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कहां हैं अखबार और चैनल वाले.?

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-संजय कुमार सिंह।।


फेसबुक पर ग्रेटर नोएडा निवासी किन्ही मृत्युंजय शर्मा की एक पोस्ट खूब शेयर हो रही है। यह पोस्ट बताती है कि नोएडा में किसी को कोरोना होने का शक हो तो क्या होता है। उसे किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा उसका भोगा हुआ यथार्थ है। मुझे नहीं पता सही है या गलत और सही है तो कितना सही और गलत है तो कितना।
मैं पोस्ट में उल्लिखत तथ्यों की बात नहीं करता। मेरा सवाल मीडिया है, मीडिया के लोगों और संगठनों के साथ उन लोगों से है जो मीडिया को सरकारी विज्ञापन दिए जाने के पक्ष में हैं और चाहते हैं कि मीडिया में काम कर रहे लोगों की नौकरी न जाए। वह भी इसलिए कि हाल में टेलीविजन पर दिखा (मैंने क्लिप ही देखा है) कि नोएडा के डीएम को मुख्यमंत्री ने कहा कि बकवास बंद करो। और फिर उनने छुट्टी मांग ली और नोएडा में नए डीएम हैं।
नए डीएम के काम का मूल्यांकन वैसे भी होना चाहिए। अब एक उदाहरण है तो उस आलोक में यह और जरूरी है। वैसे भी अखबारों ने क्वारंटाइन सेंटर की हालत या क्वारंटाइन किए गए लोगों का अनुभव बताएं तो लोगों की जागरूकता बढ़ेगी। फिर यह काम कब तक हो जाएगा? क्या संबंधित व्यक्ति का फेसबुक पोस्ट लिखना (नाम परिचय के साथ) मीडिया में बिना नाम बताए शिकायत छपने से बेहतर नहीं होता? फिर भी उस आदमी ने फेसबुक पोस्ट लिखी है तो उसपर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए?
देश के ज्यादातर टीवी चैनल नोएडा से ही चलते हैं, कई अखबारों की प्रेस यहां हैं और कइयों के लाला संपादक यहां रहते हैं तब यह हाल क्यों है? यह सवाल प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया से लेकर एडिटर्स गिल्ड और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन से लेकर तमाम मीडिया और मीडिया वालों के संगठनों से है। पोस्ट में कहा गया है, सबसे पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि ये कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है, आप मेरे ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर देख सकते हैं कि मैं मोदी सरकार का समर्थक रहा हूं।
मेरा मानना है कि इसके

बाद आईटी सेल को भी सक्रिय हो जाना चाहिए। मामला सकाारात्मक न हो तो सामान्य स्थिति में ट्रोल भी सक्रिय हो जाते पर अब क्यों नहीं हो रहे हैं? इसमें आरोप लगाया गया है, अब मुझे लगता है कि मोदी सरकार केवल मेकओवर कर रही है और केवल मीडिया हाउस को खरीद कर, टीवी और सोशल मीडिया पर अपना ब्रांड बना कर कैंपेन कर लोगों को मिसलीड कर रही है। इसकी कहानी शुरू होती है, पिछले सोमवार से (तारीख नहीं लिखा है पर समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए)।

नोएडा के एक स्वघोषित भक्त ने कोरोना पॉजिटव होने के शक में जो भोगा
मैंने इसे छोटा करने के लिए महत्वपूर्ण आरोप के रूप में पेश किया है असल में कहानी बहुत लंबी है। लेखकने लिखा है कि उनने ही छोटी कर दी है

  1. कोरोना टेस्ट के लिए जितने भी प्राइवेट लैब की लिस्ट थी, मैंने कॉन्टेक्ट करने की कोशिश की लेकिन कांटेक्ट नहीं हो पाया. जहां हो पाया, उन्होंने मना कर दिया कि वो कोरोना का टेस्ट नहीं कर रहे हैं।
  2. सरकार की सेंट्रल हैल्पलाइन, स्टेट हैल्पलाइन और टोल फ्री नम्बर तीनों पर मैं, मेरा भाई और मेरी वाइफ, लगातार मिलाते रहे। एक घंटे बाद स्टेट हैल्पलाइन का नंबर मिला. रटा रटाया जवाब कि, आपको कल शाम तक फोन आ जाएगा, डिस्कनेक्ट करने की कोशिश की गई।
  3. डीएम, गौतमबुद्ध नगर को कॉल किया (ये बकवास करने वाले के बाद वाले हैं) उनके पीए से बात हुई. उनका कहना था कि हम क्या करें, हैल्थ डिपार्टमेंट का काम है आप सीएमओ से बात कर लो।
  4. डीएम के ऑफिस से सीएमओ का नम्बर नहीं मिला। डीएम के पीए ने कहा कि सीएमओ से बात कीजिए, नंबर नहीं है।
  5. सीएमो ने कहा, आप 108 पर एंबुलेंस को कॉल कर लो और एंबुलेंस को बोलना कि हमें कासना ले चलो। वहीं हमने कोरोनावायरस का आइसोलेशन वार्ड बनाया हुआ है।
  6. 108 पर कॉल मिला और फिर घंटे भर की जद्दोजहद के पास 108 के कॉलसेंटर पर बैठे व्यक्ति ने एक एंबुलेंस फाइनल करवाया। एंबुलेंस रात 10 बजे आई।
  7. देर रात होने के कारण पत्नी के साथ मुझे भी जाना पड़ा। उसी एम्बुलेंस से। आगे बढ़ने के बाद ड्राइवर ने कहा हम ग्रेटर नोएडा नहीं जा सकते, मुझे खाना भी है, चार दिन से खाना नहीं खाया है। वो हमें किसी गांव में ले गया, वहां से उसने अपना खाना और कपड़ा लिया और फिर वहां से दूसरा रूट लेते हुए हमें वो ग्रेटर नोएडा लेकर गया।
  8. वहां बुरा हाल था हम वापस आना चाहते थे पर कोई साधन नहीं था। वहां कहा गया, अगर आप आइसोलेट नहीं होना चाहते हैं तो कहीं बाहर रात गुजार लो सुबह देख लेना आप कैसे वापस जाओगे. यह लॉकडाउन की सिचुएशन है जिसमें कोई भी आने जाने का साधन सड़क पर नहीं मिलता है।
  9. अचानक से उन्होंने किसी को कॉल किया और उधर से किसी मैडम से उनकी बात हुई और उन्होंने फोन पर कहा कि नहीं हम हस्बैंड को (भी) नहीं जाने दे सकते क्योंकि वो भी एंबुलेंस में साथ में आए हैं।
  10. एंबुलेंस में हमें तीन और सस्पेक्ट्स के साथ बैठाया गया और इसके पूरे चांस थे कि अगर मुझे कोरोना नहीं भी होता और उन तीनों में से किसी को होता, तो मुझे और मेरी बीवी को भी कोरोना हो जाता।
  11. हम पांच लोगों को एक एबुंलेंस में वहां से दो तीन किलोमीटर दूर एससीएसटी हॉस्टल मे आइसोलेशन में ले जाया गया.
  12. सैंपलिंग होने के बाद भी ना कोई ट्रैकिंग नंबर दिया गया, ना मेरा कोई रिकॉर्ड मुझे दिया गया कि मैं कहां हूं मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी। इसके बाद मेरी वाइफ को लेडीज वार्ड भेज दिया गया और मुझे जेंट्स वार्ड।
  13. जेंट्स और लेडीज़ वॉशरूम कॉमन था। रूम में चारपाई पर बेडशीट की जगह एक पतला सा कपड़ा पड़ा हुआ था। दूसरा कपड़ा मुझे दिया गया और बोला गया कि आप पुराना बेडशीट हटा कर ये बिछा लेना।
  14. रात के एक बज रहे थे, जो खाना मिला वह खराब हो चुका था, मैं बिना खाए सो गया।
  15. सुबह फ्रेश होने के लिए साबुन नहीं मिला। सैनिटाइजेशन के नाम पर जीरो था वो आइसोलेशन सेंटर। चारों तरफ कूड़ा फैला पड़ा था।
  16. अगले दिन करीब 12 बजे मेरी बहस हो गई तो अपने लिक्विड सोप में से थोड़ा सा मुझे एक कप में दिया गया तब जाकर मैं फ्रेश हो पाया और खाना खाया।
  17. 48 घंटे के बाद पूछने पर कहा गया कि इतनी जल्दी नहीं आती है रिपोर्ट 3-4 दिन इंतजार करना होगा। वहां बाउंसर टाइप के कुछ लोग भी थे।
  18. वहां 80% लोग जमात और मरकज वाले और उनके संपर्क वाले लोग थे। उनका भी यही हाल था. उनकी भी रिपोर्ट नहीं बताई जा रही थी।
