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गांव ही बचाएंगे हमें कोरोना से लेकिन..

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-चंद्र प्रकाश झा ||

महात्मा  गांधी का कथन यूं ही नहीं है कि ‘ भारत की आत्मा गाँवों में बसी हुई है ‘. किसी कवि की भी एक पंक्ति है-  अपना हिन्दुस्तान कहाँ, यह बसा हमारे गाँवों में। अन्य देशों की बात न भी करें तो ये सत्य है कि भारत की पांच हज़ार वर्ष से अधिक पुरानी सभ्यता को हमेशा से गांवों ने ही बचाया है। कोरोना से भी बचाने में मौजूदा हिन्दुस्तान के आबादी वाले करीब छह लाख  गांवों की भूमिका से शायद ही कोई इंकार कर सके। भारत की 2011 की पिछली जनगणना में औसत वार्षिक वृद्धि के अनुसार 2018 में इसकी आबादी 135 करोड़ थी जिसका करीब 65 प्रतिशत गाँवों में हैं।

एन्थ्रोपोलोजी का तथ्य है कि आदि -मनुष्य का जीवन जंगल में प्रारम्भ हुआ और उसने अपनी सभ्यता की नींव प्रकृति प्रदत्त गांव को बसा कर ही रखी। फिर गाँव से सभ्यता नगरों को बसाने की तरफ बढ़ी। नगरों की बसाहट प्रकृति प्रदत्त नहीं बल्कि मानव की कृतिमता प्रदत्त है। महात्मा गाँधी , कृत्रिमता के नहीं प्राकृतिकता के पक्षधर  थे। इसलिए उन्होंने गाँवों की दशा सुधारने के लिए ग्रामीण योजनाओं पर  बल दिया था। लेकिन भारत के उपनिवेश काल  में ब्रिटिश राज ने कृषि पर ध्यान देने के बजाय पूंजीपति वर्ग के मुनाफा के लिए  उद्योगों पर जोर दिया। कृषि और ग्रामीण कुटीर की दशा लगातार बिगड़ती चली गई। आजादी के बाद भी हमारी सरकारों ने कुल मिला कर पूजीवादी नीतियों का ही अनुसरण किया। गांवों में समुचित शिक्षा  में कमी के कारण से बेरोजगारी बढ़ी। अपने गांवों से  रोजी रोटी के लिए बाहर निकले करोड़ों लोगों में माइग्रेंट लेबर भी बड़ी संख्या में हैं जिनके वापस लौटते और फिर अपने गांवों से बाहर जाने का क्रम मुख्यतः फसल सत्र के अनुसार चलता रहता है।

कोरोना के उत्पात के बाद हिन्दुस्तान के उत्तरी राज्यों के माइग्रेंट लेबर का रिवर्स भागना शुरू हुआ।ये माइग्रेंट लेबर मुख्यतः बिहार , झारखंड ,ओड़िसा,पश्चिम बंगाल , छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश ,उत्तर प्रदेश और राजस्थान के हैं जो देश के हर हिस्से में मज़दूरी करने जाते हैं.वे करीब 30 बरस से दिल्ली -एनसीआर क्षेत्र,पंजाब और हरियाणा में केंद्रित हैं। माइग्रेंट मजदूरों के मुम्बई , पुणे, गोवा, बंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता से भी बड़ी संख्या में  पैदल अपने गाँवों की ओर निकल पड़ने का सिलसिला  शुरू हुआ। भोपाल, नागपुर, रायपुर,इंदौर, सूरत, अमदाबाद आदि शहरों से भी मज़दूरों बाहर निकले। ये मजदूर ग्रीन रिवोल्यूशन के बाद से इन राज्यों से अपने घरों से करोड़ों की संख्या में बाहर निकले हुए हैं.दिल्ली -एनसीआर इस मास एकजोडस का एपिसेंटर है. भारत में इस समस्या ने मोदी सरकार की अदूरदर्शिता के कारण विकराल रूप धारण कर लिया जिसने लोकडाउन की कोई तैयारी नहीं की थी।  मोदी जी ने इसे 25 मार्च को  रात 8 बजे घोषित करने के चार घंटे बाद ही लागू कर दिया। 

ऐसा नहीं कि माइग्रेंट लेबर की समस्या सिर्फ भारत में उभरी। इटली जैसे विकसित देशों के अलावा थाईलैंड, म्यांमार,कम्बोडिया, मलेशिया , सिंगापुर , दक्षिण अप्रीका , नामीबिया , बोत्स्वाना आदि विकासशील देशों और खाड़ी के देशों  में भी ये समस्या उभरी। लॉक डाउन उपरान्त  इटली के लोम्बार्डी से आखरी ट्रेन पकड़ कर हज़ारों लोग अन्य  भागों की तरफ निकल गए। चीन के वूहान शहर से भी पांच लाख मजदूर बाहर निकले थे। वुहान से जो लाखों और लोग चीनी नव  वर्ष के उपलक्ष्य में 10 दिन के उत्सव के लिए बाहर निकले थे वे कोरोना उत्पात प्रगट होने के बाद उनका अवकाश बढ़ाने और फिर लॉक डाउन लागू किये जाने के बाद वापस नहीं  लौटे। दुनिया भर में सर्वाधिक माइग्रेंट लेबर चीन में ही बताये जाते हैं जहां 1980 के दशक में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जोर पकड़ने के बाद औद्योगिक निर्माण आदि के कई केंद्र विकसित हुए हैं।अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने आगाह किया था कि कोरोना के कारण विश्व में करीब ढाई करोड़ नौकरियां प्रभावित होंगी। वास्तविक आंकड़ा निश्चित रूप से बहुत ज़्यादा है।

भारत में 40 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में  कार्यतर हैं. लाखों लोग लॉकडाऊन की वजह से एक झटके में बेरोज़गार हो गये।  पलायन तो होना ही था. ध्यान देने की बात है कि ये माइग्रेंट लेबर सामान्य अर्थ में भागे – भगाये नहीं गए बल्कि अपनी  मर्जी से अपने घर लौट जाने सड़कों पर आए। माइग्रेंट लेबर के  लिए प्रवासी मजदूर सटीक  शब्द नहीं है।  मोटे तौर पर अपने घरों से निकले मजदूरों की संख्या हिंदुस्तान की आबादी की आधी हो सकती है . 2011 की  जनगणना के अनुसार एक दशक में 13.9 करोड़ लोग देश में ही एक स्थान से दूसरे स्थान गये थे।  इनमें दस फीसदी अर्थात 1.4 करोड़ रोज़गार के लिये गये थे। इसमें पिछले दस सालों का माइग्रेशन  शामिल नहीं है।लेकिन  जनगणना के आंकड़े बताते कम छुपाते ज्यादा लगते हैं. 2011 में ही 40 करोड़ से ज्यादा लोग माइग्रेंट हैंड थे। द हिन्दू की यह रिपोर्ट कुछ खुलासा करती है <https://www.thehindu.com/data/45.36-crore-Indians-are-internal-migrants/article16748716.ece.>

केंद्र सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के मातहत नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) के एक सर्वे , स्टेट इंडिकेटर्स:होम कंज्यूमर एक्सपेंडिचर इन इंडिया  शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार भारत में,खासकर ग्रामीण भाग में खपत और मांग बहुत घट गई है. 2017- 2018 में उपभोक्ता खर्च में राष्ट्रीय स्तर पर 3.7% और ग्रामीण भारत में 8.8 %प्रतिशत की गिरावट आई.  एनएसओ सर्वे के मुताबिक 2017-18 में देशवासियों का व्यक्तिगत औसत मासिक खर्च घटकर 1,446 रुपये हो गया जो 2011-12 में 1,501 रुपये था। यह 3.7% की गिरावट है। यह सर्वे जुलाई 2017 और जून 2018 के बीच किया गया । इसमें पाया गया कि पिछले छह साल में देश के ग्रामीण हिस्सों में व्यक्तिगत खर्च में 8.8% की औसत गिरावट आई जबकि शहरी क्षेत्रों में 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सर्वे से पता चला कि गांव के लोगों ने दूध और दूध से बनने वाले उत्पादों को छोड़कर सारे सामानों की खरीद में कटौती की। लोगों ने तेल, नमक, चीनी और मसाले जैसी  वस्तुओं पर खर्च में बड़ी कमी की। गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च के आंकड़े मिलेजुले आए हैं। ग्रामीण भारत में गैर-खाद्य वस्तुओं की खपत 7.6% कम हुई जबकि शहरी इलाकों में 3.8% की वृद्धि देखी गई।ग्रामीण भारत में 2017- 18 में भोजन पर मासिक खर्च औसतन 580 रुपये हुआ था जो 2011-12 में 643 रुपये के मुकाबले 10% कम है। शहरी क्षेत्र में इस मद में मामूली बढ़त देखी गई। शहरी क्षेत्र में 2011-12 में लोगों ने 946 रुपये प्रति माह का औसत खर्च किया था जो 2017-18 में महज 3 रुपये बढ़कर 946 रुपये हुआ। पूर्ववर्ती योजना आयोग के सदस्य रहे अभिजीत सेन के मुताबिक गांवों में भोजन पर कम खर्च का मतलब है कि वहां गरीबी में बड़ा इजाफा हुआ है और कुपोषण बढ़ेगा।

पिछ्ला आर्थिक  नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वालों में शामिल अभिजीत बनर्जी ने भी भारत में घरेलु खपत में गिरावट के आंकड़ों के हवाले से कहा कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही खराब है। बनर्जी भारतीय मूल के हैं और उन्होंने नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की स्नातकोत्तर और आगे की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने उनके साथ ही यह पुरस्कार प्राप्त करने वाली अपनी
पत्नी ईस्थर डूफ्लो के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि खतरे की स्पष्ट घंटी बज चुकी है। उन्होंने शहरी एवं ग्रामीण भारत में औसत उपभोग में भारी गिरावट के एनएसएस के 1914-15 और बाद के आंकड़ों के हवाले से कहा कि ऐसा बहुत ही बरसों बाद हुआ है।

About Post Author

चन्द्र प्रकाश झा

सीपी नाम से ज्यादा ज्ञात पत्रकार-लेखक फिलवक्त अपने गांव के आधार केंद्र से विभिन्न समाचारपत्र, पत्रिकाओं के लिए और सोशल मीडिया पर नियमित रूप से लिखते हैं.उन्होंने हाल में न्यू इंडिया में चुनाव, आज़ादी के मायने ,सुमन के किस्से और न्यू इंडिया में मंदी समेत कई ई-बुक लिखी हैं, जो प्रकाशक नोटनल के वेब पोर्टल http://NotNul.com पर उपलध हैं.लेखक से [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.
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