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कश्मीर में मोदी के खिलाफ पुराने ट्वीट चर्चा में..

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-संजय कुमार सिंह||
नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ट्वीट करने वाले अधिकारी अब उनके समर्थक हैं और कश्मीर में जब फोटो पत्रकार पर फोटो पोस्ट करने के लिए कार्रवाई हो रही है तो पुराने ट्वीट और उन पर टिप्पणी के मामले नए सिरे से उभर आए हैं। एसपी ताहिर अशरफ ने मोदी के ट्वीट को सैडिस्टिक (किसी के दुख में खुश होने वाला), हिन्दुत्व टेरर (आतंक) और मोबोक्रेसी (भीड़तंत्र) कहा था। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि श्रीनगर के दो अधिकारियों के खिलाफ क्या सख्त कानून के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार घाटी के तीन पत्रकारों के खिलाफ मामला बनाने में अशरफ की मुख्य भूमिका रही है। तीन में से दो पत्रकार फ्रीलांसर हैं और इनके काम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हुए हैं। अब सोशल मीडिया पर पोस्ट के लिए उनके खिलाफ जो धाराएं लगाई गई हैं उसके तहत नागरिकों को आंतकवादी की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें एक पीरजादा आशिक द हिन्दू के संवाददाता है। उनपर फर्जी खबर फैलाने का आरोप है।


द टेलीग्राफ ने आज पहले पन्ने पर प्रकाशित अपनी एक खबर में लिखा है कि 2013 में नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब रायटर के एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया था कि क्या उन्हें हिंसा पर अफसोस है? इसपर मोदी ने कहा था : (अगर) कोई और गाड़ी चला रहा हो और हम पीछे बैठे हों तो पहिए के नीचे एक पिल्ला भी आ जाए तो यह तकलीफदेह होगा या नहीं? बेशक है। इसपर पुलिस अधिकारी ताहिर अशरफ का ट्वीट था, (अनूदित) “2002 के दंगे पर नरेन्द्र मोदी की पिल्ला एनलॉजी (पिल्ले से समानता) उनका असली चरित्र दिखाती है … सैडिस्टिक।” बुधवार को इसपर विवाद होने के बाद अशरफ ने ट्वीट को डिलीट कर दिया। 2014 में पोस्ट किए गए एक और ट्वीट में अशरफ ने लिखा था, राइज ऑफ हिन्दुत्व टेरर यूथ किल्ड इन पुणे (हिन्दुत्व के आतंक में वृद्धि पुणे में युवक मारा गया।


दूसरे पुलिस अधिकारी, श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर शाहिद इकबाल चौधरी ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानंमत्री बनने से कुछ ही पहले जनवरी 2014 में लिखा था, “मोबोक्रेसी इन द नेम ऑफ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र के नाम पर भीड़ तंत्र )!!! आपका अंदाज ही अलग है!!!” अखबार ने लिखा है कि इस पोस्ट का सही अर्थ अस्पष्ट है लेकिन इसका उल्लेख करने वाले कुछ लोगों ने लिखा है कि इसका मतलब दक्षिण पंथी हिन्दू से है। चौधरी इससे इनकार करते नहीं लगते हैं। पत्रकारों ने इन पर अधिकारियों से जानकारी चाही पर कोई जवाब नहीं मिला। राष्ट्रीय संवाददाताओं के व्हाट्सऐप्प समूह में पूछे गए सवाल पर घाटी के पुलिस प्रमुख विजय कुमार शांत रहे। कुमार इसके भाग हैं। उनसे पूछा गया था कि अशरफ या चौधरी के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी कि नहीं। चौधरी के पुराने ट्वीट ढूंढ निकालने में “डिजाइन” (साजिश) नजर आया। उन्होंने ट्वीट किया (अनूदित), “पुराने ट्वीट खोद निकालने के पीछे का कारण सबको पता है। अपने मित्रों को बताना चाहता हूं : हमलोग इससे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। इसलिए आगे कोई जवाब नहीं दूंगा। इस बीच मैं अपने विचारों पर कायम हूं : भीड़तंत्र / लिंचिंग हमेशा खराब है। तब/अब, वहां /यहां का कोई सवाल नहीं है।”
अशरफ के 2013 के ट्वीट पर पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने भी चुटकी ली। उन्होंने ट्वीट किया, “मैं सिर्फ यह उम्मीद करता हूं कि देश के किसी अन्य हिस्से में जम्मू कश्मीर पुलिस के साइबर सेल के अधिकारी जैसे उनके भंयकर सहयोगी हमारे प्रिय नेता को ‘सैडिस्टिक’ कहने की इस ‘आपत्तिजनक’ सामग्री के लिए उनके खिलाफ एफआईआर न करें दें।” अब मैं चाहूंगा कि साइबर सेल के मुखिया पुलिस अधिकारी को यह पता रहे कि ट्वीट डिलीट करने से मामला खत्म नहीं हो जाता है।” हालांकि, कुछ लोगों ने पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों की प्रशंसा भी की। इनमें फिल्म निर्माता अशोक पंडित भी हैं। वैसे, पंडित ने एक समय जम्मू कश्मीर की पुलिस को टेरोरिस्ट फोर्स घोषित कर दिया था। कुछ लोगों ने बुधवार को पूछा कि इसके लिए पंडित के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए कि नहीं। इन दिनों वे अलग भूमिका में हैं।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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