जिसको ईश्वर ने ही धिक्कार रखा है, उस बेघर मजदूर को सरकार भी धिक्कारे तो हैरानी कैसी?

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-सुनील कुमार।।
पहले गुजरात के तीर्थयात्रियों की खबर आई थी, कि उत्तराखंड के हरिद्वार में फंसे 1800 तीर्थयात्रियों को गुजरात भेजने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री ने राज्य के भाजपा-मुख्यमंत्री को फोन किया, और वहां से आरामदेह बसों में लोगों को वापिस गुजरात भेजा गया। फिर एक खबर आई कि दक्षिण के एक भाजपा संसद की दखल से दक्षिण के हजारों तीर्थयात्रियों को उत्तर भारत से वापिस रवाना किया गया। फिर कल खबर आई कि राजस्थान के कोटा में मंहगी कोचिंग ले रहे उत्तरप्रदेश के 3000 छात्रों को वापिस लेने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बसें भेजी हैं। अब आज की खबर है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र सरकार से इजाजत मांगी है कि इस राज्य के कोटा में पढ़ रहे छात्रों को वापिस लाने की छूट दी जाए। इस बीच खबर आ रही है कि देश के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई है कि देश भर में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों को वापिस उनके गांव पहुंचने का आदेश सरकार को दिया जाये।

यह फैसला चाहे किसी राज्य का हो, किसी पार्टी की सरकार का हो, हम इसके सख्त खिलाफ हैं। आज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तो करोड़ों मजदूरों की जिंदगी की जिम्मेदारी से पूरी तरह हाथ झाड़ लिए हैं। एक माफी माँगी प्रधानमंत्री ने, और रास्तों में फंसे करोड़ों मजदूरों ने उसे एक वक्त भूनकर खा लिया, माफी से उनका एक वक्त का पेट भर गया। कुछ की भूख कम रही होगी तो दो वक्त का पेट भी भर गया होगा। लेकिन उसके बाद ? तीन हफ्तों के लॉकडाउन के बाद फिर तीन हफ्तों का अगला लॉकडाउन! एक माफी को कोई कितने दिन तक खाये? और फिर मानो माफी की सब्जी में मिर्च और नमक डालने की जरूरत थी, राज्य अपने-अपने इलाकों के सम्पन्न लोगों को निकालकर ले जा रहे हैं! योगी आदित्यनाथ कोटा में महंगी कोचिंग ले रहे बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, जो कि वहां पर हॉस्टलों में हैं, या किराए के मकानों में हैं, जिनके पास खाने के पैसे हैं, जिनके पास एटीएम कार्ड हैं, फोन हैं, रहने की जगह है! और जो मजदूर राज्यों की नाकामी के चलते दूसरे राज्यों में काम पर जाने को मजबूर होते हैं, उनके लिए क्या? उनके लिए धिक्कार-दुत्कार और खुले आसमान तले भूखी मौत? ऐसी भूखी मौत की बद्दुआ तो जिसको लगनी होगी लगेगी ही, लेकिन मौत से पहले भी पल-पल इनकी बद्दुआ किसी न किसी को लग ही रही होगी।

हमारा तो मानना है कि सम्पन्नता के पैमानों पर इतने ऊपर के लोगों को सरकारी साधनों, और जांच-इलाज की प्राथमिकता देना एक जुर्म है। जिस मोदी सरकार ने दूसरे देशों में बसे हिन्दुस्तानियों को देश लाने के लिए हवाई जहाज भेजे, उसने देसी मजदूरों को आस-पास के लोगों की भीख पर जि़ंदा रहने को मजबूर करके छोड़ दिया? आज करोड़ों मजदूर देश भर में जगह जगह फंसे हैं, उनके साथ औरत-बच्चे भी हैं, और जरा दूरी पर खड़ी टकटकी लगाए देखती मौत है। खुद छत्तीसगढ़ सरकार के रोज के जारी किए हुए आंकड़े बता रहे हैं कि किस राज्य में कितने हजार लोगों को छत्तीसगढ़ सरकार वहां अनाज दिलवा रही है, मदद कर रही है। ऐसे बेघर गरीब लोगों की गिनती लाखों में होगी। लेकिन जब इनको लाने के कोई इंतजाम नहीं हैं, तो फिर राजस्थान कोटा के कमरों में महफूज़ बच्चों को लाने की मशक्कत क्यों? हैरानी यह है कि जिस प्रशांत भूषण को चुनाव नहीं लडऩा है वह तो गरीबों की बात कर रहे हैं, और जो नेता आम, गरीब जनता के वोटों से चुनाव जीतते हैं, वे संपन्न तीर्थयात्रियों की, महंगी कोचिंग के बच्चों की फिक्र कर रहे हैं। क्या चुनावी-वोटों के लिए भी अब गरीब वोटों की दरकार नहीं रह गई है? क्या कोई प्रवासी मजदूर वोट के दिन भी दूसरे राज्य में ही मजदूरी करते रहते हैं ?

आज देश में वैसे भी संपन्न और विपन्न, घरवालों और बेघर के बीच सामाजिक दूरी हो चुकी है। कोरोना के पहले भी, और कोरोना के बाद तो और भी अधिक। अब लोग खुद कोरोनाग्रस्त रहते हुए अपने नौकरों को पुलिस के हवाले कर रहे हैं। देश की किसी सरकार को यह हक भी नहीं है कि अपने सीमित साधन-सुविधाओं का इस्तेमाल बेबसों को किनारे धकियाकर सम्पन्नों को बचाने पर लगाए। लोगों को वापिस लाने के बाद उनकी मेडिकल जांच और इलाज की भी तो जिम्मेदारी आएगी, उनको क्वारंटाइन सेंटरों में रखने की बात भी आएगी। क्या सब पर सम्पन्नों का ही हक रहेगा? देश में आरक्षण के विरोधी ‘कोटा’ को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, अब सरकारें एक सम्पन्नता-कोटा लागू कर रही हैं !

जिस उत्तरप्रदेश की 3सौ बसों की कोटा जाने की तस्वीरें कल से तैर रही हैं, उसी उत्तरप्रदेश के बगल के बिहार के एनडीए मुख्यमंत्री, और भाजपा के भागीदार नीतीश कुमार का एक बयान अभी सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा- ‘कोटा में पढऩे वाले छात्र संपन्न परिवार के आते हैं अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों के साथ रहते हैं। फिर उन्हें क्या दिक्कत है? जो गरीब अपने परिवार से दूर बिहार के बाहर हैं, फिर तो उन्हें भी बुलाना चाहिए।’
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 18 अप्रैल 2020)

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