/* */

जरूरी चीजों के बाजारों पर गैरजरूरी रोक से पैदा खतरे..

Page Visited: 26
0 0
Read Time:5 Minute, 42 Second

-सुनील कुमार।।
पूरे हिंदुस्तान में लॉकडाउन का अभी आधा वक्त गुजरा है और उन लोगों को भी दिक्कतें होने लगी हैं जिनके सर पर छत है, और घर पर महीने-पखवाड़े का खाना है। इन लोगों के पास अगले कुछ या कई महीनों के लिए जिंदगी की गारंटी भी है। हम उन लोगों के बारे में तो इसी जगह लगातार लिखते आ रहे हैं जो बेघर हैं, भूखे हैं, प्रदेशों की सरहदों पर अटके हुए हैं, सामने अगले खाने की भी कोई गारंटी नहीं है। कल मुंबई के एक कमरे में रह रहे बिहार के दर्जनों मजदूरों का एक वीडियो आया है जिसमें वे बता रहे हैं कि किस तरह बिना खाए हुए वे एक-एक कमरे में 50 -50 लोग जी रहे हैं, और कोरोना जैसे संक्रमण से बचने का शारीरिक दूरी का कोई रास्ता ऐसे में उनके पास नहीं है। लेकिन इनके बारे में कल और आगे फिर से, आज हम उन शहरों के बारे में बात करना चाहते हैं जहां की आबादी के पास खरीदने-खाने को है, और जिनकी भीड़, या लंबी कतारें दुकानों पर लग रही हैं।

पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ के शहरों में कई किस्म के प्रयोग देखे जा रहे हैं। जिले के अफसर तय करते हैं कि भीड़ लगने से कैसे रोका जाए ताकि कोरोना को शारीरिक संपर्कों से सफर करने ना मिले। इसके लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली तरकीब दुकानों को कुछ ही घंटों के लिए खोलना है। राजधानी रायपुर में अभी तीन दिनों का एक अघोषित कफ्र्यू सा कहा जा रहा है, वह चल रहा है। सड़कों पर रोका जा रहा है, दुकानों, और सुपरबाजारों पर लोग बीते कल टूट पड़े क्योंकि तीन दिन सब बंद रहने की मुनादी की गई थी। आज जिलों में तैनात अफसरों ने कभी किसी महामारी के दौरान इंतजाम देखा नहीं है क्योंकि ऐसी जरूरत वाली महामारी सौ बरस पहले आई थी। अफसर इसे कफ्र्यू की भाषा में देख रहे हैं, और कफ्र्यू की तरह लागू कर रहे हैं। नतीजा यह है कि गिनी-चुनी दुकानों के गिने-चुने घंटों में लोग टूटे पड़ रहे हैं। इस पूरी मशक्कत का पूरा मकसद ही खत्म हो जा रहा है। कफ्र्यू की जरूरत आम तौर पर किसी सांप्रदायिक दंगे के वक्त आती है, जब पुलिस को खतरा लगता है कि लोग घरों के बाहर निकलते ही हिंसा करेंगे। अभी तो ऐसा कोई खतरा है नहीं। अभी तो जरूरी सामानों के सारे बाजारों को एक साथ खोल दिया जाये तो भीड़ ख़त्म हो जाएगी। आज खतरा भीड़ का है जो कि पुलिस दुकानों पर, सब्जी बाजारों पर नहीं रोक पा रही है। शहर में गिने-चुने सब्जी बाजारों को इजाजत देने का मतलब ही भीड़ इक_ी होने देना है। शहर के सौ-दो सौ स्कूल-कॉलेज के अहातों में सब्जी बाजार की छूट दे दी जाये तो सारी धक्का-मुक्की खत्म हो जाये।

दिक्कत यह है कि जिसका जो हुनर होता है, उसे उसी में इलाज दिखता है। पुलिस और प्रशासन को प्रतिबंध, रोक, बलप्रयोग ही समझ पड़ता है, इसलिए वे किसी भी दिक्कत में उसी का इस्तेमाल करते हैं। और विकसित देशों में म्युनिसिपल इन बातों को तय करती है, तो हमारे इधर के राज्यों में अधिकतर शहरों में म्युनिसिपल की दिलचस्पी महज कंस्ट्रक्शन और खरीदी में रहती है। नतीजा यह है कि किसी सांप्रदायिक दंगे वे वक्त के इंतजाम को महामारी की नौबत में लागू किया जा रहा है। पिछले सौ बरस में कभी किसी महामारी के इंतजाम में रोक-टोक लगी नहीं थी, कम से कम हिंदुस्तान के इस इलाके में।

अफसरों को कम से कम रोक-टोक से रोज की जिंदगी चलने देनी चाहिए, खासकर जिन बातों के लिए भीड़ लग रही है, उन बातों पर से रोक तुरंत हटा देनी चाहिए। बड़ी अजीब बात है कि लोगों को किराने के लिए जूझना पड़ रहा है, लेकिन सस्ती-महंगी, हर किस्म की शराब आसानी से मिल रही है। बड़ी-बड़ी होटलों के वीडियो हवा में तैर रहे हैं कि किस तरह लोग जा रहे हैं और दारू खरीद रहे हैं। प्रशासन और पुलिस के अफसरों को शहरी बसाहट के जानकार लोगों से राय लेकर बाजार का इंतजाम करना चाहिए, क्योंकि वहीं पर हुई गलती आज बीमारी फैला सकती है। अभी लॉकडाउन पता नहीं और कितने हफ्ते चले, लेकिन जरूरी चीजों के बाजार पर गैरजरूरी रोक से नुकसान छोड़ कुछ नहीं हो रहा।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 17 अप्रैल 2020)

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram