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सिपला के संस्थापक हमीद की कहानी..

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-देवयानी भारद्वाज।।

जब सिपला ने जेनेरिक दवाओं का उत्पादन शुरू किया तो अमरीका ने उस पर पेटेंट कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया था। उस वक़्त इन्दिरा गांधी मजबूती से सिपला के साथ खड़ी थीं। आज विडम्बना यह है कि वही अमरीका अब भारत से हाड्रोक्सीक्लोरोकुईन की मांग कर रहा है।

नेशनल हेराल्ड में प्रकाशित सुजाता आनंदन की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद

एक ऐसे समय में जब देश में कुछ मीडिया समूह और भारतीय जनता पार्टी समर्थक भक्तों का एक तबका मुसलमानों को पैशाचिक रूप में प्रस्तुत कर उनके खिलाफ घृणा का माहौल बना रहा है, यह कहानी बहुत सारे लोगों के दिलों को राहत पहुंचाएगी।
बात वर्ष 1920 की है। एक रईस आदमी ने अपने बेटे को बेरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए बंबई से यूनाइटेड किंगडम की ओर जाने वाले जहाज में बैठा कर विदा किया। उस वक़्त देश के अधिकांश सम्पन्न परिवारों में यही प्रचलन था। लेकिन लड़के का दिल कानून की पढ़ाई में नहीं बल्कि रासायनिक विज्ञान में उलझा था, जिसमें उन दिनों कोई भविष्य नहीं माना जाता था।
लेकिन इस लड़के के पिता ने उसके सामने कोई विकल्प छोड़ा न था। बहरहाल जहाज ने जब बंदरगाह से लंगर छोड़ा उस वक़्त डेक पर खड़े हो कर पिता को विदाई में हाथ हिलाते ख्वाजा अब्दुल हमीद के मन में दूसरी ही उधेड़-बुन चल रही थी। वे बीच राह में इस जहाज से जर्मनी के तट पर उतर गए, जो विगत शताब्दी के उन आरंभिक दशकों में रसायन विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में अग्रणी देश था। उन्होंने वहाँ से डिग्री हासिल की और एक जर्मन यहूदी और कम्युनिस्ट लड़की (दोनों ही पहचान ऐसी जिनसे नजियों को सबसे ज़्यादा नफरत थी) से शादी कर ली। इससे पहले कि एडोल्फ हिटलर के गेस्टापो उन्हें पकड़ पाते वे दोनों ही जर्मनी से निकल सुरक्षित भारत आ गए।
रसायनों की व्यापक समझ के साथ ख्वाजा हमीद ने वर्ष 1935 में केमिकल, इंडस्ट्रियल एंड फार्मास्युटिकल लबोरेट्रीज़ की स्थापना की। आज़ादी के कुछ दशकों के बाद इसी को CIPLA सिपला इस संक्षिप्त नाम से जाना गया।
ख्वाजा हमीद महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बड़े प्रशंसक थे और राष्ट्रवाद के सच्चे जज्बे के साथ उन्होंने जन सामान्य के लिए जनरिक दवाओं का उत्पादन कर बिलकुल कम दाम में उन्हें बेचना शुरू किया। इनमें सिर्फ मलेरिया और तपेदिक की दवाएं ही नहीं बल्कि अन्य श्वसन की तकलीफ़ों, हृदय रोग, मधुमेह और गठिया जैसी रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी सभी बामरियों की दवाएं शामिल थीं।
कभी 1970 के आसपास सिपला ने (यह नाम 1980 में रखा गया था) प्रोप्रानेलोल नामक दावा का उत्पादन शुरू किया। इसे एक बड़ी अमरीकी फार्मास्युटिकल कंपनी ब्रुकलिन, न्यू यार्क से पहले ही पेटेंट करा चुकी थी। यह दवा रक्तचाप, माइग्रेन, हृदय रोग और अन्य तकलीफ़ों के उपचार में काम में लाई जाती थी। उस वक़्त दो ध्रुवों में बंटी दुनिया में अमरीका भारत का मित्र देश नहीं था और वास्तव में महाशक्ति हुआ करता था। डोनाल्ड ट्रम्प की तरह उसे दुनिया के किसी देश से अपनी बात मनवाने के लिए धमकी देने की ज़रूरत नहीं थी।
अमरीका ने भारत सरकार को इस मामले में शिकायत की। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उनके सामने घुटने नहीं टेक दिये जैसा कि गत सप्ताह नरेंद्र मोदी ने किया। बल्कि इन्दिरा गांधी ने ख्वाजा हमीद के बेटे युसुफ हमीद जो खुद उस वक़्त तक केंब्रिज से रसायन में स्नातक हो चुके थे और कंपनी का व्यवसाय संभाल रहे थे को अपने पास बुलवा भेजा। उन्होंने युसुफ को तलब किया कि वे कैसे अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कानून का उल्लंघन कर देश को संकट में डाल सकते हैं? इस पर युसुफ ने श्रीमती गांधी को अपने पिता की कहानी सुनाई और बताया कि उन्होंने किस तरह सामान्य भारतियों को कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता की दवाएं उपलब्ध कराने के लिए इस कंपनी की स्थापना की थी।