  19. 72 घंटे बाद पूछने पर कहा गया कि हमें नहीं पता होता है कि आपकी रिपोर्ट कब आएगी। हमें केवल इतना पता है कि आपको यहां से जाने नहीं देना है जब तक आपकी रिपोर्ट नहीं आ जाती है।
  20. मुझे लग रहा था कि उनके पास कोई इंफॉर्मेशन नहीं थी, कोई ट्रैकिंग की व्यवस्था नहीं थी। जो पहले आ रहा था वो बाद में जा रहा था, जो बाद में आ रहा था वो पहले जा रहा था।
  21. मैंने दोबारा डीएम के नंबर पर कॉल करना शुरू किया, वो स्विच ऑफ हो गया और आज तक वो नंबर बंद है, शायद नंबर बदल लिया है। फिर मैंने नोएडा के सीएमओ को कॉल करना शुरू किया, उन्होंने कॉल नहीं उठाया.
  22. मैंने मैसेज किया कि मेरी 15 महीने की बेटी है जो मदर फीड पर है और फिलहाल मेरे भाई के साथ अकेली है, मुझे आपसे मदद चाहिए। लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं आया।
  23. सीएमओ ने मेरा मैसेज पढ़ा और फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया। मैंने डिप्टी सीएमओ को कॉल किया लेकिन फोन नहीं उठा। मैंने काफी हाथ-पैर मारे, मेरा फ्रस्ट्रेशन बहुत बढ गया था।
  24. मेरी वाइफ का फोन आया कि लेडीज को कहीं शिफ्ट कर रहे हैं। मैं नीचे गया तो पता चला कि लेडीज को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर रहे हैं।
  25. मैंने वाइफ को अकेले भेजने पर एतराज किया। उन्होंने मुझे बाहर बुला लिया।
  26. बाहर मेरे हाथ में पर्ची पकड़ाई कि ये इस वार्ड से उस वार्ड में आपका ट्रांसफर स्लिप है। मैंने पर्ची को देखा तो उसमें पहली लाइन में लिखा दिखा, “मृत्युंजय कोविड -19 नेगेटिव”.
  27. इस पर मैंने उनसे कहा कि अरे जब मेरी रिपोर्ट आई हुई है तो आप मुझे दूसरे वॉर्ड में क्यों भेज रहे हो। इस पर उन्होंने मेरे हाथ से पर्ची ले ली और कहा कि शायद कोई गलती हो गई है। इतने गैरजिम्मेदार लोग हैं वहां पर।
  28. फिर उन्होंने बाहर आकर कहा कि हां आपकी रिपोर्ट आ गई है. नेगेटिव है. आपकी वाइफ की रिपोर्ट नहीं आई है. इन्हें जाना पड़ेगा. आप इस एंबुलेंस में बैठो, आपकी वाइफ दूसरी एंबुलेंस में बैठेंगी.
  29. वाइफ की सैंपलिंग पहले हुई थी मेरी रिपोर्ट आ गई लेकिन उनकी नहीं आई।
  30. मैंने एंबुलेंस रुकवा दी कि मैं बिना जानकारी के नहीं जाने दूंगा. फिर वो दो स्टाफ के साथ अंदर गए और फिर कुछ देर बाद बाहर आकर बताया कि हां आपकी वाइफ का भी नेगेटिव आया है.
    वहां कोई प्रोसेस, कोई सिस्टम नहीं है, जिसके जो मन आ रहा है वो किए जा रहा है। किसी को नहीं पता कि चल क्या रहा है। फिर उन्होंने कहा कि आप दोनों अब घर जा सकते हो। वापस आते हुए भी एंबुलेंस में पांच और लोग साथ में थे। वहां हाइजीन की खराब स्थिति के कारण पूरे चांस हैं कि अगर आपको कोरोना नहीं भी है आइसोलेशन वार्ड या एंबुलेंस में आपको कोरोना हो जाए। अगर आपको कोरोना नहीं भी है तो आप वहां से नहीं बच सकते हो। वापस छोड़ने की कहानी और लंबी है। लिखा है कि कहानी संक्षेप में बताई है।
    मैं नहीं कह रहा कि यह सब सही है। मैं जानना चाह रहा हूं कि क्या यह खबर नहीं है? किसी अखबार वाले को चेक कर बताना नहीं चाहिए कि उत्तर प्रदेश के नोएडा में अगर लोग ऐसे क्वारंटीन किए जा रहे हैं तो बाकी का क्या हाल होगा। क्या सरकार को इसकी कोई चिन्ता नहीं है। क्या सरकार को इसपर स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए। मीडिया नहीं होता तो पूछता कि यह किसका काम है पर अभी तो …..
    प्रस्तुति

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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