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-श्याम मीरा सिंह।।

सिद्धिलिंगेश्वर मंदिर से हजारों की भीड़ की तस्वीरें आ रही हैं। जैसा कि तय है इसपर केवल गिनी-चुनी प्रतिक्रियाएं ही आनी हैं। अब ये भीड़ समाज की दुश्मन नहीं, ये राष्ट्रद्रोही भी नहीं, ये हिन्दू , शैव और वैष्णव भी नहीं है। आलोचनाओं की भाषा में इन्हें सिर्फ “जाहिल” पढ़ा जाएगा न कि हिन्दू, शैव.. न कि ऐसे जैसे कि तबलीगी जमातियों और मुसलमानों को पढ़ा जाता है।
अब किसी अखबार की हेडलाइन ये नहीं रहेगी कि “लॉकडाउन के बीच हजारों हिंदुओं की भीड़ उमड़ी”.

यही तस्वीरें किसी मस्जिद से नमाज पढ़ने की आ रही होतीं तो मीडिया से लेकर मिडिल क्लास की नसें अब तक फड़क गईं उठतीं। तब ये देशद्रोही भी होते, नीच भी होते, वे मुसलमान भी होते। सबको पता है तब इस खबर का मुख्य फोकस मुसलमान पर ही होता।

सच तो ये है कि भारतीय बहुसंख्यक समाज मान चुका है कि मुसलमान स्वभाव से ही द्रोही है और हिन्दू घटनावश ही अपराधी हो सकता है लेकिन वह स्वाभाविक द्रोही नहीं है।

यही कारण है कि मीडिया के लिए मुसलमान पत्थरबाज, सिर्फ एक पत्थरबाज नहीं होता बल्कि उसके लिए वह सिर्फ “मुसलमान” होता है। लेकिन पत्थरबाज यदि हिन्दू हो तो मीडिया के लिए वह हिन्दू नहीं होता तब वह सिर्फ एक “पत्थरबाज” ही होता है।

एंकर द्वारा रची-बसी भाषा से इस भाषा साधारण नागरिकों के मन में धीरे धीरे बैठने लगता है कि पत्थरबाजी तो मुसलमानों का स्वभाविक कार्य है। यही कारण है कि पत्थरबाजी की खबर पढ़ते ही हम पत्थरबाजों के नाम ढूंढने लगते हैं। यदि हिन्दू हुआ तो वह कोई आकस्मिक घटना मान ली जाती है। यदि वह मुसलमान हुआ तो इस पूर्वाग्रह को और अधिक ईंधन मिलता है कि मुसलमान तो स्वभाव से ही द्रोही है।

इसका दूसरा उदाहरण आप निजामुद्दीन की घटना से लीजिए। यदि कोई नागरिक मस्जिद में फंसा हुआ हो तो वह फंसा हुआ न होकर “छुपा” हुआ होता है। वहीं फंसा हुआ तबका बहुसंख्यक समाज से हो तो वह “फंसा” हुआ ही होता है। यहां मुसलमानों के लिए “छुपा” हुआ शब्द उपयोग करने के पीछे व्याकरण वही है जो मुसलमान को हर हाल में अपराधी साबित करना चाहता है। जो इस पूर्वाग्रह को बढ़ावा देता है कि अपराध तो मुसलमान के स्वभाव में है।

आप बंगलुरू में एक डॉक्टर के साथ हुई नृशंस घटना को याद कीजिए. उसमें एक मुसलमान युवक का नाम बार बार उछाला गया। जबकि बाकी 3 युवक हिन्दू ही थे। लेकिन ये विचार किसी के मन में नहीं डाला गया। सबका ध्यान उस मुस्लिम युवक पर ही था जो इस पूर्वाग्रह को पुष्ट करे कि मुसलमान तो स्वभाव से ही अपराधी हैं।

यही कारण है कि यदि हिन्दू ने चोरी की होती है तो वो सिर्फ एक “चोर” होता है, हिन्दू ने बलात्कार किया होता है तो वह सिर्फ एक “बलात्कारी” होता है, हिन्दू ने पत्थर फैंका होता है तो वह सिर्फ एक “पत्थरबाज” होता है। लेकिन वही चोर, बलात्कारी, पत्थरबाज यदि मुसलमान होता है तो वह सिर्फ मुसलमान होता है, तब उसके अपराध से अधिक प्रमुख उसका धर्म हो जाता है।

चूंकि भारतीय बहुसंख्यक समाज मान चुका है कि मुसलमान स्वभाव से द्रोही होता है जबकि हिन्दू आकस्मिक अपराधी हो सकता है स्वभाविक नहीं।

दिक्कत हमारे साथ तो है ही, लेकिन हमारी भाषा के व्याकरण में भी बड़ी गम्भीर समस्या है जो हमेशा बहुसंख्यकों और ताकतवरों के हिसाब से साजिशन रची जाती है, जिसका शिकार अब तक स्त्री, दलित, वंचित होते आए थे, अब मुसलमान हो रहे हैं।

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