ख्वाजा ने अपने बेटे युसुफ को कंपनी का कार्यभार सौंपते हुए कहा था यह हिदायत दी थी कि इस कंपनी की स्थापना जिस मकसद के लिए की गई है उसे हमेशा याद रखना। “दुनिया की दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों की तरह हम मुनाफा कमाने के लिए यह कंपनी नहीं चलाते हैं बल्कि हमारा उद्देश्य गरीबों तक स्वस्थ्य सेवाओं को पहुंचा कर उन्हें राहत पहुंचाना है। अच्छी और सस्ती दवाओं के अभाव में यह लोग मर सकते हैं।”
युसुफ ने इन्दिरा गांधी को बताया कि वे इसी मकसद से इस दावा का उत्पादन कर रहे हैं। इस दलील से प्रभावित इन्दिरा गांधी ने यह जानते हुए कि इसके नतीजे आसान नहीं होंगे, अमरीका के उस आदेश को मानने से इंकार कर दिया जिसके तहत भारत से इस दावा का उत्पादन बंद करने के लिए कहा गया था। अपने देशवासियों के हितों को सर्वोपरी रखने और अमरीकी आदेशों की अवहेलना के कारण इन्दिरा गांधी को अमरीकी सरकार नापसंद करती थी।
इतना ही नहीं युसुफ के सुझाव को ध्यान में रखते हुए इन्दिरा गांधी ने पेटेंट कानून में भी बदलाव करवाया, जिसके तहत दवा मात्र के पेटेंट की बजाय उनके उत्पादन की प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं होना चाहिए यह तय किया गया। इससे सिपला को यह छूट मिल गई कि वह जितनी चाहे उतनी उच्च गुणवत्ता की जनरिक दवाओं का उत्पादन कर उन्हें कम दामों में लोगों को उपलब्ध करा सके। तब से अब तक अन्य अनेक दवाओं के साथ ही सिपला ने HIV की सस्ती दवा उपलब्ध कराई है और कई अफ्रीकी देशों सहित अनेक विकासशील देशों में अपने काम का विस्तार किया है। इनमें ऐसे देश भी शमिल हैं जहां एक समय में सबसे बड़ी तादाद में गरीब और HIV के रोगी मौजूद थे।
यही वह कंपनी है जो हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का उत्पादन करती है जिसका इस्तेमाल मलेरिया, ल्यूपस और संधिवात गठिया (rheumatoid arthritis) तक के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है जिसे अब मूर्ख ट्रम्प प्रशासन की एक धमकी के आगे घुटने टेकते हुए अब गरीब भारतीयों से छीन कर इतनी बड़ी तादाद में अमरीका को निर्यात कर दिया गया है।
ट्रम्प ने इस दवा के लिए भारत सरकार पर दबाव डालना शुरू किया उससे पहले ही मुंबई के सैफी अस्पताल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हमीदुद्दीन परदावाला ने हम में से कुछ लोगों को इस बात पर गौर करने के लिए कहा था कि उन देशों में जहां मलेरिया और संभवतः तपेदिक का भी इतिहास रहा है वहाँ कोरोना वाइरस का असर उतना नहीं होगा जितना उन देशों में हुआ है जहां यह बीमारियाँ अस्तित्व में ही नहीं रही हैं।
मलेरिया कहाँ अस्तित्व में नहीं रहा? अमरीका, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, जर्मनी, स्पेन, कनाडा, आदि वे देश हैं जहां सब से ज़्यादा कोरोना का संक्रमण पाया गया। जब मैं जर्मनी के बारे में सोचती हूँ तो यह ख्याल आता है कि आज तमाम देश भारत के शुक्रगुजार हैं कि यहाँ से उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन का निर्यात किया जा रहा है, यह सारे देश इस वक़्त क्या कर रहे होते यदि उस वक़्त ख्वाजा हमीद और उनकी पत्नी को हिटलर के गेस्टपो ने पकड़ कर किसी यातना शिविर में भेज दिया होता!
और कहीं ज़्यादा तल्खी के साथ इस देश के उन सारे कट्टरपंथियों से यह सवाल पूछने का मन है जिन्होंने मुसलमान समुदाय की पैशाचिक छवि बना कर बीमारी पर सांप्रदायिक रंग चढ़ा दिया है। ऐसे बहुत सारे लोग जिन्हें कभी मलेरिया हुआ होगा और उन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोकुईन के डोज़ दिये गए होंगे, जिससे उनके शरीर में कुछ ऐसी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई है कि वे कोविड-19 का प्रतिरोध करने में सक्षम हैं। इन्हीं में से कई लोगों को संक्रमण का शिकार होने पर इस कंपनी की बनाई दवा से उपचार कराना होगा। वे जानते भी न होंगे कि एक मुसलमान द्वारा स्थापित कंपनी की बनाई जाने कौन-कौन सी जनरिक दवाओं ने उनके रक्तचाप को नियंत्रित रखा होगा, और कितने मधुमेह के उपचार के लिए हमीद के कर्जदार होंगे!

