आर्थिक बदहाली: का होत हरिभजन जब ओट्न लगे कपास..

-चंद्र प्रकाश झा।।

कोरोना वयरस के विश्व्यापी प्रकोप के मद्देनज़र अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
(आईएमएफ) ने एक टास्क फोर्स का गठन किया  जिसमें भारतीय रिज़र्व बैक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी हैं. इसका उद्देश्य कोरोना प्रकोप सेे लगातार बिगड़ती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के उपाय बताना है.आज सुबह उड़ती पुड़ती खबर मिली कि इसने राजन की अधयक्षता में एक वेबिनार में लम्बे चौड़े दस्तावेज जारी किये जिसके कई चैप्टर हैं. जानकार हल्कों के मुताबिक़ खुद राजन ने इसे फेक खबर बताया।

काबिल आर्थिक विशेषज्ञ माने जाने वाले राजन पहले भी आईएमएफ में काम कर चुके हैं. जब उन्हे संकेत मिले कि मोदी सरकार उनको आरबीआई गवर्नर के रूप में दूसरा कार्यकाल नहीं देना चाह्ती है तो उन्होने खुद ही किनाराकसी कर ली . हम टास्क फोर्स की तो नहीं लेकिन आईएमएफ के आधिकारिक वेबसाइट पर कोरोना से उत्पन्न आर्थिक -वित्तीय हालात को  मथ कर बाद में  डिस्पैच देंगे।  लेकिन पहले कुछ अन्य एजेंसियों की आधिकारिक रिपोर्ट के हवाले से एक  तथ्यपत्रक  पेश है ।

संयुक्त राष्ट्र कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवेलपमेंट (अंकटाड) की एक
रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि कोरोना वायरस से प्रभावित देशो में भारत
और चीन समेत 15 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी शामिल हैं. चीन में औधोगिक उत्पादन में गिरावट का असर अन्य देशो के अलावा भारत पर भी पड़ा. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को क़रीब 34.8 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक़सान होने का फौरी आंकलन है। यूरोप के ओर्गेनाइजेशन ऑफ ईकोनौमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी ) ने 2020-21 में भारत के आर्थिक विकास में वृद्धि की दर पूर्वानुमान 6.2 % से 1.1 % प्रतिशत घटा दिया। ये बदला अनुमान मार्च 2020  के तीसरे हफ्ते तक का था जिसके अब और भी नीचे जाने का खतरा है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट कोरोना प्रकोप के बहुत  पहले 2016 की नोटबन्दी से आने लगी थी जो 2017 ख़तम होते -होते मंदी में बदल गई. इस स्तम्भ्कार की जनवरी 2020 में आई किताब, “ न्यु इडिया में मंदी “ ( फोटो संलग्न ) में उसका पूरा जिक्र है. मीडिया दरबार ने उसके अंश प्रकाशित किये जो पाठकगण इस पोर्टल पर खंगाल सकते हैं. ऑटोमोबाइल, रियल स्टेट, बडे , मंझोले और लघु उद्योग में भी मंदी घुस गई. बैंको की गैर-उत्पादक परिसम्पत्ति (एनपीए) की समस्या ने विकराल रूप धर लिया और पंजाब महाराष्ट्र कोओपरेटिव ( पी एमसी)  बैंक , यस बैंक समेत कुछेक बैंक डूब गये. एलआईसी में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचने लगी. कई बैंक मिलाकर एक किये गए।  लेकिन नतीजा वही निकला ढाक के तीन पात।

मोदी सरकार ये मानने से इंकार करती रही कि कोई मंदी है.अब उसे मंदी के कारण बताने कोरोना का बहाना मिल गया है जो हास्यास्पद है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी, ‘ स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ‘ ने लॉक डाउन शुरु होने के उपरांत मार्च के अंतिम सप्ताह में नये वित्तीय वर्ष में भारत के सकल
घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर के अनुमान को 6.5% से घटाकर 5.2 % कर दिया.स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र को कोरोना से क़रीब 620 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो सकता है।

जानकार मानते है कि भारत में  लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र पर पडा है जो देश की जीडीपी में सबसे ज्यादा 50 प्रतिशत का योगदान देता है। जब चीन , अमेरिका जैसे बड़े देश की भी अर्थव्यवस्थाएं भी कोरोना के सामने लाचार हैं तो भारत की बिसात क्या है। भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से  कृषि आधारित है।  लेकिन हमारी सरकारो ने पाश्चात्य औद्योगीकरण की मूर्खतापूर्ण नकल में इसकी लगातार उपेक्षा की.
कोरोना के बाद अगर मानसून की वर्षा कमजोर पडती है तो भारत की
अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठने से कोई नहीं रोक सकेगा .

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