी भी बीच बीच में उन प्रतिनिधियों को लॉक डाउन के दौरान लोगों के आपस में दो गज का शारीरिक फासला रखने की हिदायत देते रहे। मोदी ने ई-ग्राम स्वराज पोर्टल और मोबाइल एप लॉन्च किया। राज्यों में स्वामित्व योजना की शुरुआत की जो  पंचायतों का राजस्व विभाग और सर्वे आफ इंडिया द्वारा ड्रोन से सर्वे पर आधारित होगा।

इस मौके पर ढेर सारी हवा हवाई बातें बताई गई।  जैसे कि मोदी सरकार ने 14वें वित्त आयोग के माध्यम से ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाया है।
मोदी सरकार अनुदान राशि अब सीधे ग्राम पंचायतों के बैंक खातों में भेज रही है। मोदी राज में पंचायतों को दिए जाने वाले अनुदान में तीन गुनी बढ़ोतरी की गई है। पंचायतों को वर्ष 2010-15 के दौरान 65160.76 करोड़ रुपये का अनुदान मिला। वर्ष 2015-20 के दौरान पंचायतों का अनुदान बढ़कर 2,00,292.20 करोड़ रुपये हो गया। स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण इलाको में 10.28 करोड़ घरों में शौचालयों का निर्माण किया गया है।  ई-ग्राम स्वराज पोर्टल और मोबाइल एप पंचायती राज मंत्रालय की अनोखी पहल है। इससे
ग्राम पंचायतों को विकास योजना तैयार करने और उसे लागू करने के लिये एकल स्थान मिल जायेगा। 7 नवंबर, 2019 तक कुल 1.3 लाख ग्राम पंचायतों मे इंटरनेट और ब्रॉडबैंड कनेक्‍शन की सुविधा उपलब्‍ध कराई जा चुकी है। 45 हजार ग्राम पंचायतों में वाई-फाई हॉटस्पॉट स्थापित कर दिए गए हैं। भारत नेट योजना के तहत 21 अप्रैल, 2020 तक38 लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा गया है। मोदी सरकार ने 800 किलोमीटर प्रतिदिन ऑप्टिकल फाइबर बिछा कर रिकॉर्ड बनाया है। जहां वर्ष 2011 2014 के दौरान 358 किमी ऑप्टिकल फाइबर बिछाया गया, वहीं वर्ष 2014 –19  के दौरान 3,83,462 किमी ऑप्टिकल फाइबर बिछाया गया। जीपीडीपी के तहत जियो-टैगिंग के माध्यम से पंचायत की सभी संपत्तियों और निधियों का पोर्टल में ऑनलाइन डिस्प्ले , पंचायतों के व्यय और सभी लेनदेन के लिए पीएफएमएस का उपयोग , पंचायतों के कार्यों/गतिविधियों में गुणवत्ता नियंत्रण के साथ सामाजिक अंकेक्षण को मजबूत करना , राज्य, जिला, ब्लॉक और सामुदायिक स्तरों पर समीक्षा और निगरानी करना है।  ‘ग्राम मानचित्र’ एक स्थानिक योजना एप है। यह पंचायतों के लिए एक भू स्थानिक निर्णय समर्थन प्रणाली है। सवाल तो ये है गांव के लोगों की बदतर आर्थिक हालत में ठोस सुधार के लिए क्या किया जाएगा। पिछले अंकों में हम रेखांकित कर  चुके हैं कि केंद्र सरकार के ही सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) के सर्वे , स्टेट इंडिकेटर्स:होम कंज्यूमर एक्सपेंडिचर इन इंडिया  के के अनुसार उपभोक्ता खर्च में ग्रामीण भारत में 8.8 %प्रतिशत की गिरावट आई है। पिछले छह साल में देश के ग्रामीण हिस्सों में व्यक्तिगत खर्च में 8.8% की औसत गिरावट आई.गांव के लोगों ने दूध और दूध से बनने वाले उत्पादों को छोड़कर सारे सामानों की खरीद में कटौती की। लोगों ने तेल, नमक, चीनी और मसाले जैसी  वस्तुओं पर खर्च में बड़ी कमी की। ग्रामीण भारत में गैर-खाद्य वस्तुओं की खपत 7.6% कम हुई ग्रामीण भारत में 2017- 18 में भोजन पर मासिक खर्च औसतन 580 रुपये हुआ था जो 2011-12 में 643 रुपये के मुकाबले 10% कम है। जाहिर है मोदी सरकार हवाई आंकड़ों से
गांव के लोगों का मन बहला रही है.

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