बहुत ब्यौरों में जाने के बजाय मैं इसे काव्यात्मक न्याय कहना चाहुंगी। भारत में ही नहीं दुनिया में शायद ऐसी कोई कंपनी नहीं है जिसने सिपला की तरह स्वास्थ्य सेवाओं को गरीब की पहुँच में लाने की दिशा में काम किया होगा। इतना ही नहीं यह अपने अनुसंधान को दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने में भी कंजूसी नहीं करती। सिपला देश में दूसरी फार्मास्युटिकल कंपनियों को सामाग्री और प्रक्रियाएँ भी उपलब्ध कराती है, ताकि वे अपने स्तर पर दवाओं का उत्पादन कर सकें।
देश के विभाजन के समय मुहम्मद आली जिन्ना उन्हीं सामाजिक समूहों में उठते-बैठते थे, जिनमें ख्वाजा हमीद का आना-जाना था और उन्होंने हमीद से भी पाकिस्तान चलने का अनुरोध किया था। लेकिन हमीद जानते थे कि उनकी पक्षधरता गांधी के साथ थी और उन्होंने भारत में ही रहना तय किया।
देश में मुसलमान हैं और ऐसे मुसलमान भी हैं जो निज़ामुद्दीन में तबलीगी जमात के सम्मेलन में गए थे। इसी तरह देश में हिन्दू हैं और ऐसे हिन्दू भी हैं जो अपनी असहमतियों या कट्टरपंथ के चलते दूसरे हिंदुओं की जान ले लेते हैं। (ऐसा नहीं है देश में महामारी की आशंका के चलते और देशभर में बाकी सभी ने अपने धार्मिक कार्यक्रम रद्द कर दिये हों और ऐसा भी नहीं है और तबलीगी जमात को भी ऐसा ही सम्मेलन आयोजित करने की इजाज़त सब जगह मिल गई हो, मुंबई में नहीं दी गई थी।)
जैसे कुछ जाहिल हिंदुओं के कारण सब हिंदुओं को निशाने पर नहीं लिया जाता उसी तरह मुट्ठी भर तबलीगी जमात के लोग पूरे मुसलमान समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
हमें चंद मूर्खों की खता के एवज में पूरे समुदाय को बदनाम करना बंद करना होगा।

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